Darbar Sahib and idols within?

भला इन मूर्खों से कोई पूछे कि ये तो किसी मुसलमान को मंदिर की सीढ़ियां न चढ़ने दें, इनका मंदिर अपवित्र हो जायेगा जबकि दरबार साहिब जी की तो नींव ही एक मुस्लिम साईं मियां मीर ने रखी थी, हमारा गुरु घर तो आज तक अपवित्र नहीं हुआ!  तो भाई पहले यह बताओ कि क्या तुम्हारे किसी मंदिर का नींव पत्थर कभी किसी मुस्लिम के कर कमलों द्वारा रखा गया है?

जाओ पहले कुछ रिसर्च कर लो! 

 

पिछले कुछ दिनों से फेसबुक और अन्य सोशल साइट्स पर कुछ फिरकु सोच वाले हिन्दू खास कर जिन्हे आरएसएस के कुत्ते कहना अधिक शोभनीय होगा, दरबार साहिब में मूर्तियां रखी होने या उनकी पूजा होने का रोना रोते नज़र आये! इनको दुःख यही कि  इस हरमंदर साहिब में पहले मूर्तियां थीं, अब क्यों नहीं और इस बात को लेकर वे शायद भ्रम में हैं कि यह कभी हिन्दू मंदिर था!


तो उनकी जानकारी के लिए यह बता दूँ कि इस हरमंदर के निर्माण के फौरन पश्चात् ही १६०४ में जैसे ही आदि गुरु ग्रन्थ साहिब जी का संकल संपन्न हुआ तो उन्हें गुरु जी आप ही स्वयं चवर करते हुए और गुरु घर के अनन्य सेवक भाई बुढ्ढा जी, श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी को अपने सिर पर सजा कर, उनकी सवारी बन हरमंदर साहिब में प्रकाश किया! गुरु ग्रन्थ साहिब जी के इस स्वरुप को आपके मंदिर की मूर्तियों की भांति प्राण प्रतिष्ठा नहीं की गयी थी अपितु जिस मर्यादा के साथ पहला वाक् या गुरु का हुकम लिया गया, गुरु घर की वही मर्यादा आज तक कायम है!
तो जो पहला हुकम आया, वह अविस्मरणीय है….
संतां के कारज आप खलोइआ हर कंम करावन आइआ राम !!
धरत सुहावी ताल सुहावा विच अमृत जल छाइआ राम!!

याद रखिये कि गुरु गोबिंद सिंह जी ने इन्हीं शूद्रों, पिछड़े, गरीब लोगों को वरदान दिया था जिन्हें हिन्दू धर्म दुत्कारता है! उपरोक्त तस्वीर इसकी गवाह है! ….

“इन गरीबन को देऊं पातशाही याद करें हमरी गुरिआई !!

यह ईश्वर का, अकाल पुरख का वह घर है जहां किसी से भेदभाव नहीं होता, उंच नीच नहीं होती! इसे समाज के चारों वर्णों के लिए खोला गया था, इसके चार दरवाजे चारों दिशाओं में रखे गए थे, चार ही मुख्य धर्म हिन्दू, मुस्लिम सिख व् ईसाई, इन सबको अनुमति है कि वे भीतर आकर गुरु चरणों में नत मस्तक हो सकें! ब्राह्मण, क्षत्री, वैश्य या शूद्र सभी गुरु घर में बराबर हैं! यह हिन्दू मंदिर नहीं जहां शूद्र वेद पाठ नहीं कर सकते, मंदिर के भीतर या लंगर हाल में प्रवेश नहीं कर सकते! वे यदि पाठ करना जानते हैं, गुरु घर की मर्यादा से वाकिफ हैं तो वे गुरु ग्रन्थ साहिब जी का पाठ स्वयं करने के अधिकारी है, उन्हें स्वतंत्रता है की वे गुरु से स्वयं जुड़ें और अन्य को भी जोड़ें!
स्त्रियों के लिए भी उनके मासिक धर्म में गुरूद्वारे में प्रवेश करने या गुरु ग्रन्थ साहिब की हज़ूरी (Presence ) में पाठ करने की पूरी स्वतंत्रता है, कोई पाबंदी या शर्म की बात नहीं! स्त्रियों को बराबर के अधिकार हैं!
इस हरमंदिर साहिब की एक विशेषता यह भी है, कि इसमें प्रवेश करने के लिए मुख्य द्वार से सीढ़ियों से नीचे उतरना पड़ता है न कि हिन्दू मंदिरों की तरह भगवान कहीं ऊपर आसीन होते हैं, यहां अपना अहंकार छोड़िये और विनम्रता ग्रहण कीजिये, ईश्वर को अहंकार पसंद नहीं! इसलिए ऊपर से नीचे उतरिये और गुरु के दर्शन कीजिये!


गुरु घर की एक और मर्यादा है कि ‘पहले पंगत पाछे संगत!’ अर्थात पहले आप लंगर ग्रहण कीजिये, भरपेट भोजन कीजिये और फिर गुरु के दर्शन के लिए जाइये जिससे गुरु के श्री चरणों में बैठ कर, प्रभु भक्ति में लीन होने पर आपको भूख न लगे और आप का ध्यान भंग न हो!
तो जो इस पवित्र स्थान के बारे में नहीं जानते कि यहां मूर्तियां कैसे विराजमान की गयीं, वे भी यह जान लें!
जब से (1699) खालसा सजाया गया तब से ही सिख और मुगलों में युद्ध होते आये हैं, १८वीं शताब्दी के मध्य और अंत में अब्दाली के हमलों के पश्चात् सिखों को जंगलों में शरण लेनी पड़ी क्योंकि उनके सिरों पर इनाम थे जैसे कि आज भी भारत सरकार ने भी कुछ चुनिंदा सिखों पर आज भी घोषित किये हैं, तब यह इनक प्रत्येक सिख के सिर पर था! इसलिए ऐसे कठिन समय में उदासी और निर्मल संप्रदा के साधु जनों पर यह जिंनदारी सौंपी गयी कि वे इन गुरु घरों की सेवा संभाल करें!

जनता कम थी, सिख जंगलों में थी, इन प्रबंधकों के पास आय के साधन कम थे अत: इन्होने अपनी आय बढ़ाने के लिए और हिन्दुओं को भी अधिक संख्या में इन गुरु घरों की ओर आकर्षित करने के लिए इन उदासी और निर्मल साधु प्रबंधकों (महंतों) ने दरबार साहिब की परिक्रमा में कुछ मूर्तियां रख दी थीं जिन पर श्रद्धालु माथा टेकते थे और चढ़ावा भी चढ़ाते थे!
यह ऐसा ही है जैसे किसी घर का मकान मालिक हाज़िर न हो और किरायेदार या रखवाले अपनी आय वृद्धि के लिए कोई गैर कानूनी कार्य उस घर में करना शुरू कर दें! अंत में जब ये लोग मूर्तियां हटाने के लिए नहीं माने तो कुछ सिख संस्थाओं ने गुरुद्वारा सुधार लहर प्रारंभ की और महंतों से इन सभी प्रमुख गुरुद्वारों से कब्ज़े वापिस लिए गए! इन मूर्तियों को दरबार साहिब से हटा कर, अमृतसर शहर में ही स्थित दुर्ग्याणा मंदिर जिसे हिन्दुओं ने दरबार साहिब की नक़ल करके ही बनाया था, वहां भिजवा दी गयीं!
आज भी कुछ सनातनी प्रभाव वाले लोग जिनमें कुछ मूर्ख सिख वेषधारी भी शामिल हैं तथा हिन्दू संगठन इस महत्वपूर्ण सिख गुरूद्वारे से वैर रखते है और येन केन प्रकारेण कुछ न कुछ वैमनस्य से भरपूर अनर्गल बातें बोलते ही रहते हैं!

 

सिख धर्म में मूर्ती पूजा निषेध है, उन्हें यह जान लेना चाहिए! न सिख लोग व्रत रखते हैं, न श्राद्ध करते हैं, न सूर्य को भगवान मान जल चढ़ाते हैं न ही हिंदुओं के कोई कर्मकांड करते हैं, न ही नक्षत्रों, गृह राशियों आदि में विश्वास करते हैं! इसके प्राचीन ऐतिहासिक प्रमाण भी हमारे पास मौजूद हैं, ऐसा कोई बदलाव आज ही नहीं आया है बल्कि गुरुओं के हुक्मनामे या आदेश तथा समयकालीन इतिहासकारों द्वारा सिख धर्म पर जो भी जानकारी दी गयी है, उसके साक्ष्य हमारे पास मौजूद हैं!

This early quote is from a Persian manuscript written during Guru Hargobind’s time. The author spent some time with Sikhs and knew the Guru. His writings imply a distinct difference to Hinduism. It also seems to answer the question about the position of Aarti and idol worship in original Sikh worship.

To be brief Nanak’s followers scorn images. Their belief is that all the Guru’s are Nanak as stated previously. They do not recite the mantras of the Hindus and do not pay respect to their idol temples. They do not count the avtaars for anything. They do not have attachment to Sanskrit, which the Hindus call the language of angels.

Dabistan i Mazahib by Mobad (1645-46) . Translated by Irfan Habib

Although from the lower castes of Hindus, countless people like ants and locusts gathered around him (Banda Singh Bahadhur) and lost no time in getting killed or coming into battle for his sake, yet they did not harm such Hindus of high status as Khatris, who were colluding in the designs and plans of that rebel or Jats famous for their bravery, who were supporting and joining the army of that doomed one. All remaining Hindus, along with the Muslims they regarded as deserving to be killed.

Muntakhabu ‘l Lubab by Khafi Khan (1716). Translated by Majida B

This observation is from an Afghan opponent of Sikhs who came to Punjab with Abdali Shah. This observation is explicit in its categorisation of Sikhs as distinct from Hindus;

Quote:

If you are not conversant with their religion I shall tell your honour that the Sikhs are disciples of a Guru, and that fortunate guide had lived at Chak [this is an old name for what we know call Harmandir Sahib]. The ways and practices of these people are derived from Nanak who showed to the Sikhs a separate path. His last successor was Gobind Singh, from whom they received the title Singh. They are not from amongst the Hindus. These miscreants have a distinct religion of their own

Jang nama by Noor Mohhamad (1764-1765). Translated by Iqtidar Alam Khan.
अत: बेहतर हो वे अपने धर्म में विश्वास रखें, हमें उन से कुछ नहीं लेना देना! हमारा अपना अलग, स्वतंत्र, सुस्थापित एवं पूर्ण धर्म है, हम जन्म से मृत्यु तथा इसके तत्पश्चात किये जाने वाले प्राणी की मुक्ति के लिए भी किसी दूसरे धर्म पर आश्रित नहीं है, हमारे गुरु ग्रन्थ साहिब हमें उचित दिशा निर्देश देते हैं और प्राणी की मुक्ति का सहज उपाय उपलब्ध करवाते हैं जिससे जीवन में कोई कमी नहीं आती अपितु सिख का जीवन सहज हो जाता है!


अजमेर सिंह रंधावा !!

सिकलीगर सिखों की सारी मुसीबतों की जड़ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ?

हैं आश्चर्य चकित करने वाली खबर कि सिकलीगर सिखों की सारी  मुसीबतों की जड़ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ही है?

जी हाँ यही कटु सत्य है!

Sikligar Mhapanchait-2

पिछले कुछ समय से इन गरीब सिकलीगर परिवारों पर पुलिसिया कहर की ख़बरें अख़बारों में रही थीं लेकिन कोई पुख्ता जानकारी हासिल नहीं हो पा रही थी! भारत के अख़बार वालों को या मीडिया को तो सिर्फ मसाला चाहिए, वे विदेशी पत्रकारों की तरह किसी खबर की तह तक नहीं जाते! परन्तु उनकी खबरें किसी निर्दोष को अपराधी अवश्य घोषित कर देती हैं!

हम भी कुछ समय खबरों के पीछे छुपे कारणों का पता लगने तक शांत रहे लेकिन मन काफी उद्वेलित रहा कि ऐसा कैसे हो सकता है कि ६५० सिख युवकों पर हथियार बनाने के मुकदमें दायर कर दिए जाएँ और उनकी गिरफ्तारियां शुरू कर दी जाएँ?

उधर इंदौर में ही गुरुद्वारा करतार कीर्तन को तुड़वाने में भी इसी हिन्दू कटटरवादी संगठन RSS का नाम रहा था! उस से संबंधित तथ्यों को एकत्रित करना और फिर राष्ट्रीय सिख संगत के कतिपय क्षेत्रीय नेताओं के हाथ होने के भी सबूत मिले जिन्होंने व्यक्तिगत दुश्मनी निकलने के लिए मौका देख अपने आकाओंराष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का साथ दिया?

018

इस से बड़ी निंदनीय और शर्मनाक घटना किसी सिख के लिए और क्या हो सकती है कि वह सांसारिक उपलब्धियों या सुखों को प्राप्त करने के लिए अपने चारित्रिक पतन का परिचय दे?

डूब मरना चाहिए उन्हें जो अपने गुरु से ही धोखा करते हैं!

इन बेचारे गरीब सिकलीगर सिखों (सिकलीगर का अर्थ हैकच्चे लोहे को तपा कर आकार देने, सुदृढ़ करने और चमका देने वाला तथा हथियारों को तेज़ धार देने वाला कारीगर) को तो हथियार बनाने के जुर्म में अपराधी घोषित कर दिया गया लेकिन यदि ये या अन्य जो भी व्यक्ति हथियार बनाते हैं, उनके बनाये हथियार खरीदता कौन है? कौन है जो उन्हें कच्चा माल खरीदने के लिए पैसे दे और उनके द्वारा बनाये गए हथियार ले जाये? अगर एक व्यक्ति एक दिन में १० हथियार बना देता है तो एक दिन में लगभग ६५०० हथियार तैयार होते हैं, तो कौन हैं इन हथियारों के ये बड़े खरीदार?

तब हमें पता चला कि इन हथियारों को RSS खरीदती है! लेकिन पिछले वर्षों से इन सिख कारीगरों ने अब हथियार बनाना बंद कर दिए हैं, इसकी अपेक्षा वे ड्राइवर या गुरुद्वारों में सेवादारी वगैरा करके अपने परिवार का पेट पालते हैं!

इससे RSS को बहुत क्षति पहुंची है, इनके हथियार अत्यंत उत्तम कोटि के होते हैं, इन्होने ने सिख गुरुओं को हथियार बना कर दिए, सिख फौजों को भी हथियार बना कर दिए जिससे अब्दाली जैसे निरंकुश हत्यारे शासकों को सिख फौजों ने पस्त कर दिया था, इनके बनाये हथियारों से ही सिख फौजों ने काबुल कंधार तक फतह हासिल की, लदाख, कश्मीर जीता, चीन तक दहला दिया लेकिन भाजपा सरकार के आने के बाद अपने घर में ही उपेक्षित करार दे दिए गए!

ये गुरु के परम् शिष्य हैं, इन्हें सिख धर्म के बारे जानकारी देने और और सुस्थापित करने के लिए कुछ जागरूक सिख संस्थाएं आगे आईं जिनमें प्रमुख है इंग्लैंड की ब्रिटिश सिख काउन्सिल! इस संस्था ने इनके लिए पानी के प्रबंध के लिए बोरवेल खुदवाये, स्वच्छ पानी मुहैय्या करवाया, गुरूद्वारे बनवाये, बच्चों को शिक्षित करना प्रांरभ किया, मेडिकल सुविधाएँ उपलब्ध करवाई गयीं और इनके जीवन स्तर को उठाने के लिए, अच्छे नागरिक बनाने के लिए हर संभव प्रयास किये गए जिससे प्रेरित होकर इन सिकलीगरों ने अपने पुश्तैनी धंधे को तिलांजलि दे दी!

Sikligar mhapanchait-1

Sikligar arrests

Sikligar

इससे RSS  जैसे कटटर हिन्दू संगठन उद्वेलित हो उठे और इन गरीब सिखों को ब्लैक मेल करने के लिए इन पर दबाव बनाना प्रारंभ कर दिया, इसी कड़ी में इन पर झूठे मुकदमें दर्ज़ करवा दिए गए और ये डर के मारे घर बार छोड़ जंगलों में जा छिपे!

जब कोई हल निकला तो पहले तो इनके परिवारों ने सिख धर्म छोड़ने की बात की क्योंकि मध्य प्रदेश की पुलिस इनके दाढ़ी और केश तथा पगड़ी देख कर इन्हें अपराधी समझ बैठती है! परन्तु पंजाब के तथा अन्य राज्यों के सिखों को जब सच्चाई का पता चला तो सिख समाज में आक्रोश फ़ैल गया और फिर सिख संस्थाओं ने अपने प्रतिनिधि भेज कर स्थिति की जानकारी ली और इन परिवारों की सहायता के लिए कमर कस ली! श्री अकाल तख़्त तक शिकायत पहुंची तो दिल्ली गुरुद्वारा कमिटी ने भी अपने प्रतिनिधि भेजे!

भारतीय मीडिया भले ही खामोश रहा हो क्योंकि यह जुल्म सिखों के साथ हो रहा था और करने वाले थे कटटर हिन्दू!

लेकिन पंजाबी पत्रकार खामोश नहीं बैठे! पंजाब की शायद ही कोई पत्रिका हो या अख़बार हो जिसने मध्य प्रदेश सरकार की भर्त्स्ना की हो या RSS  को नंगा किया हो?

अब देखना है कि मध्य प्रदेश सरकार क्या रुख लेती है, टकराव का या सत्य का साथ देने का? सिखों की सर्वोच्च संस्था शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमिटी तथा अकाल तखत भी उदासीन नहीं रह सकते! और दिन में स्थिति के और स्पष्ट होने के आसार हैं, तभी कहा  जा सकेगा कि यह स्थिति क्या १९८४ से भिन्न है या इसकी पुनरावृत्ति?

ajmer-kesri

अजमेर सिंह रंधावा !

भारत में गुरुद्वारों को ही निशाना क्यों?

कृपया अपनों से बचें!

Lucche

मृत अकाली दल को पुन: जीवन दान देने के लिए दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधन समिति (DSGMC ) ने गुरुद्वारा ज्ञान गोदड़ी हरिद्वार के पुन: निर्माण हेतु सिख समाज से सहयोग माँगा है जबकि इनकी असलियत तो देखिये कि गुरुद्वारा करतार कीर्तन इंदौर जिसे २२ अप्रैल २०१७ को इंदौर नगर निगम ने तोडा है, उसको बचाने के लिए इस समिति ने कोई प्रयत्न नहीं किये जबकि इसकी लिखित पूर्व सूचना २०१६ को ही इन्हे दे दी गयी थी और गुरूद्वारे को बचाने के लिए इनसे सहयोग की अपील भी की गयी थी!

मंजीत सिंह GK ने २६ दिसंबर को ही एक खत इंदौर की मेयर को लिख दिया था कि बिना गुरुद्वारा प्रबंधन समिति करतार कीर्तन के गुरुद्वारा को न तोडा जाये लेकिन इतने से ही इन्होने इन्होने अपने कर्तव्य की इति श्री कर ली, इसको फॉलो अप  नहीं किया और न ही इसकी बाबत इंदौर नगर निगम पर कोई दबाव बनाया जबकि ये भाजपा के सहयोगी हैं और सही मायने में तो भाजपा व् RSS के लिए ही काम करते हैं! इसके बाद इन्होने चुप्पी धारण कर ली!

Approach to DSGMC
२६ दिसंबर २०१६ से २२ अप्रैल तक ४ महीने ये कुंभकर्ण की नींद सोते रहे और इस गुरूद्वारे को टूटने से बचाने के लिए इस दिल्ली गुरुद्वारा कमेटी ने कोई प्रयत्न नहीं किये और चले हैं गुरुद्वारा ज्ञान गोदड़ी, हरिद्वार का पुन: निर्माण करने?

अफ़सोस समय रहते इन्होने कोई कार्रवाई नहीं की, यदि की है तो प्रमाण पेश करें! इनकी चुप्पी ही इनके निकम्मेपन और लापरवाही की पुष्टि करती है!

इसके पूर्व गुरुद्वारा करतार कीर्तन प्रबंधन द्वारा प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी से भी सहयोग की अपील की गयी थी! जिसके प्रत्युत्तर में जगजीत सिंह विर्दी, मीडिया अडवाइज़री नरेंद्र मोदी के द्वारा शिवराज चौहान को सूचना देते हुए गुरुद्वारा करतार कीर्तन को बचाने में उनसे सहयोग की अपेक्षा भी की गयी थी लेकिन शिवराज चौहान द्वारा इस गुरूद्वारे को बचाने में कोई भूमिका अदा नहीं की गयी!

Letter

इंदौर नगर निगम ने जितनी भी सड़कें चौड़ी कीं, उन पर स्थित किसी भी मंदिर को फ़िलहाल तक कोई क्षति नहीं पहुंचाई गयी, चाहे मंदिर छोटा रहा हो या बड़ा! इन मंदिरों में बिजली भी कटिया डाल कर ली जा रही है, सभी मंदिर अवैध कब्ज़े करके बनाये गए हैं जबकि गुरुद्वारा साहिब की वैध रजिस्ट्री मौजूद है, टैक्स भी अदा किया जाता है, बिजली के बिल अदा किये जाते हैं, फिर भी हिन्दुओं की धार्मिक भावनाओं को ध्यान में रखते हुए ये मंदिर सुरक्षित छोड़ दिए गए,सिख समाज की धार्मिक भावनाओं की कोई परवाह नहीं की गयी !

हमारे पास पूरे इंदौर शहर की हर सड़क की वीडियो ग्राफी मौजूद है!

सत्य तो यह है कि गुरुद्वारा करतार कीर्तन को भी जान बूझ कर तोडा गया ! किसी अपील पर कोई सुनवाई नहीं की गयी ! ठीक वैसे ही जैसे अमृतसर गुरूद्वारे पर १९८४ के फौजी आक्रमण से पहले ज़िद्दी इंदिरा ने किसी की नहीं सुनी थी!, अमेरिका के कुछ सिख बुद्धि जीवियों ने इंदिरा को फरवरी ८४ में ही एक पत्र लिख कर ऐसी किसी कार्रवाई को करने से सावधान किया था लेकिन अड़ियल इंदिरा नहीं मानी और आज भी इस आक्रमण की कड़वाहट बाकी है जबकि इंदिरा ने अपनी जान दे कर इसकी कीमत चुकाई थी!

न जाने भारत सरकार सिखों को परेशान करने, व्यथित करने और उनमें असुरक्षा की भावना क्यों पैदा करना चाहती है, इससे भारत सरकार का या हिन्दू समाज का क्या हित साधन होगा? या वे शायद ऐसी कार्रवाइयां करके सिखों का मनोबल तोडना चाहते हैं तो वे भूल जाएँ, हम सौ साल बाद भी भूलने वाले नहीं हैं!

बाकी सिख समाज दिल्ली गुरुद्वारा कमिटी पर जरूरत से अधिक विश्वास न करें क्योंकि वे सिर्फ सुखबीर बादल या प्रकाश सिंह बादल के लिए काम करते हैं न कि सिख समाज की भलाई के लिए!
कृपया अपने अंदर और बाहर के दुश्मनों से सावधान रहें! जो नुकसान इंदौर की RSS समर्थक चांडाल चौकड़ी ने गुरुद्वारा करतार कीर्तन को पहुँचाया है उससे सिख समाज को राष्ट्रीय सिख संगत को समर्थन देने वाले सिखों का बायकाट कर देना चाहिए! अकाल तख़्त को भी सख्त कदम उठाने चाहियें!

दिल्ली कमिटी भी RSS तथा भाजपा समर्थक है, यह सिखों की सगी कभी नहीं हो सकती! इनका असली चेहरा पहचानने की जरूरत है, हालांकि सिख समाज ने हालिया हुए म्युनिसिपल कार्पोरेशन के चुनाव में देख ही लिया है कि किस तरह ये भाजपा की गोद में जा बैठे हैं? जिन्हें सिखों ने एक विश्वास से चुनकर, अपने कीमती वोट दे कर कमिटी की सदस्य्ता दिलवाई, वे सिखों के विश्वास को तोड़कर सिख विरोधियों से जा मिले!

क्या और किसी रहस्योद्घाटन की अभी भी आवश्यकता है?

ajmer-kesri

अजमेर सिंह रंधावा !

इंदौर के शैतान-RSS के गुलाम सिख

कुछ दिन पहले ही गुरुद्वारा करतार कीर्तन को इंदौर नगर निगम द्वारा तोड़े जाने पर सिख समाज से प्रतिक्रियाएं आनी शुरू हो गयी थीं! मैंने भी इसकी विस्तृत जानकारी ली तो पाया कि जहां इंदौर नगर निगम, मध्य प्रदेश सरकार, भारत सरकार तथा इनके आका आरएसएस के मोहन भागवत का इस गुरूद्वारे के तोड़े जाने में हाथ है वहीँ इनके हाथों के खिलौने बने कुछ महत्वाकांक्षी सिख (जिनका सीधा संबंध RSS से है) भी इसमें शामिल हैं!

Indore ke shaitan

Indore ke shaitan-1

है तो यह सत्य लेकिन कितना घिनावना कि एक गुरूद्वारे को तोड़ने में इतने महत्वपूर्ण लोगों, सम्मानित हस्तियों तथा स्वयं राज्य सरकार तथा भारत सरकार का भी हाथ होना महसूस किया जाये तो कितना आश्चर्य लगता है! इंदौर नगर निगम, मध्य प्रदेश सरकार तथा भारत सरकार, ये तीनों भाजपा शासित हैं  और ये सिख विरोधी तथा भारत के अल्पसंख्यकों के कटटर विरोधी RSS द्वारा रिमोट संचालित हैं, RSS के निर्देश, ये तीनों तुरंत स्वीकार करते हैं!

गुरुद्वारा करतार कीर्तन, ५० वर्ष पुरानी ईमारत का एक हिस्सा था, इसकी बाकायदा रजिस्ट्री है, प्रॉपर्टी टैक्स दिया जाता है, बिजली बिल अदा किया जाता है न कि इंदौर के मशरूमों की तरह उग आये मंदिरों की तरह जो हर सड़क के मध्य, हर चौक पर तथा फुटपाथ को घेरे रहते हैं, कटिया डाल कर मुफ्त की बिजली लेते हैं, कोई प्रॉपर्टी टैक्स नहीं देते ! इनमें से किसी भी मंदिर को चाहे वह छोटा हो या बड़ा, किसी को कोई क्षति नहीं पहुंचाई गयी, (हमने इन सभी मंदिरों की वीडियोग्राफी भी करवा ली है)! फिर भी गुरूद्वारे को ही निशाना क्यों बनाया गया?

गुरुद्वारा करतार कीर्तन के संचालक हैं भाई रतीन्द्र सिंह जिनका सिख समाज में बहुत नाम है, गुरसिख हैं तथा सिख समाज पर किसी भी तरह के अंदरूनी या बाहरी हमले का वे अपनी विद्वता से भरपूर विरोध करते हैं! RSS जैसे कटटर हिन्दू संगठन में भी उनकी वजह से बौखलाहट पैदा हो गयी थी! RSS की किसी भी सिख विरोधी कार्रवाई का वे डट कर सामना करते था, इतना सिख विद्वान RSS के प्रबंधकों की आँखों का कांटा बन गया था अत: इन सभी ने मिलकर भाई रतीन्द्र सिंह जी को सबक सिखाने की सोची और इसके लिए मध्य प्रदेश की राज्य सरकार, इंदौर नगर निगम ने मिलकर स्मार्ट सिटी योजना के तहत इंदौर को लेकर इस की सड़कें चौड़ी करने का प्लान तैयार किया, जिससे इस गुरूद्वारे को तोड़ भी दिया जाये और RSS के बिकाऊ सिखों द्वारा इस अनुचित कार्रवाई को सही भी ठहरा दिया जाये! इस गुप्त प्लान की जानकारी गुरुद्वारा प्रबंधन को नहीं दी गयी लेकिन गुप्त सूत्रों से मिली जानकारी के आधार पर भाई रतीन्द्र सिंह जी ने राज्य अल्पसंख्यक आयोग को पत्र लिखा तथा है कोर्ट से गुरूद्वारे को तोड़े जाने के खिलाफ रोक का आदेश भी पारित करवा लिया गया!

मध्य प्रदेश अल्पसंख्यक आयोग ने भाई रतीन्द्र सिंह जी को सूचना दी की वे ५ मई को गुरुद्वारा तोड़े जाने संबंधी मामले की सुनवाई करेंगे लेकिन २२ अप्रैल को ही नगर निगम इस गुरूद्वारे को तुड़वा देता है, अधिकारी न तो हाई कोर्ट के रोक के आदेश को मानते हैं न ही राज्य अल्पसंख्यक आयोग द्वारा किसी सुनवाई के इंतज़ार की कोई जरूरत महसूस करते हैं!

और जब सिख समाज ने पाया कि सड़कें तो और भी चौड़ी की गयीं लेकिन मंदिर जस के तस हैं तो संपूर्ण इंदौर की सड़कों की विडिओग्राफी भी की गयी और सर्वेक्षण भी! इसी राजमोहल्ला की मुख्य सड़क जहां गुरुद्वारा तोडा गया, यह सड़क आगे जाकर गणपति चौक पर निकलती है और फिर सीधा राजवाड़ा की ओर चली जाती है! हम आश्चर्यचकित रह गए जब हमने देखा कि गणपति मंदिर जो चौक पर ही बना है, उसको बचने के लिए प्लान को ही बदल दिया गया था! यह सड़क दोनों ओर से ३०-३० फ़ीट चौड़ी की गयी थी लेकिन गणपति मोड़ पर आकर इस को घुमाव दे दिया गया और दोनों और ३०-३० फ़ीट तोड़ने की अपेक्षा इंदौर निवासियों पर कहर बरपा दिया गया, गणपति मंदिर के दूसरी और ६० फ़ीट सड़क नाप ली गयी और उसे एक तरफ के घर गिरा कर सड़क की पूरी चौड़ाई ले ली गयी, ऐसा ही गणपति मोड़ को पार कर राजवाड़ा जाने वाली सड़क के प्रारंभ में दुहराया गया और वहां भी एक ही ओर से ६० फ़ीट ज़मीन ले ली गयी!

अब सोचिये कि ६० फ़ीट की गहराई तक जिनके घर टूटे होंगे, उनके घरों में क्या बचा होगा? उन पर तो गरीब मार कर दी गयी, गणेश जी को भले ही लड्डू भोग लगाते रहो, चढ़ाते रहो?

मध्य प्रदेश  अलप संख्यक आयोग की लापरवाही देखते हुए हमने इंदौर के जाने माने सिख चेहरों को खंगालना शुरू किया तो पाया कि वे सभी राष्ट्रीय सिख संगत (जो RSS द्वारा सिखों को हिन्दू साबित करने के मक़सद से RSS द्वारा ही कुछ सिखों को खरीद कर, उन्हें आर्थिक रूप से सुदृढ़ करने और सिख धर्म के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए तैयार किया गया है, इसके एक अध्यक्ष रुलदा सिंह की सिख विरोधी कार्रवाइयों के चलते हत्या भी की जा चुकी है) से संबंधित हैं! इसके सदस्य डाक्टर अमरजीत सिंह भल्ला, को जो सहारा अस्पताल, ग्वालयर के मालिक, एवं निदेशक भी हैं, को २ जनवरी २०१७ को मनोनीत किया गया था, ये राष्ट्रीय सिख संगत से संबंधित हैं, जिसके सबूत भी हम तस्वीरों के माध्यम से दे रहे हैं! इन्होने गुरुद्वारा तोड़े जाने पर एक प्रेस विञप्ति जारी की थी, जिस पर इनके या किसी अन्य अधिकारी के न तो हस्ताक्षर ही हैं और न ही कोई क्रमांक नंबर, न ही जारी करने की तारीख!

RSS Sikhs-1

इन बिकाऊ सिखों के RSS के द्वारा संचालित किसी भी प्रोग्राम में इनके शामिल होने पर इंदौर के सिख संगठनों तथा भाई रतिंदर सिंह जी द्वारा विरोध भी किया गया था, इस संबंध में अकाल तख्त से निर्देश भी हैं कि RSS सिख विरोधी है और सिख समाज को इससे दूर रहना चाहिए लेकिन यह चंडाल चौकड़ी फिर भी नहीं मानी!

Hukamnama against RSS

अकाल तखत द्वारा RSS के विरुद्ध जारी किया गया हुकमनामा 
फिर हमने और खोज की तो इस सिख चंडाल चौकड़ी के सिख विरोधी RSS से गहरे संबंध उजागर हुए! आप ही इन तस्वीरों को देखिये जो स्वयं ही अपने आप इनका खुलासा करती हैं!

RSS Sikhs-3

RSS Sikhs-2

031

 

 

RSS-8

RSS Sikhs-4

RSS Sikhs-7

यह चंडाल चौकड़ी सिख धर्म से संबंधित किसी भी प्रायोजित कार्यक्रम में RSS के ही वक्ताओं, नेताओं और प्रतिनिनिधियों को आमंत्रित करती है जैसे कि डाक्टर अमरजीत सिंह भल्ला, जो कि राज्य अल्प संख्यक आयोग के मनोनीत सदस्य हैं, लेकिन अपने को चेयरमैन लिखते हैं! इन्होने २०१५ में इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के अध्यक्ष होते हुए विश्व हिन्दू परिषद के अध्यक्ष कट्टर हिंदूवादी, मुस्लिम एवं अल्पसंख्यक विरोधी प्रवीण तोगड़िया को आमंत्रित किया! उनका स्वागत तो हिन्दू धार्मिक रीति से तिलक लगा कर किया गया लेकिन अमरजीत सिंह भल्ला इस चमचागिरी में कहाँ पीछे रहने वाले थे, उन्होंने भी अपने माथे पर तिलक लगवा कर अपने को हिन्दू साबित किया!

सबूत देखें;

RSS-9 Amarjit bhalla

RSS-10 Amarjit Bhalla with Togadiya

ये महानुभाव भी अपने काळा धंधों को सफेद करने के लिए इस कटटर हिंदूवादी संगठन RSS (राष्ट्रीय सिख संगत) के लिए काम करते हैं! इन्होने भी RSS की पत्रिका संगत संसार के प्रसार एवं प्रचार के लिए अपने को तन-मन-धन से समर्पित कर रखा है! इस मैगज़ीन की एक प्रतिलिपि, मध्य प्रदेश के मुख्य मंत्री शिवराज चौहान को भेंट करने वे अपने RSS के अन्य सहयोगियों के साथ पहुंचे व् नतमस्तक होकर अपनी आस्था RSS में जताई जिससे इन्हें पंजाबी साहित्य अकादमी के चेयरमैन बने रहने का सौभाग्य प्राप्त हो सके, मुख्य मंत्री का वरद हस्त प्राप्त हो, भले ही साहित्यिक क्षेत्र में इनका अपने योगदान नगण्य हो!
आप स्वयं देखिए;

Inderjit khanuja RSS agent-1

खनूजा जैसे गिरे हुए चरित्र के व्यक्ति, राजनीतिक गलियारों में पहुँच बनाये रखने के लिए नीच से भी नीच लोगों का सहारा लेने में संकोच नहीं करते, धर्म तो इनके लिए एक सीढ़ी है जिससे ये अपनी राजनीतिक महत्व आकांक्षाओं को प्राप्त करने के लिए इस्तेमाल करते हैं! इस निम्न तस्वीर में इंद्रजीत खनूजा राष्ट्रीय सिख संगत के अध्यक्ष गुरचरण गिल के साथ दिखाई दे रहे हैं;

Inderjit khanuja RSS agent-2

मंजीत सिंह उर्फ़ रिंकू भाटिया भी इसी जुंडली का एक हिस्सा हैं! ये शराब व्यवसायी हैं ! बहुत ही चरिवान एवं गुणी व्यक्ति हैं जिनके जीवन का एक ही ध्येय है कि  येन-केन-प्रकारेण मध्य प्रदेश के प्रत्येक घर के कम से कम एक व्यक्ति को शराब अवश्य सेवन करनी चाहिए जिससे दिन भर की थकान महसूस न हो! इस महान कार्य के लिए चाहे इनके गुरुओं का निरादर भी हो तो भी इन्हें स्वीकार है! इस निम्न तस्वीर में देखिये कि कैसे गुरु नानक देव जी महाराज को कतिपय नेताओं तथा भगत सिंह के समकक्ष सुशोभित कर दिया है लेकिन इन्हें अपने को राष्ट्रीय सिख संगत के साथ जुड़े होने पर गर्व महसूस होता है!

RSS-11

आश्चर्य होता है कि गुरुद्वारा टूटने पर भी इन मरी हुई ज़मीर वाले सिखों के मन आहत नहीं होते अपितु फिर भी निजी स्वार्थों की लालसा पूर्ति के लिए ये आज भी हिन्दू कटटरवादी, सिख विरोधी संगठन के साथ मिल कर अपने ही धर्म को हानि पहुंचा रहे है तो क्या इन्हें आस्तीन के सांप नहीं कहा जाना चाहिए?

गुरु के सिख तो ये कदापि नहीं?

ajmer-kesri

अजमेर सिंह रंधावा

 

इंदौर की कथित चंडाल चौकड़ी का एक कारनामा और देखिये

Amarjit Bhalla

मध्य प्रदेश सरकार द्वारा ०२/०१/२०१७ को एक आधिकारिक सूचना द्वारा डाक्टर अमरजीत सिंह भल्ला, जो कि ग्वालियर के सहारा अस्पताल के एकमात्र मालिक, निदेशक एवं नाक, कान व् गला विशेषज्ञ (ENT Specialist) हैं, को मध्य प्रदेश अल्पसंख्यक आयोग का सदस्य घोषित किया! इस आदेश की आधिकारिक प्रतिलिपि (Gazette notification) नीचे दी जा रही है!

Gazette notificationMP govt

लेकिन जब इस अमरजीत भल्ला ने गुरुद्वारा करतार कीर्तन तोड़े जाने पर प्रेस विज्ञप्ति जारी की तो इस विज्ञप्ति पर इन्हें अमरीक भल्ला कैसे लिखा गया? यह एक विचारणीय प्रश्न है?

020

इस पत्र को जारी करने की कोई तिथि नहीं दी गयी है, न ही इसे कोई क्रमांक दिया गया है और अमरजीत भल्ला को न केवल अमरीक भल्ला लिखा गया अपितु उन्हें मध्य प्रदेश अल्पसंख्यक आयोग के चेयरमैन एवं मेंबर सेक्रेटरी बताया गया है,इस पत्र पर किसी भी अधिकारी के कोई हस्ताक्षर भी नहीं है लेकिन इसे मध्य प्रदेश अल्पसंख्यक आयोग की वेबसाइट पर भी जारी कर दिया गया है!

अब व्यक्ति एक है लेकिन जिसके दो चेहरे एवं दो पद हैं,इनमें से असली कौन है! क्या एक सदस्य स्वयं को चेयर मैन भी बताये, सदस्य भी तथा सेक्रेटरी भी,तो शंकाएं उठनी स्वाभाविक ही है?

आखिर यह व्यक्ति अमरजीत भल्ला है या अमरीक भल्ला?

कौन है ये छलिया?

ajmer-kesri

अजमेर सिंह रंधावा

इंदौर की चंडाल चौकड़ी

स्वार्थ सिद्धि के लिए धर्म को बेच देने वाले इन महानुभावों से मिलिए!

ये हैं:-

Manjit Singh alias Rinku Bhatia
१- मंजीत सिंह उर्फ़ रिंकू भाटिया जो शराब के एक बड़े व्यवसायी हैं अपने काले धंधों पर पर्दा डालने के लिए इन्हें सिख धर्म का सुरक्षा कवच चाहिए,

Inderjit Khanuja
२- इंद्रजीत खनूजा- ये भी रिंकू भाटिया के परम् सहयोगी हैं, आश्चर्य तो यह है कि कभी इनका कोई लेख नहीं छपा फिर भी इन्हें मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार (मुख्य मंत्री शिवराज चौहान) द्वारा पंजाबी साहित्य अकादमी का चेयरमैन नियुक्त कर दिया गया, क्यों?

Jasbir Gandhi
३- जसबीर गाँधी उर्फ़ राजा गाँधी, ये इंदौर गुरुद्वारा सिंह सभा के सेक्रेटरी हैं और रिंकू भाटिया के परम् सहयोगी,

Amarjit Bhalla

४- अमरजीत सिंह भल्ला उर्फ़ अमरीक भल्ला- ये महानुभाव मध्य प्रदेश अल्पसंख्यक आयोग के चेयरमैन एवं मेंबर सेक्रेटरी भी हैं !

आइये अब इस चंडाल चौकड़ी जो दुर्भाग्यवश सिख धर्म से ही संबंधित हैं, अपने निजी स्वार्थ सिद्ध करने हेतु इनके सिख धर्म के विरोध में सिख विरोधी, हिन्दू कटटरवादी संस्था राष्ट्र्य स्वयंसेवक संघ को हर संभव मदद करने के आरोप हैं!

उदाहरण के लिए इंदौर के राज मोहल्ला में ५० वर्ष से पुराणी एक इमारत जो शायद २००१ से जिसकी ऊपरवाली दो मंजिलें गुरुद्वारा में बदल दी गयी थीं और जहां पूर्ण सिख रहत मर्यादा का पालन करते हुए सिख धर्म से संबंधित धार्मिक कार्यों द्वारा सिख बच्चों को धार्मिक शिक्षा तथा कीर्तन आदि का ज्ञान करवाया जाता था, लाइब्रेरी थी जिसमें सिख धर्म से संबंधित पुस्तकें भी थीं, यानि कि एक निजी संस्थान द्वारा संपूर्ण धार्मिक कार्य अंजाम दिए जाते थे! इतने वर्षों में यहाँ अनगिनत धार्मिक कार्यों को अंजाम दिया गया, न जाने कितने कथावाचक आये, कीर्तन करने वाले आये, सिख इतिहास की जानकारी देने वाले आये, अनगिनत सिख प्रचारक आये, देश विदेश से सिख श्रद्धालु आये, सभी ने भाई रतीन्द्र सिंह जी की सिख धर्म प्रति की गयी सेवाओं की श्लाघा (प्रशंसा) ही की है!

इसके संचालक भाई रतीन्द्र सिंह जी हैं जिनके दादा जी के नाम पर यह गुरुद्वारा करतार कीर्तन कहलाता था और लगभग १०० या इससे ऊपर रोज़ाना सिख संगत इस गुरूद्वारे में हाज़री भरती थी! परन्तु भाई रतीन्द्र सिंह आरएसएस के लिए एक कांटा थे क्योंकि वे इस सिख विरोधी संगठन को कभी भी, किसी भी सिख विरोधी कार्य-कलाप में सफल नहीं होने देते थे! अत: उन्हें सबक सिखाने के लिए मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार ने स्मार्ट सिटी योजना का सहारा लेकर सबक सिखाने की सोची!

इंदौर शहर को स्मार्ट सिटी योजना के तहत सड़कें चौड़ी करने का काम शुरू किया गया जिससे इस गुरूद्वारे को निशाने पर लिया जा सके! गुप् चुप रूप से इस प्लान नई अंजाम देने का कार्य शुरू किया गया जिसकी कोई लिखी पूर्व सूचना गुरुद्वारा प्रबंधन को कभी भी नहीं दी गई! लेकिन गुप्त सूत्रों से इस जानकारी के प्राप्त होने पर गुरुद्वारा प्रबंधन द्वारा उच्च न्ययालय में रिट दाखिल की गई जिस पर उन्हें स्टे भी प्राप्त हुआ, अगली ५ मई को इसकी अगली सुनवाई होनी थी लेकिन २२ अप्रैल को ही इंदौर म्युनिसिपल कार्पोरेशन द्वारा बुलडोज़र चलवा कर इस पवित्र गुरूद्वारे को जमींदोज़ कर दिया गया! इसके लिए विशेष दिन भी चुना गया शनिवार जब यहाँ सिख संगत मौजूद होती है और जिससे शहर में भाजपा की कार्रवाई का आतंक फैले!

ठीक उसी तरह जैसे दरबार साहिब अमृतसर पर फौजी कार्रवाई के लिए सिखों के पांचवें गुरु अर्जन देव जी के शहीदी दिवस को चुना गया था जिस दिन गुरूद्वारे में अधिक उपस्थिति होती है!

इसी गुरूद्वारे से चंद कदम दूर ही हनुमान मंदिर है जिसे कोई क्षति नहीं पहुंचाई गयी, यही सड़क अंत में गणपति मोड़ पर समाप्त होती है जहां गणपति मंदिर भी है जो सड़क चौड़ीकरण में बाधा था लेकिन इसी गणपति मंदिर को बचाने के लिए प्लान में बदलाव किया गया, इस मंदिर के दूसरी ओर अधिक तोड़ फोड़ करके सड़क तो पूरी ले ली गयी लेकिन थोड़ा घुमाव दे दिया गया जिससे मंदिर को कोई क्षति न पहुंचे!

010

इस कार्रवाई के बाद हमने इंदौर शहर की उन सभी सड़कों का दौरा किया जहां प्रशासन द्वारा मार्ग चौड़े किये गए थे! हम यह देखकर आश्चर्य चकित रह गए कि कहीं भी, किसी भी मंदिर को कोई क्षति नहीं पहुंचाई गयी थी चाहे वह मंदिर कितना ही छोटा या बड़ा क्यों न रहा हो, प्रमाण के लिए हमने इन सभी मंदिरों की वीडियो ग्राफ़ी भी कर ली थी!

खैर मुगल राज में मंदिर तोड़े जाते थे, मस्जिद बनवाई जाती थीं, उन्हीं के पद चिन्हों पर चलते हुए इस देश की सरकार भी हिन्दू संगठनों को खुश करने, हिन्दू राष्ट्र निर्माण हेतु सिख गुरुद्वारों तथा मस्जिदों को तोड़ कर अपना अल्पसंख्यक विरोधी चेहरा प्रदर्शित कर रही है!

अब हम इंदौर के इन सिख नेताओं की चंडाल चौकड़ी पर भी कुछ बात कर लें!
* इन्हें भगवान ने ऑंखें दी हैं लेकिन ये फिर भी अंधे हैं क्योंकि निजी स्वार्थों की चाहत ने इन्हें अँधा कर रखा है,
* इनकी दोनों टाँगें सलामत हैं लेकिन फिर भी सर उठा कर चलने के लिए इन्हें बैसाखी चाहिए और सिख विरोधी हिन्दू कटटर संगठन आरएसएस तथा भाजपा इनकी बैसाखी हैं, यदि वे आज अपनी बैसाखी खींच लें तो ये धड़ाम से धरती पर गिर पड़ेंगे (ये शराब माफिया से संबंधित हैं, इसलिए अपने व्यवसाय को प्रफुल्लित करने के लिए इन्हें राज्य सरकार और राजनीतिज्ञों का सहारा चाहिए,
* इनके पास दिमाग भी है लेकिन फ़िलहाल राज्य सरकार के पास गिरवी है, फिर भी ये आसमान में उड़ते हैं! जिस दिन भाजपा या आरएसएस ने उनके पर कतर दिए, इन्हें पैर टिकाने के लिए ज़मीन भी नहीं मिलेगी!

इस चंडाल चौकड़ी ने राज्य अल्पसंख्यक आयोग के लैटर हैड पर एक प्रेस विज्ञप्ति जारो की जिस पर न तो जारी करने की तारीख, सीरियल नंबर, न ही किसी अधिकारी के हस्ताक्षर हैं फिर भी केवल उनके नाम और पद लिख कर इसे जारी कर दिया गया जबकि राज्य अल्पसंख्यक आयोग को प्रेस विज्ञप्ति देने का कोई अधिकार नहीं है, वह केवल किसी जांच रिपोर्ट को सार्वजानिक कर सकता है!

आश्चर्य तो यह है कि यही व्यक्ति असल में अमरजीत सिंह भल्ला है जिस का ग्वालियर में एक बड़ा अस्पताल भी है जिसे सहारा अस्पताल के नाम से जाना जाता है लेकिन प्रेस विञप्ति में इसे अमरीक भल्ला बता कर इसकी असली पहचान छुपा दी जाती है! यह भी सुनने में आया है इस अस्पताल में हर तरह के दो नंबर के काम होते हैं लेकिन प्रशासन से सांठ गाँठ होने के कारण इस पर कोई कार्रवाई नहीं होती, लोग भी इनके खिलाफ मुंह खोलने से डरते हैं!

अब न तो किसी जाँच का आदेश इस अल्पसंख्यक आयोग द्वारा दिया गया न ही कोई जाँच हुई लेकिन फिर भी आरएसएस के गुर्गों को (इंदौर म्युनिसिपल कार्पोरेशन) को यह व्यक्ति अपनी तरफ से ही क्लीन चिट जारी कर देता हैं जबकि इस अमरजीत भल्ला ने इंदौर की सिख संगत को गुरुद्वारा करतार कीर्तन से मिली शिकायत की जांच करने के लिए ५ मई का समय दिया था और आज ४ मई को इसने कहा है कि वह १३ मई को आएगा!

अब इंदौर म्युनिसिपल कार्पोरेशन ने गुरुद्वारा तो तोड़ ही दिया है, अब इसके आने या न आने से हमें क्या फर्क पड़ना लेकिन चांडाल चौकड़ी ने अपना काम बाखूबी अंजाम दिया और मोहन भगवत इनसे प्रसन्न अवश्य हुए होंगे!

020

भगवान ही इन्हें सद्बुद्धि दे!

ajmer-kesri
अजमेर सिंह रंधावा !

Statement of Mai Harinder Kaur of Canada on her molestation by Indian army during Operation Bluestar in June 1984

ਭਾਰਤੀ ਫੌਜ਼ ਅਤੇ ਪੁਲਿਸ ਨੇ ਤੇ 1984 ਵਿਚ ਸਿਖਾਂ ਉਪਰ ਗੈਰ ਮਨੁਖੀ ਜ਼ੁਲਮ ਕਰਣ ਵਿਚ ਤੇ ਹਿਟਲਰ ਨੂੰ ਵੀ ਪਿਛੇ ਸੁੱਟ ਦਿੱਤਾ ਸੀ!

ਇਕ ਸਿਖ ਭੈਣ ਜੋ ਕਿ ਕਨਾਡਾ ਦੀ ਰਹਿਣ ਵਾਲੀ ਸੀ, ਸ੍ਰੀ ਅਮ੍ਰਿਤਸਰ ਵਿਖੇ ਸ੍ਰੀ ਦਰਬਾਰ ਸਾਹਿਬ ਜੀ ਦੇ ਦਰਸ਼ਨਾਂ ਲਈ ਆਪਣੇ ਘਰ ਵਾਲੇ ਨਾਲ ਅਤੇ ਆਪਣੇ 13 ਸਾਲ ਦੇ ਮੁੰਡੇ ਨੂੰ ਨਾਲ ਲੈ ਕੇ ਆਈ ਸੀ, ਨੂੰ ਵੀ ਗ੍ਰਿਫਤਾਰ ਕਰ ਲਿਆ ਗਿਆ ਸੀ! ਉਸਤੇ ਢਾਹੇ ਗਾਏ ਜੁਲਮ ਪੜ ਕੇ ਤੇ ਲੂੰ ਕੰਡੇ ਖੜੇ ਹੋ ਜਾਂਦੇ ਨੇ, ਓਹ ਹਾਲਾਂ ਵੀ ਜਿਓੰਦੀ ਹੈ ਅਤੇ ਗਵਾਹ ਹੈ ਓਸ ਜ਼ੁਲਮ ਦੀ ਜੋ ਉਸਨੇ ਭੋਗਿਆ ਸੀ, ਓਸ ਨੇ ਭੁਗਤਿਆ ਸੀ ਇਹਨਾ ਨੂੰ ਜਾਨਵਰਾਂ ਦੇ ਰੂਪ ਵਿਚ ਵੇਖਿਆ ਸੀ!

ਇਹਨਾ ਦਰਿੰਦਿਆਂ ਨੂੰ ਅਮ੍ਰਿਤਸਰ ਦੇ ਪੁਲਿਸ ਦੇ ਪੁਛ ਗਿਛ ਸੈਂਟਰ (Police Interrogation Center) ਵਿਚ,  ਜੋ ਇਹ ਫੌਜੀ ਟੁਕੜਿਆਂ ਕਿਸੇ ਮਨੁਖ ਨਾਲ ਕਰ ਸਕਦੀਆਂ ਨੇ, ਜੋ ਉਸ ਨਾਲ ਵਾਪਰਿਆ, ਹੋਰ ਪਤਾ ਨਹੀਂ ਕਿੰਨੀਆਂ ਭੈਣਾ ਅਤੇ ਮਾਂਵਾਂ ਨੇ ਝਲਿਆ ਹੋਣਾ ਜਿਹਨਾ ਤੇ ਇਹਨਾ ਰਾਕਸ਼ਸਾਂ ਨੇ ਇਹ ਜੁਲਮ ਕੀਤੇ ਹੋਣੇ? ਓਹਨਾ ਮਸੂਮ ਭੈਣਾਂ ਵਿਚੋਂ ਕਈਆਂ ਨੇ ਤੇ ਮੌਤ ਨੂੰ ਗੱਲ ਲਾ ਲਿਆ ਹੋਣਾ ਪਰ ਪਤਾ ਨਹੀਂ ਹੋਰ ਕਿੰਨੀਆਂ ਬਦਨਸੀਬ ਭੈਣਾਂ ਹੋਣੀਆਂ ਜਿਹਨਾ ਨੇ ਇਹ ਸਭ ਆਪਣੇ ਪਿੰਡੇ ਤੇ ਜਰਿਆ ਹੋਣਾ?  ਰੱਬ ਜਾਣੇ ਓਹਨਾ ਦਾ ਕੀ ਬਣਿਆ ਹੋਣਾ, ਕਈਆਂ ਨੂੰ ਤੇ ਇਹਨਾ ਰਾਕਸ਼ਸਾਂ ਨੇ ਆਪ ਹੀ ਵੱਡ ਦਿੱਤਾ ਹੋਣਾ?  ਵਾਹਿਗੁਰੂ ਹੀ ਜਾਣੇ!

ਪੇਸ਼ ਹੈ ਓਸ ਵੀਰ ਅਤੇ ਬਹਾਦਰ ਸਿਖ ਭੈਣ  ਦਾ ਆਪੂੰ ਲਿਖੀਆ ਸੱਚ ਜੋ ਨੰਗੀਆਂ ਕਰਦੀ ਹੈ ਇਸ ਭਾਰਤੀ ਹਕੂਮਤ ਨੂੰ – ਮਾਈ ਹਰਿੰਦਰ ਕੌਰ ਹਾਲਾਂ ਸੁਖ ਨਾਲ ਜਿਓੰਦੀ ਹੈ ਅਤੇ ਕਨਾਡਾ ਰਹਿੰਦੀ ਹੈ!   

 mai-harinder-kaur

                                ਮਾਈ ਹਰਿੰਦਰ ਕੌਰ

 ਦੁਰਜੋਧਨ ਦੀ ਸਭਾ ਵਿਚ ਉਸ ਦੇ ਭਰਾ ਦੁ:ਸ਼ਾਸਨ ਵੱਲੋਂ ਦ੍ਰੌਪਦੀ ਨੂੰ ਉਸਦੇ ਵਾਲਾਂ ਤੋਂ ਖਿਚ ਕੇ ਲਿਆਂਦਾ ਜਾਣਾ ਅਤੇ ਫਿਰ ਅਧ ਨੰਗੀਆਂ ਕੀਤੇ ਜਾਣਾ – ਹਿੰਦੂ ਸਮਾਜ ਤੇ ਅੱਜ ਵੀ ਕਲੰਕ ਹੈ, ਇਸ ਘਟਨਾ ਨੇ ਮਹਾਭਾਰਤ ਦੀ ਭਰਾ ਮਾਰੂ ਜੰਗ ਕਰਵਾ ਦਿੱਤੀ ਸੀ! ਇਹ ਇਕ ਕੌੜਾ ਸਚ ਹੈ ਤੇ ਫਿਰ ਸਾਡੀ ਸਿਖ ਭੈਣਾਂ ਨਾਲ  ਜੋ ਅਣ-ਮਨੁਖੀ ਜ਼ੁਲਮ ਭਾਰਤ ਸਰਕਾਰ ਅਤੇ ਇਸਦੇ ਅਧ ਸੈਨਿਕ ਸੁਰਖਿਆ ਦਸਤਿਆਂ , ਭਾਰਤੀ ਫੌਜ਼ ਅਤੇ ਪੁਲਿਸ ਵੱਲੋਂ ਢਾਹੇ ਗਏ –ਉਸਦੀ ਸਿਰਫ ਇਕ ਮਿਸਾਲ ਹੀ ਸਾਡੇ ਕੋਲ ਜਿਓੰਦੀ  ਜਾਗਦੀ ਪੀੜਤ ਭੈਣ ਦਾ ਆਪੂੰ ਲਿਖਿਆ ਸੱਚ ਜੋ ਉਸਦਾ ਖੁਦ ਦਾ ਨੇਟ ਤੇ ਪਾਇਆ  ਗਿਆ ਬਿਆਨ ਹੈ, ਮੈਂ ਉਸ ਨੂੰ ਆਪ ਸਭਨਾਂ ਦੀ ਜਾਣਕਾਰੀ ਵਾਸਤੇ ਇਥੇ ਪੰਜਾਬੀ ਜੁਬਾਨ ਵਿਚ ਲਿਖ ਰਿਹਾ ਹਾਂ!

ਇਹੋ ਜਿਹੇ ਅਨ-ਮ੍ਣੁਖੀ ਤਸੱਦਦ ਹੋਰ ਮੇਰੀਆਂ ਕਿੰਨੀਆਂ ਭੈਣਾਂ ਨੇ ਆਪਣੇ  ਪਿੰਡੇ  ਤੇ ਜਰੇ ਹੋਣੇ – ਘਿਰਣਾ ਆਓਂਦੀ ਹੈ ਇਸ ਭਾਰਤ ਭੂਮੀ ਤੋਂ ਜਿਥੇ  ਇਹੋ  ਜਿਹੇ ਪਾਪੀ ਲੋਕ ਵਸਦੇ ਹੋਣ ਅਤੇ ਵਰਦੀਆਂ ਪਾ ਕੇ ਮਜਲੂਮ ਔਰਤਾਂ ਤੇ ਜੁਲਮ ਢਾਹੁੰਦੇ ਹੋਣ? ਕਿਵੇਂ ਅਸੀਂ ਇਸ ਦੇਸ਼ ਨੂੰ ਆਪਣਾ ਮੰਨ ਲਈਏ ? ਕਿਓਂ ਨਾ ਆਪਣਾ ਅੱਡ ਮੁਲਕ ਮੰਗੀਏ ਜਿਥੇ ਸਾਡੀ ਮਾਂ ਭੈਣਾਂ ਦੀ ਇਜ਼ਤ ਤੇ ਸੁਰਖਿਅਤ ਹੋਵੇ? ਕੀ ਇਹ ਸਭ ਵੇਖ ਕੇ ਫਿਰ ਵੀ ਸਾਡਾ ਆਪਣੇ ਆਪ ਲਈ ਇਕ ਅੱਡ ਮੁਲਕ ਮੰਗਣਾ ਗੁਨਾਹ ਹੈ? ਜੇਕਰ ਹਾਂ ਤੇ ਅਸੀਂ ਸੌ ਵਾਰੀ ਵੀ ਇਹ ਜੁਰਮ ਕਰਾਂਗੇ –ਦੇ ਦਵੋ ਸਾਨੂ ਇਸ ਜੁਰਮ ਵਿਚ ਫਾਂਸੀ? ਕਿਓਂ ਨਹੀਂ ਓਸ ਨਰ ਪਿਸ਼ਾਚ ਕੇ ਪੀ ਐਸ ਗਿੱਲ ਨੂੰ ਵੀ ਉਸਦੇ ਮਾਨਵਤਾ ਦੇ ਖਿਲਾਫ਼ ਕੀਤੇ ਗਏ ਗੁਨਾਹਾਂ ਲਈ ਸਜ਼ਾ ਦਿੰਦੇ? ਕੀ ਸਾਨੂ ਘਮੰਡ ਨਾਲ ਆਪਣੇ ਆਪ ਨੂੰ ਭਾਰਤੀ ਕਹਿਣਾ ਚਾਹੀਦਾ —ਤਾਂ ਮੇਰਾ ਜੁਆਬ ਹੋਵੇਗਾ “ਕਦੀ ਨਹੀਂ?”  

ਇੰਦਰਾ ਗਾਂਧੀ ਦਾ ਜੁਰਮ:

ਅਖੀਰਲੀ ਵਾਰ ਜਦੋਂ ਮੈਂ ਅਮ੍ਰਿਤਸਰ ਵਿਚ ਸੀ – ਜੂਨ 1984, ਵੱਲੋਂ : ਮਾਈ ਹਰਿੰਦਰ ਕੌਰ  

ਜੂਨ १९८४

ਮੈਂ ਆਪਣੇ ਘਰ ਵਾਲੇ ਮਣੀ ਅਤੇ ਤੇਰਾਂ ਸਾਲ ਦੇ ਪੁੱਤਰ ਸੰਦੀਪ ਦੇ ਨਾਲ ਅਮ੍ਰਿਤਸਰ ਵਿਚ ਸੀ ! ਅਸੀਂ ਦੁਪਹਿਰ ਵੇਲੇ ਕਰੀਬਨ  ਸ਼ਹਿਰ ਵਿਚ ਹੀ ਸੀ ਅਤੇ ਸਾਡਾ ਆਪਣੇ ਰਿਸ਼ਤੇਦਾਰਾਂ ਦੇ ਘਰ ਆਓਣਾ ਜਾਣਾ ਲਗਿਆ ਹੋਇਆ ਸੀ ਜਿਹਨਾ ਵਿਚੋਂ ਜਿਆਦਾਤਰ ਓਹਨਾ ਇਲਾਕਿਆਂ ਵਿਚ ਹੀ ਰਹਿੰਦੇ ਸਨ!

ਤਰੀਖ ਜਿਹੜੀ ਤੁਹਾਡੇ ਵਿਚੋਂ ਜਿਆਦਾਤਰ ਨੂੰ ਚੇਤੇ ਵੀ ਨਹੀਂ ਹੋਣੀ – ਅਪ੍ਰੇਸ਼ਨ ਬਲੂ ਸਟਾਰ ਦੇ ਸ਼ੁਰੂ ਹੋਣ ਦੀ ਸੀ, ਜਿਵੇਂ ਕੀ ਇਹ ਨਾਮ ਭਾਰਤ ਸਰਕਾਰ ਨੇ ਦਿੱਤਾ ਸੀ ਜਦੋਂ ਭਾਰਤੀ ਫੌਜ਼ ਨੇ ਸ੍ਰੀ ਹਰਮੰਦਰ ਸਾਹਿਬ ਜੀ ਤੇ ਹਮਲਾ ਕੀਤਾ ਸੀ, ਇਸ ਦਾਹਵੇ ਦੇ ਨਾਲ ਕੀ ਓਹ ਅੱਤਵਾਦੀਆਂ ਦੀ ਤਲਾਸ਼ ਕਰ ਰਹੇ ਨੇ!

ਫੌਜ਼ ਨੂੰ ਪਤਾ ਸੀ ਕਿ ਹਜ਼ਾਰਾਂ ਸਿਖ ਸ਼ਰਧਾਲੂ ਗੁਰਦੁਆਰਾ ਸਾਹਿਬ ਜੀ ਦੇ ਅੰਦਰ ਪੰਜਵੇਂ ਪਾਤਸ਼ਾਹ ਜੀ ਦਾ ਸ਼ਹੀਦੀ ਪੁਰਬ ਮਨਾਓਣ ਲਈ ਇਕਠੀਆਂ ਹੋਇਆ ਨੇ, ਸੰਗਤਾਂ ਹਮ ਹੁਮਾ ਕੇ ਪੁਜੀਆਂ ਸਨ! ਫਿਰ ਵੀ ਫੌਜ਼ ਨੇ ਦਰਬਾਰ ਸਾਹਿਬ ਜੀ ਦੇ ਸਾਰੇ ਹੀ ਛੇਤਰ ਵਿਚ ਅੰਨੇ ਵਾਹ ਗੋਲੀਆਂ ਚਲਾਈਆਂ, ਵਾਹਿਗੁਰੂ ਜਾਨੇ, ਕਿਨੇ ਮਾਰੇ ਗਏ ਹੋਣੇ! ਜਦੋਂ ਫੌਜ਼ ਦੀ ਇਹ ਕਾਰਵਾਈ ਚੱਲੀ, ਓਸ ਵੇਲੇ ਚੰਗੀ ਕਿਸਮਤ ਸਦਕੇ ਅਸੀਂ ਆਪਣੇ ਇਕ ਰਿਸ਼ਤੇਦਾਰ ਦੇ ਘਰ ਸੀ , ਇਸ ਕਰਕੇ ਅਸੀਂ ਸੁਰਖਿਅਤ ਸੀ!

ਫਿਰ ਵੀ ਅਸੀਂ ਇੰਨੇ ਕਿਸਮਤ ਵਾਲੇ ਵੀ ਨਹੀਂ ਸੀ ਪਰ ਚੰਗੀ ਕਿਸਮਤ ਸੀ ਸਾਡੀ ਜੋ ਸਾਡੇ ਤਿਨਾਂ ਦੇ ਪਾਸ ਪੋਰਟ ਸਾਡੇ ਕੋਲ ਸੀ!

ਮੈਨੂ ਇਹ ਤੇ ਚੇਤੇ ਨਹੀਂ ਕੀ ਸਾਨੂੰ ਕਿਥੇ ਲਿਜਾਇਆ ਗਿਆ ਸੀ, ਸ਼ਾਇਦ ਕੋਈ ਪੁਲਿਸ ਸਟੇਸ਼ਨ ਹੋਵੇਗਾ ! ਓਹਨਾ ਸਾਨੂ ਔਰਤਾਂ ਨੂੰ ਮਰਦਾਂ ਤੋਂ ਅੱਡ ਕਰ ਦਿੱਤਾ ! ਮੈਨੂ ਡਰ ਸੀ ਕੀ ਮੈਂ ਸ਼ਾਇਦ ਆਖਰੀ ਵਾਰ ਆਪਣੇ ਘਰ ਵਾਲੇ ਨੂੰ, ਪੁੱਤਰ ਅਤੇ ਹੋਰਨਾਂ ਨੂੰ ਵੇਖ ਰਹੀ ਹਾਂ!

ਫਿਰ ਓਹਨਾ ਸਾਨੂੰ ਜਨਾਨੀਆਂ ਨੂੰ ਵਖ ਵਖ ਕਮਰਿਆਂ ਵਿਚ ਬੰਦ ਕਰ ਦਿੱਤਾ ! ਮੈਂ ਇੰਤਜ਼ਾਰ ਕਰਦੀ ਰਹੀ! ਜਿੰਦਗੀ ਵਿਚ ਪਹਿਲੀ ਵਾਰੀ ਮੈਨੂ ਡਰ ਲਗਿਆ ! ਕੁਝ ਚਿਰਾਂ ਮਗਰੋਂ ਇਕ ਨੌਜੁਆਨ ਪੁਲਿਸ ਅਫਸਰ ਅੰਦਰ ਕਮਰੇ ਵਿਚ ਆਇਆ! ਹਾਲਾਂਕਿ ਮੇਰੇ ਹਥ ਲੱਕ ਪਿਛੇ ਬਝੇ ਹੋਏ ਸੀ ਫਿਰ ਵੀ ਕਿਸੇ ਤਰਾਂ ਮੈਂ ਆਪਣਾ ਕਨੇਡੀਅਨ (Canadian) ਪਾਸ ਪੋਰਟ ਬਾਹਰ ਕਡਿਆ !

ਉਸ ਤੇ ਇਸਦਾ ਕੋਈ ਅਸਰ ਨਹੀਂ ਪਿਆ !

‘ਕੀ ਤੁਸੀਂ ਸਿਖ ਹੋ?‘ ਆਪਣੀ ਸ਼ਕਲ ਤੇ ਬਿਨਾ ਕੋਈ ਭਾਵ ਲਿਆਓਂਦੀਆ ਪੁਛਿਆ !

‘ਹਾਂ!’ ਮੈਂ ਬੜੀ ਤਸੱਲੀ ਨਾਲ ਜੁਆਬ ਦਿੱਤਾ!

‘ਗਲਤ ਜੁਆਬ!’ ਇਹ ਕਹਿ ਕੇ ਉਸਨੇ ਮੇਰੇ ਮੁੰਹ ਤੇ ਇਕ ਚਪੇੜ ਮਾਰ ਦਿੱਤੀ!

‘ਕੀ ਤੁਸੀਂ ਸਿਖ ਹੋ?’ ਆਪਣੀ ਸ਼ਕਲ ਤੇ ਬਿਨਾ ਕੋਈ ਭਾਵ ਲਿਆਓਂਦੀਆ ਪੁਛਿਆ !

‘ਹਾਂ!’ ਮੈਂ ਫਿਰ ਤਸੱਲੀ ਨਾਲ ਆਪਣਾ ਜੁਆਬ ਦੁਹਰਾ ਦਿੱਤਾ!

ਗਲਤ ਜੁਆਬ! ਇਹ ਕਹਿ ਕੇ ਉਸਨੇ ਮੇਰੇ ਮੁੰਹ ਤੇ ਇਕ ਚਪੇੜ ਮਾਰ ਦਿੱਤੀ!

‘ਕੀ ਤੁਸੀਂ ਸਿਖ ਹੋ?’ ਆਪਣੀ ਸ਼ਕਲ ਤੇ ਬਿਨਾ ਕੋਈ ਭਾਵ ਲਿਆਓਂਦੀਆ ਫੇਰ ਪੁਛਿਆ !

‘ਹਾਂ!’ ਮੈਂ ਫੇਰ ਤਸੱਲੀ ਨਾਲ ਆਪਣਾ ਜੁਆਬ ਦੁਹਰਾ ਦਿੱਤਾ!

‘ਗਲਤ ਜੁਆਬ ਅਤੇ ਤੂੰ ਮੂਰਖ ਵੀ ਹੈਂ!’ ਉਸਨੇ ਆਪਣੇ ਹਥ ਦੀ ਮੁਠੀ ਜੋਰ ਨਾਲ ਘੁੱਟ ਕੇ ਬੰਦ ਕੀਤੀ ਅਤੇ ਮੇਰੇ ਮੁੰਹ ਤੇ ਇਕ ਮੁੱਕਾ ਮਾਰਿਆ!

‘ਕੀ ਤੁਸੀਂ ਸਿਖ ਹੋ?’ ਮੁੰਹ ਤੇ ਹੌਲੀ ਜਿਹੇ ਹਸਦਿਆਂ ਨੇ ਫੇਰ ਪੁਛਿਆ!

‘ਹਾਂ! ਮੈਂ ਖਾਲਸਾ ਹਾਂ!’ ਮੇਰੇ ਮੁੰਹ ਵਿਚੋਂ ਖੂਨ ਵੱਗ ਕੇ ਬਾਹਰ ਆ ਰਿਹਾ ਸੀ! ਮੈਂ ਸੋਚਦੀ ਹਾਂ ਕਿ ਮੈਨੂ ਕਹਿਣਾ ਚਾਹੀਦਾ ਸੀ ਕਿ ਮੈਂ ਡਰੀ ਹੋਈ ਨਹੀਂ ਸੀ ਪਰ ਇਹ ਕਹਿਣਾ ਝੂਠ ਹੋਵੇਗਾ! ਇਕ ਵੱਡਾ ਝੂਠ! ਮੈਂ ਓਦੋਂ ਤੋਂ ਅੱਜ ਤੱਕ ਜਿੰਦਗੀ ਵਿਚ ਕਦੀ ਵੀ ਇੰਨਾ ਨਾ ਡਰੀ ਸੀ ! ਫੇਰ ਵੀ ਮੈਂ ਆਪਣੀ ਅਵਾਜ਼ ਨੂ ਕਾਬੂ ਕੀਤਾ!

ਓਹ ਮੇਰੇ ਉਪਰ ਝੁਕਿਆ ਅਤੇ ਮੇਰੀ ਕਮੀਜ਼ ਨੂੰ ਫਾੜ ਕੇ ਸੁੱਟ ਦਿੱਤਾ! ਫੇਰ ਓੰਨੇ ਮੇਰੀ ਕਿਰਪਾਨ ਨੂੰ ਵੀ ਖਿਚ ਕੇ ਬਾਹਰ ਕੱਡ ਲਿਆ! “ਛੋਟੀ ਸੰਤ ਸਿਪਾਹੀ ਕੋਲ ਛੋਟਾ ਚਾਕੂ” ਓਹ ਮਿਹਣਾ ਮਾਰਦੀਆਂ ਬੋਲਿਆ ! ਫੇਰ ਕਿਰਪਾਨ ਦਾ ਬਲੇਡ (ਤਿਖਾ ਪਾਸਾ) ਮੇਰੇ ਗੱਲ ਤੇ ਰਖ ਦਿੱਤਾ! ਮੈਂ ਬਿਨਾ ਕਿਸੇ ਡਰ ਤੋਂ ਜੋਰ ਦੀ ਖਿੜ-ਖਿੜਾ ਕੇ ਹੱਸ ਪਈ! ਇਕ ਬਿਨਾ ਸੋਚੇ ਸਮਝੇ ਹੀ ਇਹ ਹੋਇਆ!

 ਦੂਸਰੇ ਹੋਰਨਾ ਸਿਖਾਂ ਦੀ ਤਰਾਂ ਮੈਂ ਖੂੰਡੀ (ਬਿਨਾ ਧਰ ਵਾਲੀ) ਕਿਰਪਾਨ ਨਹੀਂ ਪਾਓਂਦੀ! ਮੈਂ ਜਾਣਦੀ ਹਾਂ! ਮੈਂ ਜਾਣਦੀ ਹਾਂ ! ਕਿਰਪਾਨ ਇਕ ਧਾਰਮਕ ਚਿਨ੍ਹ (ਨਿਸ਼ਾਨ) ਹੈ, ਕੋਈ ਸ਼ਸਤਰ ਨਹੀਂ! ਮੈਂ ਮੁਆਫੀ ਚਾਹਾਂਗੀ ਜੇਕਰ ਕਿਸੇ ਨੂੰ ਮੇਰੀ ਕਿਸੇ ਵੀ ਗੱਲ ਨਾਲ ਕੋਈ ਦੁਖ ਪੁਜਿਆ ਹੋਵੇ! ਮੈਂ ਜਾਣਦੀ ਹਾਂ ਕਿ ਇਸ ਨਾਲ ਕਿਸੇ ਨਾ ਕਿਸੇ ਨੂੰ ਦੁਖ ਜਰੂਰ ਪੁਜਿਆ ਹੋਵੇਗਾ ਪਰ ਮੇਰੇ ਦੁਨਿਆਵੀ ਪਿਤਾ ਸ੍ਰੀ ਗੁਰੂ ਗੋਬਿੰਦ ਸਿੰਘ ਜੀ ਨੇ ਜੇਕਰ ਕਦੀ ਵੀ ਸਾਨੂੰ ਬਿਨਾ ਹਥਿਆਰ ਦੇ ਰਹਿਣ ਲਈ ਕਿਹਾ ਹੋਵੇ? ਇਸ ਕਰਕੇ ਮੈਂ ਜਿਆਦਾਤਰ ਰੇਜਰ ਦੀ ਤੇਜ਼ ਧਾਰ ਵਾਲਾ ਫਰਾਂਸ ਦਾ ਬਣਿਆ ਹੋਇਆ ਖੰਜਰ ਹੀ ਪਾਓਂਦੀ ਹਾਂ ਜੋ ਕਿ ਮੈਨੂ ਮੇਰੇ ਘਰ ਦੀ ਇਕ ਬੁਢੜੀ ਤੀਵੀਂ ਵੱਲੋਂ ਮੈਨੂ ਮਿਲਿਆ ਸੀ! ਮੇਰਾ ਮੰਨਣਾ ਹੈ ਕਿ ਇਸਨੂੰ ਸਹੀ ਅਰਥਾਂ ਵਿਚ ਕਿਰਪਾਨ ਕਹਿਣਾ ਸਹੀ ਨਹੀਂ ਹੋਵੇਗਾ ਪਰ ਫੇਰ ਵੀ ਇਸੇ ਨੂੰ ਹੀ ਪਾਓਂਦੀ ਹੁੰਦੀ ਸੀ! ਮੈਨੂ ਪੂਰੀ ਤਰਾਂ ਚੇਤੇ ਨਹੀਂ ਕਿ ਕਿਓਂ ਓਸ ਦਿਨ ਮੈਂ ਇਸਨੂੰ ਨਹੀਂ ਸੀ ਪਾਇਆ ਹੋਇਆ ! ਜੇਕਰ ਪਾਇਆ ਹੋਇਆ ਹੁੰਦਾ ਤੇ ਓਸ ਦਿਨ ਮੇਰੀ ਮੌਤ ਜਕੀਨੀ ਸੀ! ਇਸ ਕਰਕੇ ਮੈਂ ਜੋਰ ਦੀ ਖਿੜ ਖਿੜਾ ਕੇ ਹੱਸੀ ਸੀ!

ਇਹ ਉਸਨੂੰ ਗੁੱਸਾ ਦਵਾਓਣ ਲਈ ਕਾਫੀ ਸੀ, ਉਸਨੇ ਫੇਰ ਮੇਰੀ ਪੈੰਟ ਵੀ ਉਤਰ ਦਿੱਤੀ! ਇੱਸੇ ਵੇਲੇ ਇਕ ਹੋਰ ਪੁਲਸ ਵਾਲਾ ਅੰਦਰ ਆਇਆ ! ਪਹਿਲਾਂ ਵਾਲੇ ਨੇ ਮੈਨੂ ਮੇਰੇ ਕੇਸ਼ਾਂ ਤੋਂ ਫੜ ਕੇ ਖਿਚਿਆ! ਤੁਸੀਂ ਅਸਭ੍ਯ (Uncivilized) ਖਾਲਸੇ ਇਹਨਾ ਦੀ ਬਹੁਤ ਪੂਜਾ ਕਰਦੇ ਹੋ? ਕਰਦੇ ਹੋ ਜਾਂ ਨਹੀਂ? ਕੀ ਇਹ ਸੱਚ ਹੈ ਕੀ ਤੁਸੀਂ ਇਹਨਾ ਕੇਸਾਂ ਨੂੰ ਕਟਵਾ ਓਣ ਤੋਂ ਪਹਿਲਾਂ ਮਰਨਾ ਪਸੰਦ ਕਰੋਂਗੇ?

ਮੈਂ ਇਕ਼ਬਾਲ ਕੀਤਾ ‘ਹਾਂ!’

‘ਬੇਵਕੂਫ਼’

ਦੂਜੇ ਪੁਲਸ ਵਾਲੇ ਨੇ ਉਸਨੂੰ ਇਕ ਜੋੜੀ ਕੈਂਚੀ ਦੀ ਲਿਆ ਕੇ ਦਿੱਤੀ! ਤਾਂ ਓੰਨੇ ਮੇਰੇ ਕੇਸਾਂ ਵੱਲ ਇਸ਼ਾਰਾ ਕੀਤਾ ! ‘ਮੈਂ ਇਸ ਦਾ ਇਸਤੇਮਾਲ ਕਰਣ ਜਾ ਰਿਹਾ ਹਾਂ ! ਮਰਜੀ ਤੇਰੀ  ਹੈ: ਇਥੇ! “ਮੇਰੇ ਕੇਸਾਂ ਵੱਲ ਇਸ਼ਾਰਾ ਕੀਤਾ”, ‘ ਜਾਂ ਇਥੇ?’ਅਤੇ ਫੇਰ ਓੰਨੇ ਮੇਰੇ ਕਛਹਿਰੇ ਦਾ ਉਪਰਲਾ ਹਿੱਸਾ ਕੱਟ ਦਿੱਤਾ ਜਿਸ ਕਰਕੇ ਓਹ ਹੇਠਾਂ ਡਿੱਗ ਪਿਆ !” ਮੇਰੀ ਬੱਚੇਦਾਨੀ ਦੇ ਮੁੰਹ (ਯੋਨੀ-Vagina) ਵੱਲ ਇਸ਼ਾਰਾ ਕਰਦੇ ਨੇ ਕਿਹਾ!

ਓਹ ਹਸਦਾ ਰਿਹਾ! ਹਸਦਾ ਹੀ ਰਿਹਾ!

ਇਸ ਤੇ ਮੈਂ ਵੀ ਆਪਣੀ ਘਬਰਾਹਟ ਦੇ ਬਾਵਜੂਦ ਹੱਸ ਪਈ!

ਡਰ ਕਰਕੇ ਮੇਰਾ ਪੀਂਦਾ ਸੁੰਨ ਪੈ ਗਿਆ ਸੀ! ਮੈਂ ਕੁਝ ਨਹੀਂ ਬੋਲੀ ਪਰ ਮੇਰੇ ਅੰਦਰੋਂ ਮੇਰਾ ਰੋਮ ਰੋਮ ਵਾਜਾਂ ਮਾਰ ਰਿਹਾ ਸੀ!

ਗੋਬਿੰਦ!

ਨ ‘ਗੁਰੂ’ ਨ ‘ਸਿੰਘ’ ਅਤੇ ਨ ਹੀ ‘ਜੀ’

ਸਿਰਫ ‘ਗੋਬਿੰਦ’

ਓਸੇ ਵੇਲੇ ਇਸਦਾ ਰਿਜ਼ਲਟ ਵਿਖਾਈ ਦਿੱਤਾ! ਮੇਰਾ ਡਰ ਪਤਾ ਨਹੀਂ ਕਿਥੇ ਗੈਬ ਹੋ ਚੁਕਿਆ ਸੀ! ਮੈਨੂ ਕੋਈ ਪੀੜ ਵੀ ਨਹੀਂ ਸੀ ਹੋ ਰਹੀ! ਮੈਂ ਨਹੀਂ ਜਾਣਦੀ ! ਮੈਂ ਕਿਵੇਂ ਜਾਣ ਸਕਦੀ ਸੀ ਕਿ ਕਿਓਂ ਉਸਦੀ ਹਿੰਮਤ ਨਹੀਂ ਪਈ ਮੇਰੇ ਕੇਸ ਕਤਲ ਕਰਣ ਦੀ? ਮੈਂ ਇਸ ਸਭ ਤੋਂ ਰੱਤੀ ਕੁ ਵੀ ਪਰੇਸ਼ਾਨ ਨਹੀਂ ਸੀ ਕਿ ਓਹ ਮੇਰੇ ਨਾਲ ਕੀ ਕਰਣਗੇ ! ਮੈਨੂ ਮੇਰੇ ਦਸਮੇਸ਼ ਪਿਤਾ ਜੀ ਦੇ ਬੋਲ ਸੁਣਾਈ ਦਿੱਤੇ, “ਮੇਰੀ ਮਰਜ਼ੀ ਤੋਂ ਬਗੈਰ ਮੈਨੂ ਕੋਈ ਨੀਵਾਂ ਨਹੀਂ ਵਿਖਾ ਸਕਦਾ!”

ਮੈਂ ਹੱਸੀ ਤੇ ਕਿਹਾ, ‘ਮੈਂ ਖਾਲਸਾ ਹਾਂ’ ਮੈਂ ਫੇਰ ਕਮਰੇ ਵਿਚ ਲੱਗੇ ਸ਼ੀਸ਼ੇ ਵੱਲ ਵੇਖਿਆ!

ਮੈਂ ਪੂਰੀ ਤਰਾਂ ਬੇਵਕੂਫ਼ ਨਹੀਂ ਹਾਂ! ਮੈਨ ਜਾਣਦੀ ਸੀ ਕਿ ਪੁਲਸ ਦੇ ਇਹਨਾ ਪੜਤਾਲ ਕੇਂਦਰਾਂ (Interrogation centers) ਵਿਚ ਇਕ ਤਰਫਾ ਪਾਰ ਵਿਖਾਈ ਦੇਣ ਵਾਲੇ ਸ਼ੀਸ਼ੇ ਲੱਗੇ ਹੁੰਦੇ ਨੇ! ਅਤੇ ਮੈਂ ਪੂਰੀ ਤਰਾਂ ਬੇਫਿਕਰ ਸੀ ਕਿ ਪੁਲਸ ਵਾਲੇ ਮੇਰੇ ਘਰ ਵਾਲੇ ਅਤੇ ਮੇਰੇ ਮੁੰਡੇ ਨੂੰ ਇਹਨਾ ਰਾਕਸ਼ਸਾਂ, ਹਰਾਮਜਾਦੇ ਦੋਗਲੀਆਂ ਵੱਲੋਂ ਮੇਰੇ ਨਾਲ ਕੀਤਾ ਜਾਂਦਾ ਇਹ ਨੀਚ ਕੰਮ ਜਰੂਰ ਵਿਖਾ ਰਹੇ ਹੋਣੇ! ਮੈਂ ਆਪਣੇ ਨਾ ਵਿਖਾਈ ਦਿੰਦੇ ਘਰ ਵਾਲੇ ਨੂੰ (ਸ਼ੀਸ਼ੇ ਦੇ ਪਾਰ), ਓਸ ਪਾਸੇ ਮੁੰਹ ਕਰਕੇ ਮੁਸਕਰਾ ਕੇ ਆਪਣਾ ਸਿਰ ਹਲਾਇਆ !

ਓੰਨੇ ਮੇਰੇ ਢਿਡ ਤੇ ਜੋਰ ਨਾਲ ਸੱਟ ਮਾਰੀ ਪਰ ਮੈਨੂ ਕੁਝ ਨਹੀਂ ਹੋਇਆ ! ਓੰਨੇ ਇੰਜ ਦੀਆਂ ਸੱਟਾਂ ਹੋਰ ਕਈ ਵਾਰੀ ਮੈਨੂ ਮਾਰੀਆਂ , ਮਾਰਦਾ ਰਿਹਾ ਜਦ ਤਕ ਕਿ ਆਖਰੀ ਵਾਰੀ ਓੰਨੇ ਮੇਰੇ ਪੈਰਾਂ ਤੇ ਕੱਸ ਕੇ ਮਾਰਿਆ ਜਿਸ ਨਾਲ ਮੈਂ ਹੇਠਾਂ ਡਿੱਗ ਪਈ !ਮੈਂ ਆਪਣੇ ਆਪ ਨੂੰ ਕਦੀ ਇੰਨਾ ਸ਼ਾਂਤ ਅਤੇ ਪੂਰਨ ਨਹੀਂ ਸੀ ਮਸੂਸ ਕੀਤਾ, ਇਸ ਸਭ ਨੂ ਲਫਜਾਂ ਵਿਚ ਦੱਸਣਾ ਬਾਹਲਾ ਔਖਾ ਹੈ ਪਰ ਸੱਚ ਇਹੋ ਹੈ!

ਹੁਣ ਓਹ ਮੇਰੇ ਉਪਰ ਖੜਾ ਹੋ ਗਿਆ ਅਤੇ ਮੇਰੇ ਵੱਲ ਘੂਰ ਕੇ ਵੇਖਣ ਲੱਗਾ, ਮੈਂ ਪੂਰੀ ਤਰਾਂ ਨਗਨ ਸੀ ਅਤੇ ਫਰਸ਼ ਤੇ ਡਿੱਗੀ ਪਈ ਸੀ! ਉੰਨੇ ਵਾਰ ਵਾਰ ਮੇਰੇ ਸਿਰ ਤੇ ਜੋਰ ਜੋਰ ਨਾਲ ਮਾਰਿਆ! ਫੇਰ ਓੰਨੇ ਮੇਰੇ ਕੇਸਾਂ ਨੂੰ ਫੜ ਕੇ ਖਿਚਿਆ ਅਤੇ ਆਪਣੇ ਸਾਥੀ ਦੀ ਮਦਦ ਨਾਲ ਮੈਨੂ ਇਕ ਕੁਰਸੀ ਤੇ ਬਿਠਾ ਦਿੱਤਾ! ਫੇਰ ਓੰਨੇ ਮਿਰਚਾਂ ਵਾਲੀ ਪੋਟਲੀ ਖੋਲੀ ਅਤੇ ਮੇਰੇ ਸਾਰੇ ਮੁੰਹ ਤੇ ਮਲੀਆਂ, ਮੇਰੀ ਨੱਕ ਵਿਚ ਵੀ ਪਾਈਆਂ ਅਤੇ ਮੇਰੀਆਂ ਅਖਾਂ ਵਿਚ ਵੀ! ਮੈਂ ਕੋਈ ਹਰਕਤ ਨਹੀਂ ਕੀਤੀ!

ਹੁਣ ਓੰਨੇ ਮੇਰੀਆਂ ਲੱਤਾਂ ਨੂੰ ਚੌੜੀਆਂ ਕੀਤਾ ਅਤੇ ਮਿਰਚਾਂ ਦੇ ਪੋੱਡਰ ਨੂੰ ਮੇਰੀ ਯੋਨੀ ਅਤੇ ਉਸਦੇ ਚਾਰੇ ਪਾਸੇ ਮਲਿਆ! ਦੂਜੇ ਨੇ ਮੈਨੂ ਮੇਰੇ ਅਗ੍ਲੇਪੈਰਾਂ ਵੱਲ ਖਿਚਿਆ ਜਦਕਿ ਪਹਿਲੇ ਵਾਲੈ ਨੇ ਮੇਰੀ ਟੱਟੀ ਵਾਲੀ ਥਾਂ (ਬੁੰਡ) ਵਿਚ ਉਂਗਲ ਪਾ ਕੇ ਗੰਦ ਬਾਹਰ ਕਡਿਆ ਅਤੇ ਮੇਰੇ ਮੁੰਹ ਵਿਚ ਪਾ ਦਿੱਤਾ ! ਸਾਰੇ ਵੇਲੇ ਓਹ ਮੈਨੂ ਹਰ ਤਰਾਂ ਨੀਵਾਂ ਵਿਖਾਓਣ ਲਈ ਮਿਹਣੇ ਹੀ ਮਾਰਦਾ ਰਿਹਾ! ਪਰ ਇਹ ਸਭ ਕਰਕੇ ਵੀ ਮੇਰੀ ਹਿੰਮਤ ਨੇ ਜੁਆਬ ਨਹੀਂ ਸੀ ਦਿੱਤਾ! ਮੈਂ ਇਹ ਸਭ ਤੇ ਨਹੀਂ ਦੱਸ ਸਕਦੀ ਕੀ ਓੰਨੇ ਮੈਨੂ ਕੀ ਕੀ ਕਿਹਾ, ਖਾਸ ਕਰਕੇ ਓਹ ਸਭ ਜੋ ਠੇਠ ਪੰਜਾਬੀ ਜੁਬਾਨ ਵਿਚ ਕਿਹਾ ਸੀ ਜਿਸ ਨੂੰ ਮੈਂ ਥੋੜਾ ਬਹੁਤਾ ਹੀ ਸਮਝਦੀ ਸੀ ਅਤੇ ਫੇਰ ਇਹ ਸਭ ਦੱਸਣ ਨਾਲ ਵੀ ਕੀ ਹਾਸਲ ਹੋਵੇਗਾ ਸਿਰਫ ਕਿਸੇ ਨੂ ਇਹ ਸਿਖਾਓਣ ਦੇ ਕਿ ਕਿਸੇ ਦੂਜੇ ਨਾਲ ਮਾੜਾ ਸਲੂਕ ਕਿਵੇਂ ਕੀਤਾ ਜਾਂਦਾ?

ਜਦੋਂ ਓਹ ਮਿਰਚਾਂ ਲਾਓਣੀਆਂ ਬੰਦ ਕਰ ਹਟਿਆ ਤਾਂ ਓੰਨੇ ਕੈਂਚੀ ਫੜ ਲਈ ਜਿਹੜੀ ਕਾਫੀ ਤੇਜ਼ ਵਿਖਾਈ ਦਿੰਦੀ ਸੀ! ਮੇਰੀ ਸਾਰੀ ਛਾਤੀ ਤੇ ਓੰਨੇ ਛੋਟੇ ਛੋਟੇ ਚੀਰੇ ਲਾ ਕੇ ਜਖਮ ਕੀਤੇ! ਪਰ ਜਦੋਂ ਮੈਂ ਕੋਈ ਹਰਕਤ ਨਹੀਂ ਕੀਤੀ ਤਾਂ ਫੇਰ ਓੰਨੇ ਮੇਰੇ ਪੈਰਾਂ ਦੇ ਹੇਠ ਤਲਵਿਆਂ ਵਿਚ ਚੀਰੇ ਲਾਏ! ਹੁਣ ਓਹ ਪੂਰੀ ਤਰਾਂ ਟੁੱਟ ਚੁਕਿਆ ਸੀ! ਮੈਂ ਸੋਚਿਆ ਕਿ ਹੁਣ ਜਾਂ ਤੇ ਓਹ ਮੇਰਾ ਗਲ ਘੁੱਟ ਦਊਗਾ ਜਾਂ ਮੇਰੀਆਂ ਅਖਾਂ ਹੀ ਬਾਹਰ ਕੱਡ ਦਊਗਾ!

ਹੁਣ ਓੰਨੇ ਫੇਰ ਮੈਨੂ ਮੇਰੇ ਕੇਸਾਂ ਤੋਂ ਫੜਿਆ ਅਤੇ ਜਮੀਨ ਤੇ ਸੁੱਟ ਦਿੱਤਾ, ਫੇਰ ਮੇਰੀਆਂ ਲੱਤਾਂ ਨੂੰ ਦੁਬਾਰਾ ਚੌੜੀਆਂ ਕੀਤਾ ! ਹੁਣ ਓੰਨੇ ਮੇਰੀ ਯੋਨੀ ਤੇ ਆਪਣੀ ਕੈਂਚੀ ਲਾਈ! ਇਹ ਉਸਦੀ ਮੇਰੇ ਨਾਲ ਜੋਰੀ ਕਰਣ (Rape) ਦਾ ਇਸ਼ਾਰਾ ਸੀ! ਓਹ ਰੁਕਿਆ, ਓਸ ਵੇਲੇ ਨੂ ਬਚਾਓਣ ਲਈ 1 (ਇਹ ਇਕ ਤਰਾਂ ਦੀ ਧਮਕੀ ਸੀ)

ਠੀਕ ਓਸੇ ਵੇਲੇ ਦਰਵਾਜ਼ਾ ਖੁਲਿਆ ਅਤੇ ਕਿਸੇ ਨੇ ਜੋਰ ਦੀ ਆਖਿਆ ! ਠਹਿਰੋ ! ਸਾਨੂ ਹੁਕਮ ਹੈ ਕਿ ਕਨਾਡਾਈਆਂ ਨਾਲ ਨਾ ਉਲਝਿਆ ਜਾਵੇ!

ਓੰਨੇ ਮੇਰੇ ਵੱਲ ਪੂਰੀ ਘਿਰਣਾ ਨਾਲ ਤੱਕਿਆ! ਪਰ ਖੜ ਗਿਆ! ! ਦੂਜੇ ਪੁਲਸ ਵਾਲੇ ਨੇ ਮੇਰੀਆਂ ਬਾਹਵਾਂ ਖੋਲ ਦਿੱਤੀਆਂ!

ਮੈਂ ਖੜੀ ਹੋਈ, ਆਪਣਾ ਕਛਹਿਰਾ ਚੁੱਕਿਆ ਅਤੇ ਤੇੜੀ ਪਾਇਆ, ਫੇਰ ਆਪਣੀ ਪੈੰਟ ਪਾਈ! ਮੇਰੀ ਕਮੀਜ਼ ਬੁਰੀ ਤਰਾਂ ਫੱਟ ਚੁੱਕੀ ਸੀ! ਮੇਰੇ ਮੁੰਹ ਵਿਚ ਹੱਲਾਂ ਵੀ ਖੂਨ ਭਰਿਆ ਹੋਇਆ ਸੀ ਜੋ ਮੈਂ ਓਹਦੇ ਵੱਲ ਮੁੰਹ ਕਰਕੇ, ਓਹਦੇ ਪੈਰਾਂ ਲਾਗੇ ਥੁੱਕ ਦਿੱਤਾ! ਓਹ ਬੜੀ ਹੌਲੀ ਜਿਹੀ ਅਵਾਜ਼ ਵਿਚ ਬੋਲਿਆ ਜਿਹੜੀ ਸਿਰਫ ਮੈਂ ਹੀ ਸੁਨ ਸਕਦੀ ਸੀ, “ਜੇਕਰ ਫੇਰ ਮੈਂ ਤੈਨੂ ਦੁਬਾਰਾ ਵੇਖਿਆ, ਤੈਨੂ ਆਪਣੇ ਤੇ ਪਛਤਾਵਾ ਹੋਵੇਗਾ ਕੀ ਮੈਂ ਤੈਨੂ ਅੱਜ ਹੀ ਕਿਓਂ ਨਹੀਂ ਖਤਮ ਕਰ ਦਿੱਤਾ!”

ਤੇ ਫਿਰ ਮੈਨੂ ਆਪਣੇ ਅੰਦਰ ਕੀ ਮਸੂਸ ਹੋ ਰਿਹਾ ਸੀ ਜਦੋਂ ਓਹ ਮੈਨੂ ਤਸੀਹੇ (ਮੇਰੇ ਸ਼ਰੀਰ ਅਤੇ ਮਾਨਸਿਕ ਤੌਰ ਤੇ) ਦੇ ਰਿਹਾ ਸੀ! ਮੈਂ ਦਾਹਵੇ ਨਾਲ ਕਹਿ ਸਕਦੀ ਹਾਂ ਕਿ ਇਹ ਤਸੀਹੇ ਹੀ ਸੰਨ! ਮੈਂ ਵੇਖ ਸਕਦੀ ਸੀ, ਸੁਣ ਸਕਦੀ ਸੀ ਅਤੇ ਜੋ ਕੁਝ ਵੀ ਵਾਪਰ ਰਿਹਾ ਸੀ, ਉਸ ਨੂੰ ਮਸੂਸ ਕਰ ਸਕਦੀ ਸੀ! ਪਰ ਮੈਨੂ ਕੋਈ ਪੀੜ ਨਹੀਂ ਸੀ ਹੋ ਰਹੀ, ਨ ਸ਼ਰੀਰਕ ਅਤੇ ਨ ਹੀ ਮਾਨਸਿਕ, ਨ ਓਦੋਂ ਅਤੇ ਨ ਬਾਦ ਵਿਚ! ਸੱਚ ਤੇ ਇਹ ਹੈ ਕਿ ਮੈਨੂ ਮੂਲ ਮੰਤਰ ਬੋਲਣ ਦੀਆਂ ਬਹੁਤ ਸਾਰੀਆਂ ਅਵਾਜਾਂ ਸੁਣਾਈ ਦੇ  ਰਹੀਆਂ ਸੀ! ਵਾਰ ਵਾਰ ਸੁਣਾਈ ਦੇ ਰਹੀਆਂ ਸਨ! ਇਹ ਇਕ ਬਹੁਤ ਹੀ ਸੋਹਣਾ ਅਤੇ ਸੁਖਦ ਅਹਿਸਾਸ ਸੀ ਜਿਸਦਾ ਕੋਈ ਸਿਰਫ ਸੁਪਨਾ ਹੀ ਲੈ ਸਕਦਾ ਹੈ! ਇਸ ਸਭ ਨੇ ਮੇਰੀ ਆਤਮਾ (ਰੂਹ) ਨੂੰ ਕੀਤੇ ਦੂਰ ਪੁਚਾ ਦਿੱਤਾ ਸੀ ਜਿਥੇ ਪੀੜ ਮਸੂਸ ਨਹੀਂ ਹੁੰਦੀ!  ਇਹ ਸੁਖਦ ਅਹਿਸਾਸ ਮੈਨੂ ਆਪਣੀ ਇਸ ਜਿੰਦਗੀ ਵਿਚ ਦੂਜੀ ਵਾਰ ਹੋਇਆ ਸੀ! ਉਸ ਤੋਂ ਬਾਦ ਇਹ ਫੇਰ ਕਦੀ ਨਹੀਂ ਹੋਇਆ!

 ਮੈਨੂ ਆਪਣੇ ਆਪ ਵਿਚ ਦੋ ਜਿੰਦਗੀਆਂ ਇਕੋ ਸਾਥ ਜਿਓਣ ਦਾ ਅਹਿਸਾਸ ਹੋ ਰਿਹਾ ਸੀ! ਮੇਆਰੀ ਸਾਰੀਆਂ ਚੇਤਨ ਤਾਵਾਂ ਹੁਣ ਦੁਬਾਰਾ ਵਾਪਸ ਆਕੇ ਮੈਨੂ ਸਭ ਕੁਝ ਸਮਝਣ ਵਿਚ ਸਹਾਈ ਹੋ ਰਹੀਆਂ ਸਨ! ਮੇਰੀ ਸੁਣਨ ਦੀ ਤਾਕ਼ਤ ਵਧ ਗਈ ਸੀ ! ਆਲੇ ਦੁਆਲੇ ਦੇ ਰੰਗ ਹੋਰ ਸਾਫ਼ ਵਿਖਾਈ ਦੇਣ ਲੱਗ ਪਏ ਸੀ! ਮੈਂ ਹੁਣ ਪੂਰੀ ਤਰਾਂ ਆਪਣੇ ਹੋਸ਼ ਵਿਚ ਸੀ ! ਮੈਂ ਇਥੇ ਇਹ ਗੱਲ ਬਿਲਕੁਲ ਸਾਫ਼ ਕਰ ਦੇਣਾ ਚਾਹੁੰਦੀ ਹਾਂ ਕੀ ਮੈਂ ਕੋਈ ਬਹਾਦਰ, ਮਜਬੂਤ ਜਾਂ ਹੀਰੋ ਨਹੀਂ ਹਾਂ ਅਤੇ ਨਾ ਹੀ ਮੈਂ ਕੋਈ ਇੰਜ ਦੀ ਜਨਾਨੀ ਹਾਂ ਜਿਹੜੀ ਕਿਸੇ ਦੂਜੇ ਬੰਦੇ ਵੱਲੋਂ ਸ਼ਰੀਰ (ਪਿੰਡੇ) ਤੇ ਕੁਝ ਦੁਖ ਪੁਚਾਓਣ ਨਾਲ ਸ਼ਰੀਰਕ ਸੁਖ (sexual pleasure) ਮਸੂਸ ਕਰਦਿਆਂ ਨੇ! ਮੈਂ ਆਪਣੇ ਆਪ ਵਿਚ ਇਕ ਖੁਸ਼ਹਾਲ ਜਿੰਦਗੀ ਜਿਓਣ ਵਾਲੀਆਂ ਵਿਚੋਂ ਹਾਂ ਜਿਵੇਂ ਕਿ ਮੈਂ  ਸੁਪਨੇ ਲੈ ਸਕਦੀ ਹਾਂ! ਮੈਨੂ ਇਸ ਨਾਲ ਕੋਈ ਫ਼ਰਕ ਨਹੀਂ ਪਿਆ ਕੀ ਓਹ ਮੇਰੇ ਨਾਲ ਕੀ ਕਰ ਰਹੇ ਸੀ!

ਮੈਂ ਇਹ ਕਿਓਂ ਸੋਚਾਂ ਕਿਮੇਰੇ ਨਾਲ ਇੰਜ ਕਿਓਂ ਵਾਪਰਿਆ? ਕਿਓਂਕਿ ਮੈਂ ਓਸ ਭਰੋਸੇ ਨਾਲ ਬਝੀ ਹਾਂ ਜਿਹੜਾ ਮੇਰੇ ਪਿਤਾ ਦਸਮੇਸ਼ ਨੇ ਮੇਰੇ ਨਾਲ ਕੀਤਾ ਸੀ! ਇਸ ਸਭ ਵਿਚ ਮੈਂ ਕੁਝ ਨਹੀਂ ਹਾਂ! ਇਸ ਹਾਲਤ ਵਿਚ ਕੋਈ ਵੀ ਖਾਲਸਾ ਹੋਵੇ, ਉਸਨੂੰ ਹੱਕ ਹੈ ਸ਼ਾਇਦ ਆਪਣੀ ਡੀਓਟੀ ਪੂਰੀ ਕਰਨੀ, ਆਪਣੇ ਮਾਲਕ ਤੇ ਭਰੋਸਾ ਰਖਦਿਆਂ ਕਿ ਓਹ ਵੀ ਇੰਜ ਹੀ ਕਰੇ! ਕੋਈ ਖਾਸ ਨਹੀਂ, ਕੋਈ ਛੁਪਿਆ ਸੁਨੇਹਾ ਵੀ ਨਹੀਂ, ਕੋਈ ਮੂਰਖਤਾ ਭਰੇ ਸੰਸਕਾਰ (Rituals) ਵੀ ਨਹੀਂ, ਬਸ ਸਿਰਫ ਆਪਣਾ ਧਿਆਨ ਦਸਮੇਸ਼ ਪਿਤਾ ਦੇ ਚਰਨਾਂ ਵੱਲ!

 ਇਸ ਦੇ ਨਾਲ ਹੀ ਮੈਂ ਕੁਝ ਹੋਰ ਲਫਜ਼ ਵੀ ਕਹਿਣਾ ਚਾਹੁੰਦੀ ਹਾਂ, ਸਭ ਤੋ ਪਹਿਲਾ, ਕੁਝ ਗੱਲਾਂ ਮਰਿਆਦਾ ਤਹਿਤ ਜੋ ਮੈਂ ਛੱਡ ਦਿੱਤੀਆਂ ਸੀ, ਕੀ ਮੇਰਾ ਬਲਾਤਕਾਰ ਨਹੀਂ ਸੀ ਹੋਇਆ, ਕਿਓਂਕਿ ਬਲਾਤਕਾਰ ਸਿਰਫ ਮਰਦ ਦੇ ਲਿੰਗ ਦਾ ਜਨਾਨੀ ਦੀ ਯੋਨੀ ਵਿਚ ਵੜਨ ਨੂੰ ਹੀ ਕਿਹਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ! ਕਿਰਪਾ ਕਰਕੇ ਧਿਆਨ ਦੇਣਾ ਜੀ ਕਿਸੇ ਨੂੰ ਤਸੀਹੇ ਦੇਣੇ, ਕੋਈ ਸੁਖਦਾਈ, ਆਪਣੇ ਵੱਲ ਖਿਚ ਪਾਓਣ ਵਾਲਾ ਅਹਿਸਾਸ ਨਹੀਂ ਹੈ, ਇਸ ਲਈ ਕਿਸੇ ਖਾਸ ਜੰਤਰ ਦੀ ਲੋੜ ਨਹੀਂ ਪੈਂਦੀ, ਸਿਰਫ ਕੁਝ ਮਿਰਚਾਂ, ਇਕ ਜੋੜੀ ਤੇਜ਼ ਧਾਰ ਵਾਲੀ ਕੈਂਚੀ ਅਤੇ ਮੇਰੀ ਬਾਹਵਾਂ ਨੂੰ ਬਨਣ ਲਈ ਕੁਝ ਵੀ ਅਤੇ ਥੋੜੀ ਜਿਹੀ ਦਿਮਾਗੀ ਕਸਰਤ ਕੀ ਕਿਵੇਂ ਤਸੀਹੇ ਦਿੱਤੇ ਜਾਣ ?

 ਮੈਂ ਅਜੇ ਇਹ ਨਹੀਂ ਦਸਿਆ ਹੈ ਕਿ ਓਸ ਵੇਲੇ ਮੈਂ ਆਪਣੇ ਆਪ ਵਿਚ ਗਰਭਵਤੀ (ਢਿਡ ਤੋਂ) ਸੀ ਅਤੇ ਮੈਨੂ ਤੀਜਾ ਮਹੀਨਾ ਚੱਲ ਰਿਹਾ ਸੀ, ਓਹਨਾ ਨੂੰ ਬਿਸ਼ਕ ਕਿਸੇ ਤਰਾਂ ਵੀ ਇਹ ਨਹੀਂ ਸੀ ਪਤਾ ਚੱਲ ਸਕਦਾ ਸੀ ਅਤੇ ਨਾ ਹੀ ਓਹਨਾ ਨੂੰ ਇਸ ਨਾਲ ਕੋਈ ਫ਼ਰਕ ਪੈਂਦਾ ਸੀ, ਮੇਰੇ ਅਜਨ੍ਮੇ ਬੱਚੇ ਨੂੰ ਕਿਓਂ ਕੋਈ ਨੁਕਸਾਨ ਨਹੀਂ ਪੁਜਿਆ, ਮੈਂ ਤੇ ਸਿਰਫ ਇੰਨਾ ਹੀ ਕਹਿ ਸਕਦੀ ਹਾਂ ਕਿ ਉਸ ਬੱਚੇ ਦੀ ਅਤੇ ਮੇਰੀ ਰਖਿਆ ਵੀ ਮੇਰੇ ਦਸਮੇਸ਼ ਪਿਤਾ ਜੀ ਨੇ ਹੀ ਕੀਤੀ ਸੀ !

“ਮੈਂ ਸਿਰਫ ਹੌਲੀ ਜਿਹੀ ਹੱਸਦੀ ਰਹੀ!”ਕੀ ਕਿਰਪਾ ਕਰਕੇ ਮੇਰੀ ਕਿਰਪਾਨ ਵਾਪਸ ਮਿਲ ਸਕਦੀ ਹੈ?

ਦੂਜੇ ਪੁਲਸ ਵਾਲੇ ਨੇ ਮੇਰੀ ਕਿਰਪਾਨ, ਮੇਰੇ ਪਾਸ ਪੋਰਟ ਦੇ ਨਾਲ ਹੀ ਮੇਰੇ ਹਥਾਂ ਵਿਚ ਫੜਾ ਦਿੱਤੀ!

ਓਹਨਾ ਮੇਰਾ ਹਥ ਫੜਿਆ ਅਤੇ ਆਪਣੇ ਨਾਲ ਹੀ ਇਕ ਵੱਡੇ ਕਮਰੇ (Hall) ਵੱਲ ਲੈ ਤੁਰੇ ਜਦਕਿ ਹੱਲਾਂ ਵੀ ਮੈਂ ਅਧ ਨੰਗੀ ਹੀ ਸੀ ਅਤੇ ਮੇਰੇ ਖੂਨ ਵੀ ਵੱਗ ਰਿਹਾ ਸੀ! ਬੜੀ ਹੀ ਇਜਤ ਨਾਲ ਮੇਰੇ 13 ਸਾਲ ਦੇ ਕਾਕੇ ਸੰਦੀਪ ਨੇ ਆਪਣੀ ਕਮੀਜ਼ ਲਾਹ ਕੇ ਮੈਨੂ ਪੁਆਓਣ ਵਿਚ ਮੇਰੀ ਮਦਦ ਕੀਤੀ!

ਇਸ ਪਾੱਸੇ ਮਮੀ ਜੀ! ਥੋੜੀ ਕੰਬਦੀ ਅਵਾਜ਼ ਵਿਚ ਓਸਨੇ ਕਿਹਾ! ਉਸਨੁ ਵੀ ਪੁਲਸ ਵਾਲੀਆਂ ਦੀ ਬਦਤਮੀਜ਼ੀ  ਵਿਚੋਂ ਥੋੜਾ ਬਹੁਤ ਗੁਜਰਨਾ ਪਿਆ ਸੀ ਅਤੇ ਓਹਨਾ ਵਿਚੋਂ ਵੀ ਕਿਸੇ ਨੇ ਸ਼ਾਇਦ ਹੀ ਕਦੀ ਢਿੱਲੀ-ਢਾਲੀ, ਬੇ-ਤਰਤੀਬੀ ਢੰਗ ਨਾਲ ਕਦੀ ਇੰਜ ਆਪਣੀ ਪੱਗ ਬਝੀ ਹੋਵੇਗੀ! ਇਸ ਤੇ ਅਸੀਂ ਬਾਅਦ ਵਿਚ ਫੇਰ ਗੱਲ ਕਰਾਂਗੇ! ਓਹਨਾ ਮਿਨੀ ਬਹੁਤ ਹੀ ਬੁਰੇ ਤਰੀਕੇ ਨਾਲ ਸ਼ਰੀਰਕ ਤਸੀਹੇ ਦਿੱਤੇ ਸੀ!

 ਬਾਅਦ ਵਿਚ ਅਸੀਂ ਇਹਨਾ ਸਾਰੀਆਂ ਵਾਪਰੀਆਂ ਘਟਨਾਵਾਂ ਤੇ ਵਿਚਾਰ ਕੀਤਾ! ਮਣੀ (ਮੇਰਾ ਘਰ ਵਾਲਾ) ਨੇ ਮੇਰੀਆਂ ਆਖਾਂ ਵਿਚ ਵੇਖਿਆ!” ਓਸ ਇਕ ਸਕਿੰਟ ਲਈ ਮੈਂ ਸੋਚਿਆ ਸੀ ਕਿ ਤੂ ਟੁੱਟ ਜਾਏੰਗੀ!”

“ਮੈਂ ਉਸ ਦੀਆਂ ਅਖਾਂ ਵਿਚ ਅਖਾਂ  ਪਾ ਕੇ ਪੁਛਿਆ ! ਕੀ ਮੈਂ ਸੱਚੀਂ ਮੁੱਚੀਂ ਟੁੱਟ ਗਈ ਸੀ? “

“ਮੈਂ ਆਪਣੇ ਆਪ ਨੂੰ ਬਦਲਿਆ ਮਸੂਸ ਕੀਤਾ ਸੀ ਜਿਵੇਂ ਤੂੰ ਕੋਈ ਹੋਰ ਹੀ ਬਣ ਗਈ ਸੀ! ਕੀ ਹੋਇਆ ਸੀ?”

ਮੈਂ ਉਸ ਨੂੰ ਸਭ ਕੁਝ ਦੱਸ ਦਿੱਤਾ! ਓਹ ਸਾਡੇ ਪੁੱਤਰ ਵੱਲ ਮੁੰਹ ਕਰਕੇ ਬੋਲਿਆ (ਬਿਨਾ ਕਿਸੇ ਸ਼ਕ਼ ਦੇ ਇਹ ਸਭ ਜੂਨ 1984 ਵਿਚ ਹੀ ਵਾਪਰਿਆ ਸੀ, ਇਸ ਕਰਕੇ ਇਹ ਸਭ ਤੇ ਮੈਂ ਇਸ਼ਾਰਾ ਹੀ ਕੀਤਾ ਹੈ, ਸਿਰਫ ਇਸ ਗੱਲ ਨੂੰ ਛੱਡ ਕੇ ਕਿ, ਇਹ ਸਭ ਮੈਨੂ ਅੱਜ ਵੀ ਪੂਰੀ ਤਰਾਂ ਚੇਤੇ ਹੈ!

“ਤੁਹਾਡੇ ਮਾਤਾ ਜੀ  ਇਕ ਅਸਚਰਜਾਂ ਤੋ ਭਰਪੂਰ ਸਿਖ ਬੀਬੀ ਹੈ, ਤੁਹਾਨੂ ਓਹਨਾ ਜਿਹੀ ਕੋਈ ਹੋਰ ਨਹੀਂ ਮਿਲ ਸਕਦੀ! ਪਰ ਮੈਂ ਉਮੀਦ ਕਰਦਾ ਹਾਂ ਕਿ ਜਦੋਂ ਤੁਹਾਡਾ ਵਿਆਹ ਹੋਵੇਗਾ ਤਾਂ ਤੁਸੀਂ ਵੀ ਆਪਣੀ ਸਿੰਘਣੀ ਨੂੰ ਇੰਜ ਹੀ ਪਿਆਰ ਕਰੋਂਗੇ ਅਤੇ ਇਜ਼ਤ ਬਖਸ਼ਣਾ ਜਿਵੇਂ ਮੈਂ ਕਰਦਾ ਹਾਂ!”

ਕੀ ਕੋਈ ਜਨਾਨੀ, ਕਿਸੇ ਘਰ ਵਾਲੇ ਵੱਲੋਂ ਕਹੇ ਹੋਏ ਇਹਨਾ ਪਿਆਰੇ ਲਫਜਾਂ ਨੂੰ ਭੁੱਲ ਸਕਦੀ ਹੈ?

 ਸੰਦੀਪ ਨੇ ਮੇਰੇ ਵੱਲ ਤੱਕਿਆ ਅਤੇ ਹੌਲੀ ਜਿਹੀ ਅਵਾਜ਼ ਵਿਚ ਕਿਹਾ, ਮਮੀ ਜੀ, ਤੁਸੀਂ ਬੜੇ ਕਿਸਮਤ ਵਾਲੇ ਹੋ ਜਿਹੜਾ ਕੀ ਓਹ ਓਸ ਵੇਲੇ ਰੁਕ ਗਏ ਜਿਥੇ ਓਹਨਾ ਨੂ ਰੁੱਕ ਜਾਣਾ ਚਾਹੀਦਾ ਸੀ

ਅਸੀਂ ਦੋਵੇਂ ਇਕਸਾਰ ਹੋ ਕੇ ਬੋਲੇ, “ਕਿਸਮਤ ਦਾ ਇਸ ਨਾਲ ਕੁਝ ਵੀ ਲੈਣ ਦੇਣ ਨਹੀਂ ਸੀ”

“ਇਥੇ ਮੈਂ ਇਸ ਦੁਖ ਭਰੀ ਗੱਲ ਦਾ ਭੋਗ ਪਾਓਣੀ ਹਾਂ, ਅਖੀਰਲੇ ਇਹਨਾ ਲਫਜਾਂ ਨਾਲ ਕੀ ਇਹ ਮੇਰੀ ਤਾਕ਼ਤ ਨਹੀਂ ਸੀ ਅਤੇ ਨਾ ਹੀ ਮੇਰੀ ਹਿੰਮਤ ਜਿਸ ਨੇ ਮੈਨੂ ਏਨੀ ਬਖਸ਼ਿਸ਼ ਕੀਤੀ, ਇਹ ਸਭ ਤੇ ਮੇਰੇ ਪਿਤਾ ਗੁਰੂ ਗੋਬਿੰਦ ਸਿੰਘ ਜੀ ਦਾ ਹੀ ਮੈਨੂ ਦਿੱਤਾ ਹੋਇਆ ਇਕ ਤੋਹਫ਼ਾ ਸੀ ਮੇਰੇ ਵਾਸਤੇ!”

ਮੈਂ ਤੇ ਸਿਰਫ ਇਸ ਗੱਲ ਤੇ ਹੀ ਆਪਣੇ ਪਿੰਡੇ ਨੂੰ ਹੱਲਾ ਸ਼ੇਰੀ ਦੇ ਸਕਦੀ ਹਾਂ ਕਿ ਮੈਂ ਓਸ ਵੇਲੇ ਆਪਣੇ ਗੁਰੂ ਨੂੰ ਵਾਜ਼ ਮਾਰੀ ਜਦੋਂ ਮੈਨੂ ਇਸ ਮਦਦ ਦੀ ਬਹੁਤ ਜਿਆਦਾ ਲੋੜ ਸੀ!

ਓਸ ਦਿਨ ਅਸੀਂ ਆਪਣੇ ਜੱਦੀ ਘਰ ਤੇ ਨਹੀਂ ਜਾ ਸਕੇ ਪਰ ਕੁਝ ਭਲੇ ਲੋਕਾਂ ਨੇ ਸਾਨੂ ਓਸ ਦਿਹਾੜੇ ਪੁਲਸ ਸਟੇਸ਼ਨ ਦੇ ਬਾਹਰ ਖਲੋਤੇ ਵੇਖਿਆ ਤਾਂ ਓਹ ਸਾਨੂ ਆਪਣੇ ਘਰ ਲੈ ਗਏ!

ਹਾਲਾਂਕਿ ਸ਼ਹਿਰ  ਦੇ ਕੁਝ ਹਿਸਿਆਂ ਵਿਚ ਪਾਣੀ ਦੀ ਸੱਪਲਾਈ ਰੋਕ ਦਿੱਤੀ ਗਈ ਸੀ, ਫੇਰ ਵੀ ਸਾਨੂ ਆਪਣੇ ਘਰ ਵਿਚ ਆਸਰਾ ਦੇਣ ਵਾਲੀਆਂ ਦੇ ਘਰ ਵਿਚ ਪਾਣੀ ਆ ਰਿਹਾ ਸੀ! ਮੈਂ ਆਪਣੇ ਆਪ ਨੂੰ ਬਹੁਤ ਹੀ ਘਿਰਣਤ ਅਤੇ ਗੰਦਾ ਮਸੂਸ ਕਰ ਰਹੀ ਸੀ! ਇਕ ਚੰਗੇ ਸਨਾਨ ਲਈ ਵਾਹਿਗੁਰੂ ਜੀ ਦਾ ਧਨਵਾਦ!ਮੇਰੇ ਘਰ ਵਾਲੇ ਮਣੀ ਨੇ ਮੈਨੂ ਆਪਨੇ ਆਪ ਨੂੰ ਸਾਫ਼ ਕਰਨ ਵਿਚ ਮੇਰੀ ਮਦਦ ਕੀਤੀ! ਮੈਨੂ ਨੁਹਾਇਆ, ਮੇਰੇ ਕੇਸ ਫੇਰ ਤੋਂ ਸੰਵਾਰੇ ਜਿਹੜੇ ਕੀ ਪੁਲਸ ਵਾਲੀਆਂ ਨੇ ਮੇਰੇ ਸਜਰੇ ਕੇਸਾਂ ਨੂੰ ਖਰਾਬ ਕਰ ਦਿੱਤਾ ਸੀ, ਹੁਣ ਮੈਂ ਫੇਰ ਤੋਂ ਸੋਹਨੀ ਦਿੱਸਣ ਲੱਗ ਪਈ ਸੀ! ਕੋਈ ਮੈਨੂ ਵੇਖ ਕੇ ਇਹ ਜਕੀਨ ਨਹੀਂ ਸੀ ਕਰ ਸਕਦਾ ਕਿ ਮੈਂ ਆਪਣੇ ਪੈਰਾਂ ਵਿਚਾਲੇ ਜਖਮਾਂ ਵਿਚੋਂ ਵਗਦੇ ਖੂਨ ਦੇ ਬਾਵਜੂਦ ਵੀ ਆਪਣੇ ਪੈਰਾਂ ਤੇ ਖੜੀ ਵੀ ਹੋ ਸਕਦੀ ਹਾਂ ! ਫੇਰ ਵੀ ਇਸ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਜਦੋਂ ਮੈਂ ਆਪਣੇ ਪੈਰਾਂ ਦੇ ਜਖਮਾਂ ਦਾ ਇਲਾਜ਼ ਕਰਵਾ ਰਹੀ ਸੀ, ਮੈਨੂ ਕਦੀ ਕੋਈ ਪੀੜ ਨਹੀਂ ਹੋਈ, ਜਖਮਾਂ ਦੀਆਂ ਕੁਝ ਨਿਸ਼ਾਨੀਆਂ ਅਤੇ ਖਰਿੰਦ ਜਰੂਰ ਸੀ ਜੋ ਰਹੀ ਗਏ ਸੀ, ਮੇਰੀ ਸੁਣਨ ਦੀ ਤਾਕ਼ਤ ਕੁਝ ਘੱਟ ਜਰੂਰ ਗਈ ਸੀ, ਥੋੜੀ ਕਮਜ਼ੋਰ ਹੋ ਗਈ ਸੀ, ਪਰ ਇਹ ਕੁਝ ਖਾਸ ਨਹੀਂ ਸੀ!

ਮਣੀ ਜੋ ਕਿ ਖੁਦ ਵੀ ਇਕ ਡਾਕਟਰ (physician) ਨੇ, ਮੇਰੀ ਚੰਗੇ ਤਰੀਕੇ ਨਾਲ ਜਾਂਚ ਕੀਤੀ ਪਰ ਮੇਰੇ ਪਿੰਡੇ ਤੇ ਏਨੀ ਕੁੱਟ ਖਾਣ ਦੇ ਬਾਦ ਵੀ, ਜੋ ਮੈਂ ਸਹਿਣ ਕੀਤੀ, ਕੋਈ ਵੱਡੇ ਜਖ੍ਮ ਨਹੀਂ ਸੀ!

ਸਾਨੂੰ ਆਸਰਾ ਦੇਣ ਵਾਲੇ ਜੋ ਕਿ ਹਿੰਦੂ ਸੀ, ਸਾਨੂ ਪਾਓਣ ਵਾਸਤੇ ਸਾਫ਼ ਸੁਥਰੇ ਕਪੜੇ ਦਿੱਤੇ, ਬਹੁਤ ਹੀ ਚੰਗੇ ਸਵਾਦ ਵਾਲੀ ਰੋਟੀ ਖੁਆਈ, ਆਰਮ ਕਰਨ ਲਈ ਸੋਹਣਾ ਪਲੰਘ ਦਿੱਤਾ ਅਤੇ ਸਾਨੂ ਇਹ ਅਹਿਸਾਸ ਵੀ ਕਰਵਾਇਆ ਕਿ ਅਮ੍ਰਿਤਸਰ ਸ਼ਹਿਰ ਵਿਚ ਵੀ ਚੰਗੇ ਸੁਭਾਓ ਦੇ ਲੋਕ ਵੱਸਦੇ ਨੇ! ਅਸੀਂ ਆਪਨੇ ਪੁਰਾਣੇ ਕਪੜੇ ਜਲਾ ਦਿੱਤੇ, ਆਪਣੇ ਕੋਲ ਮੈਂ ਆਪਣੇ ਪੁੱਤਰ ਸੰਦੀਪ ਵੱਲੋਂ ਦਿੱਤੀ ਹੋਈ ਓਹ ਕਮੀਜ਼ ਯਾਦਗਾਰ ਰਖਣ ਲਈ ਸਹੇਜ ਕੇ ਰਖ ਲਈ! ਸਾਡੇ ਅਮ੍ਰਿਤਸਰ ਦੇ ਜੱਦੀ ਘਰ ਵਿਚ ਇਹ ਅੱਜ ਵੀ ਸਾਂਭ ਕੇ ਰਖੀ ਹੋਈ ਹੈ!

ਮੇਰੇ ਕੋਲ ਓਸ ਵੇਲੇ ਦੇ ਅਮ੍ਰਿਤਸਰ ਤੇ ਲਿਖਣ ਲਈ ਹੋਰ ਵੀ ਬਹੁਤ ਕੁਝ ਹੈ, ਓਹ ਬੋ, ਗਰਮੀ, ਕੀੜੇ ਮਕੌੜੇ ਅਤੇ ਪਵਿੱਤਰ ਸਰੋਵਰ ਜਿਹੜਾ ਲੋਥਾਂ ਨਾਲ ਪੱਟਿਆ ਪਿਆ ਸੀ ਅਤੇ ਖੂਨ ਨਾਲ ਲਾਲ ਹੋਇਆ ਸੀ ਪਰ ਇੰਟਰਨੇਟ ਤੇ ਇਸ ਬਾਬਤ ਤੁਹਾਨੂੰ ਬਥੇਰਾ ਕੁਝ ਲਿਖਿਆ ਮਿਲ ਜਾਵੇਗਾ, ਮੈਂ ਤਾਂ ਸਿਰਫ ਆਪਣੀ ਹੱਡ-ਬੀਤੀ ਹੀ ਲਿਖ ਰਹੀ ਹਾਂ!

ajmer-kesri

ਅਜਮੇਰ ਸਿੰਘ ਰੰਧਾਵਾ !!

 

Sikh martyres Jinda & Sukha wrote a letter to President giving account of atrocities by police and army, justified their reason to raise weapon

I would love to give introduction and some information of two Sikh martyrs who kissed the rope before execution like Bhagat Singh, Rajguru and Sukhdev .

Before this on hearing the verdict of execution, they distributed sweet (Barfi). These two brave youths avenged the attack on Golden temple in Operation Blue star and atrocities by Indian army by killing the former Lt. General Aru Sridhar Vaidya who was commanding in chief of Indian army and supervised the invasion. These two braves also shot dead Lalit Makan, Arjun Das and Dharamdas shastri for thei alleged role in killing of innocent Sikhs in November 1984. Both of them were hanged on 9th Oct. 1992 soon after Shankar Dayal Sharma was sworn in President of India.

It is always to keep in mind that these two braves were hanged to appease the President as his daughter and son-in-law  Lalit Makan were gunned down in his house at Rajauri Garden, west Delhi for his alleged role in Sikh genocide 1984.

 jinda-sukhaThe revenge by Bhai Harjinder Singh Jinda and Sukhdev Singh Sukha.

They wrote a letter to President giving account of atrocities by police and army and justified their reason to raise weapon as the Sikhs could never get justice in India and they were compelled to take the law in their hand too punish the guilty responsible for killings of innocents.

We, hereby salute their valor and high spirit which they stood guard and followed the true path of martyrdom for the sake of religion and to get avenge from the tyrants.  The guru has directed to Sikhs when all the methods to get justice fails then its advisable to raise the weapon and punish the guilty. They walked on the right path and sacrificed their lives for our to-day.

The founder of Sikh religion, the first guru—Guru Nanak Dev ji said….TRUTH IS HIGHER BUT HIGHER STILL IS TRUTHFUL LIVING.

And the duo set an example of truthfulness in their life noy only by punishing the culprits but also by proving in Court the distinct identity and importance of Sikh tenets, its distinct identity in life of a Sikhs. The fearless fighters sacrificed but not pleaded mercy from Indian govt. but instead wrote a letter to president. The copy of letter is attached in the end of book.

Special note from Advocate Manjit Singh Butalia:-

“We few lawyers wanted to held them before their execution because they had not challenged the verdict of the trial court. Supreme Court judges sat at night before their execution and they were ready to stay their execution only on one ground that we should produce Vakalatnama from them or their family members. We could not get the Vakalatnama from them or their family members as they had instructed their family members not to challenge the verdict of death sentence. After few hours they were hanged and Supreme Court did not accept our plea in the absence of Vakalatnamas. They were real heroes and true Gurus Sikhs. “

Harjinder Singh Jinda

Harjinder Singh Jinda was a member of a Sikh organization Khalistan Commando Forced one of the two assassins of Arun Vaidya. He was responsible for three high-profile killings; Arjan Dass, Lalit Maken and Gen. Vaidya. He was born in 1961 at Amritsar and was martyred on 9th October 1992 at Pune.

‘………………….punished former Chief of army staff General Arun Sridhar vaidya who was responsible for invasion on Golden temple by Indian army and was shot dead at Pune.

When the Singhs were being hunted down and killed, one of the Sikhs’ most bitter enemies, Kazi Noor Mohammed was forced to write in his memoirs,

“Do not call the Sikhs ‘dogs’. They are in fact lions: in the battle-field they are courageous like bold lions. How could a warrior who joins the battle roaring like a lion, be compared with a dog? If you wish to be proficient in learning their manner of fighting it is such that one and all praise them for it. O swordsman, if you wish to learn the art of war, learn it from them, as they face the enemy like heroes and also get out of the scene of action safely.”

In a repeat of history, the Delhi Police Commissioner, Ved Marwah in his memoirs wrote the following about Bhai Harjinder Singh Jinda and his committment to Khalistan :

“Jinda Was No Ordinary Man”

Ved Marwah Uncivil Wars: Pathology of Terrorism In India p. 16

“Harcharan Singh (sic) alias Jinda who was convicted and later hanged for the murder of the former Army Chief, General A.S. Vaidya was no ordinary man. He was arrested twice by the Delhi Police during my tenure as Commissioner of Police, Delhi. This self-confessed killer was not just a ruthless killer. He had another side to his personality: he could be charming and humorous even when injured and battling for his life. When I met him after his arrest by the Delhi Police he seemed anything but a psychopath. He had psychological traits which made him and extraordinary person, but these did not make him mentally unsound.”

First Arrest

“Jinda was first arrested by the Delhi police in 1985, more by chance than owing to any previous knowledge that he was an active terrorist. A spate of bank robberies had taken place in Delhi and the Delhi Police was under criticism for its inability to stop them. I was daily being taken to task by the Union Home Minister and the media. Till Jinda’s arrest there was no evidence about any possible link between these bank robberies and terrorism in Punjab. Jinda fell into the police net on the basis of a low-grade information about the theft of a car. Only on the day after his arrest when during interrogation, Jinda started speaking about Pakistani plans for shootouts at public places and killings of Hindus to create Hindu-Sikh riots, that that the police realized that they had a big catch in their hands. The acting Additional Commissioner of Police Crime, RK Sharma rang me up in my house on a Sunday morning to inform me about his arrest.”

Interrogation

“I decided to go to the Crime Branch Interrogation Centre to talk to this very ordinary looking man for over one hour and was fascinated by not only what he told me but the way he narrated his story. He had no fear and no remorse. He rather enjoyed talking about his many escapades in which the police, like in the Bombay films, did not come out very well. Here a young man from Amritsar had actually succeeded in getting the better of the entire Delhi Police force and that was something which gave him tremendous satisfaction. He underplayed his role as a terrorist in the cause of achieving Khalistan, perhaps intentionally but had no hesitation in boasting about his daring bank robberies in broad daylight in the heart of Delhi. He insisted on calling Delhi ‘Rajdhani’ and obviously derived immense satisfaction from taking on the police in Delhi. Even at that stage though we did not know much about his terrorist antecedents, he talked in terms of ‘them’ and ‘us’. It struck me even then that he was more forthcoming and almost friendly with me, because here he was talking to a head of the Delhi Police on an equal footing. He had no hesitation in telling me about his unhappy childhood and his petty crimes in Amritsar.”

“He was later transferred to Gujarat from where he escaped while being escorted from the jail to the trail court. After his escape he started committing even more daring acts of terrorism. He became a feared terrorist and was well-known both in Delhi and Punjab. We learnt about his involvement in the killing of Lalit Makan the Congress MP and Arjun Dass, a close Sanjay Gandhi associate.”

Second Meeting

“He was arrested for the second time by the Delhi Police in August 1987, in an encounter in the Civil Lines area in which he was seriously injured. He was taken to the Civil Lines Police Station before the arrival of an ambulance. This time there was no doubt that the Delhi Police had scored a major success. His capture was the result of close cooperation between the Delhi Police and the Intelligence Bureau. I learnt about the encounter on my wireless set and rushed to the Police Station within a few minutes. Jinda was being moved into the ambulance on a stretcher when he saw me. He immediately recognized me and greeted me with a big smile. He must have been in terrible agony, but that did not stop him from joking. ‘Mubaraq ho. Ab to app ko bahut bari taraqui milegi. Delhi Police ne mujhe pakar liya hai’ (Congratulations. Now you will get a promotion-Delhi Police has been able to arrest me). Here was a man almost on his deathbed and yet he had the audacity to poke fun and laugh. I could see that he was enjoying the thought of not only making the supreme sacrifice for the cause in which he believed, but of being able to be one up on the Commissioner of the Delhi Police.”

“He was take to the Army Hospital in the cantonment, because of security considerations, and miraculously, he responded to the treatment after a successful operation. I went to see him along with DCP Crime, this time not to interrogate him but to see someone who had earned my respect. I must confess that then my feelings for this man were not that of professional police officer for an outlaw but were mixed with some warmth and admiration.

Ideology

It is important at this point to say something about our system. Here was a known killer of the former Army Chief being treated by the army doctors, who performed nothing short of a miracle in saving his life. When I entered his room he was lying on the bed as the lower portion of his body was completely paralysed. The doctors could not say at that time whether he would ever be able to use his legs again. On seeing me he again greeted warmly and apologized for not being able to get up. He thanked me for coming to see him. He behaved as if he was talking to an old friend. He was in a talkative mood and this time told me all about the terrorist movement in Punjab and their ultimate goal of Khalistan with Pakistani help. He bragged about his escape from Ahmedabad and had absolutely no fear of death. He was certain that his end was not too far off and tauntingly told me that this time the Delhi Police would not make the mistake of handing him over to the Gujarat Police. When I told him that we would not hand him over to the Punjab Police as he suspected but to the Maharashtra Police to face a trial, he could not believe it. We later did hand him over to the Maharashtra Police. He was tried in the Pune Jail for a protracted trial and later hanged.”

“Terrorism gave Jinda a cause to live for. There was no question of diverting him from the path which he had chosen for himself. He justified the most heinous of his crimes in the name of the ‘Panth’. It is the combination of political factors and such traits in their personality that attracts people like Jinda to the terrorist movement. The sole aim of his life became commission of terrorist acts, which he firmly believed would in the end succeed in achieving their goal of ‘Khalistan’. There is no scope for any negotiations with such men. But such personality traits are seen only among the hard-core terrorists. There are of course other types of person among terrorist their supporter and sympathisers who are more amenable to negotiations and compromise.”

(Extract from Ved Marwah Uncivil Wars: Pathology of Terrorism In India)

 

Sukhdev Singh Sukha

  Sukhdev Singh Sukha was a member of the militant organization Khalistan Commando Force and one of the assassins of Arun Vaidya, the Chief of Indian army at the time of Operation Blue Star and also the architect of Operation Blue Star. He was born in 1962 at Sri Ganganagar, Rajsthan and martyred with Harjinder singh jinda on 9th October 1992.

He joined with his friend Bhai Baljinder Singh Raju to avenge the disrespect of the Sikhs. He then met with Bhai Harjinder Singh. All three had faith in Bani and Sikhi. Bhai Sukhdev Singh’s mother was so filled with love for the Panth, that she did Ardas that Bhai Sukhdev Singh and Bhai Harjinder Singh may achieve their mission. She gave her sons over to the Guru.

Bhai Harjinder Singh and Bhai Sukhdev Singh made Delhi the centre of their activities. Delhi was where the 1984 pogroms had taken place. The government began to broadcast the pictures of these Singhs on TV and the killers who had taken part in the November massacre were afraid to leave their houses.

Bhai Sukhdev Singh and Bhai Harjinder Singh then decided to punish the general who had planned the 1984 Darbar Sahib attack: General Arun. S. Vaidya After retiring from the army, Vaidya had moved to Poona. Bhai Harjinder Singh and Bhai Sukhdev Singh had reunited in Punjab and went to Poona together. They arrived on August 17, 1986. They went to the house that Vaidya was living at, to find he had moved. They asked the servant in the house where Vaidya had moved to but he wasn’t clear and they had trouble understanding his language. They went in the general direction and a couple days later saw Vaidya’s guard outside the house. They began to make regular rounds to find when Vaidya would come out.

On August 19, 1986 at around 11am, they saw Vaidya’s wife come out with an umbrella and the General followed. Vaidya himself was driving the car. He went to the Sabzil Mandi bazaar and bought sabji.. Bhai Harjinder Singh and Bhai Sukhdev Singh were on a motorcycle following them. When Vaidya was returning to his car, Bhai Harjinder Singh pulled the motorcycle beside the car and Bhai Sukhdev Singh began to shoot. Vaidya’s died on the spot.

The Singhs shouted jaikaaray and made their getaway. The Singhs had also wanted to kill Gen. Dayal, another officer responsible for the attack, but decided now was not the time. They returned to the house they had rented, changed clothes and took a bus to Bombay. From there, they went to Durg and then Calcutta by train.

On September 17, 1986, Bhai Sukhdev Singh returned to Poona to get their weapons that were left there. He along with another Singh got into an accident with a truck and were arrested. They were tortured for five months and then for a year and a half were kept in leg irons.

A year later, Bhai Harjinder Singh and Bhai Satnam Singh Bawa were arrested from Delhi at Gurdwara Majnoo Daa Tilla. Bhai Harjinder Singh was shot in the legs so he couldn’t walk. They tried to cut his leg off as well but a Bengali doctor refused to allow this. Bhai Harjinder Singh was tortured for 4 months and then taken to Poona. Bhai Bawa was given to the Punjab police who then killed him.

In Poona, Bhai Sukhdev Singh and the other Singhs had finished doing Ardas after Rehras Sahib, and then shouted Jaikaaray. Bhai Harjinder Singh was in a nearby cell and also shouted jaikaaray. Bhai Harjinder Singh had recognized Bhai Sukhdev Singh’s voice. Finally the two had been reunited. They stayed together from there on in, and will also be remembered in history together as Sukha and Jinda.

The Indian Government executed Bhai Harjinder Singh Jinda and Bhai Sukhdev Singh Sukha on October 9, 1992 in Pune.

They were responsible for punishing Gen. Vaidya the architect of the 1984 attack on Sri Darbar Sahib. They had tracked him down and shot him dead and in the process, restored the honor and dignity of the Sikh people.

Both of these martyrs Bhai Sukhdev Singh Sukha and Bhai Harjinder Singh Jinda wrote a letter to then President of India Shankar Dayal Sharma in a fearless manner, giving a truthful account of their deeds and duties as being a Khalsa to Sikh nation. 

Kindly view this letter:

Letter of Bhai Sukhdev Singh Sukha and Harjinder Singh Jinda To the President Of India Shankar Dayal Sharma.

The hearing began in the case of General Vaidiya’s murder. On Aug. 10th, 1985, Harjinder Singh “Jinda” and Sukhdev Singh “Sukha”, gunned down General Vadiaya after his retirement from the Indian army. General Vadiya was the Chief of the Indian Army who ordered the attack on the holiest of the holy shrines at Amritsar and elsewhere in Punjab during 1984 operations. On Oct. 9, 1992, Sukhdev Singh “Sukha” and Harjinder Singh “Jinda” were hanged until death in Puna Jail.

Copy of the said letter;

“EK ONKAR” “Rastrapati Ji”,

Kindly accept Sat Sri Akal (Salute to the Revered Timeless) by the two Singhs (Sikhs) on their way to martyrdom.

Theoretically, it is appropriate to clarify that our Rastrya (nation) is the Khalsa Panth absorbed into the Guru Granth Sahib. We took the first vital steps towards the destination of Khalistan by touching our foreheads with the footdust of this nation. The elimination of Mr. Vaidya, the General of your forces engaged in destroying the Khalsa Panth and its power, was a holy act on our difficult path of martyrdom. It has once again brought the historical truth to light the urge of the Khalsa Panth to breathe in freedom, its self respect and honor cannot be finished.

We wish to clarify that we are not addressing these words to you as an individual but as the head of a State that is communal and Brahmanical. Whosoever occupies, occupied, or will occupy this throne of falsehood, will be to us a symbol of oppression and cruelty. We have not forgotten that when the “wedding party of sin” (the Indian Armed Forces) was invading our Temple of God, a heathen in the garb of a Sikh, was sitting in your place (Zail Singh). The Panth will “Settle its accounts” with him, when Sikh history imparts its justice.

By invading the Golden Temple, your army tried to rob a nation of saint-soldiers, living in its divine simplicity, of its joy. It gave us a feeling once as if you succeeded in driving us to a point of utter frustration. But by performing our historic task we have reminded you that our heroes like Sukha Singh, Mehtab Singh, Udham Singh are shadowing your tyrants like Wazida, Lakhpat, Rebeiro, Dawyer.

We accept with great joy the penalty of death pronounced by your court of law alienated from the divine blessings and fallen to the Brahmanical reflexes, for whatever we undertook in accordance with the vision of the Khalsa. By touching the sharp edge of death we are moving towards fullness. Without martyrdom the magnificent fair of life cannot come into full swing.

The thought of Brahmanical reflexes had in fact started attacking the consciousness of the Sikh Gurus ever since its emergence, but on 15th August after assuming imperial authority, the Brahmanical thought took still nastier forms. In the last few decades, your parliament, courts, educational institutions and media have tried to humble the consciousness of the Khalsa through the subtler force of majoritarianism and material monopoly.

We are not hesitant to say that conspiracies have been hatched and very subtle arrangements have been made at the psychological level to destroy the great institutions, traditions, originality and unique sovereignty of the Khalsa Panth. The destruction of the Akal Takhat by sending in lakhs of soldiers was part of this larger conspiracy. In this situation, it hardly needs saying, how justified it was to eliminate the military general Vaidya who was not only a part of this conspiracy but also responsible for its planning and implementation. By completing this holy and historic task, we have unburdened our conscious and proved that the real force of the Khalsa Panth is and will remain free from the Brahmanical reflexes in all ages. By cautioning the Khalsa Panth of these strategies we have won the love of Guru Gobind Singh.

The thought of Brahmanical reflexes had in fact started attacking the consciousness of the Sikh Gurus ever since its emergence, but on 15th August after assuming imperial authority, the Brahmanical thought took still nastier forms. In the last few decades, your parliament, courts, educational institutions and media have tried to humble the consciousness of the Khalsa through the subtler force of majoritarianism and material monopoly.

When nations wake up, even history begins to shiver. During such momentous movement a Banda Bahadur bids farewell to his peace-dwelling and destroys a state of oppression like Sirhind, a Che Guevera turns down a ministership of Cuba, loads a gun on his breast and entrenches against the enemies in the forest of Bolivia, a Nelson Mandela rejects the ideology of apartheid and prefers to spend his life in a dark prison cell.

…And we have the privilege of being in the loving care and companionship of that unique general of the Panth Sant Jarnail Singh Bhindranwale, blessed by the valiant and transcendental visionary Guru Gobind Singh. We are tiny particles of dust of the numberless heroic jewels of the Sikh nation who walked on the sharp edge of the Dagger, the Khanda, given to us by Guru Gobind Singh. Only the chosen few get the honor of laying down their lives for the nation. We are proud of this honor.

In no way is it just to accuse us of an unheroic act in attacking an unarmed man. We wish to remind you that by misusing your vast resources you have tried your utmost to humiliate us as a nation. In every field you have tried to make us helpless. You are empowered with your massive armed force and equipped with the most advanced military arsenal of our times. You have made us inadequate to fight you in the open battlefield. In the present situation there is no other alternative with us except to use the kind of method that we employed on General Vaidya to punish the tyrants for their evil deeds. When you are already waging an undeclared war on our nation, guerilla attacks are not our pleasure but an historical compulsion. Please do not forget this fact of history that during the 18th century when robbers like Abdalis and Nadarshah were driving your daughters to Kabul like enroped flocks of animals, our brave Sikh brethren from their jungle and desert hideouts fiercely attacked the robbers. Even the frightened enemies had to praise our courage. We are fired with a generous humanism. Our grip extends to the entire life with its beat and vibration.

In the last one decade there have been very few “actual” encounters between our soldiers and your forces. But wherever those have occurred, the evidence in them of our valor and radiant heroism, we are sure, is preserved in your confidential files. A fragment of that fact once in a while slips through your newspapers as well. Our Khalsa vigor is an aspect of our spiritual heritage. In such moments of fight, spirituality radiates through the flasher of our swords.

Oh. President representing Brahmanism Hear the words of Kazi Noor Mohammad, an eye witness during the seventh invasion (1764 AD) of Ahmad Shah Abdali: “It looks as if guns were invented by these Sikhs and not by Likman. Although many possess guns yet none understands them more than the Sikhs. My observation will be confirmed by the 30 thousand brave soldiers who fought against them.”

When we attacked General Vaidya, apart from his own arms, he had with him a well equipped body guard. Our attack was part of the same battlefield strategy that was once used by our hero-martyrs Madan Lal Dhingra, Bhagat Singh, Kartar Singh Sarabha, and even today it is used by revolutionaries the world over, and considered right.

Through you we also wish to transmit this message that we harbor no enmity towards the great people and land of India. We are not touched even a bit by hatred for the people of India. Not only to embrace our people, we are restless to embrace the whole of the earth and the sky. We intoxicatedly remember the entire cosmos and worship the life that vibrates in it.

The Khalsa is inseparably and lovingly related to the people of India: the millions of Dalits, the workers who earn their living through honest labor, the Muslims and other minorities, and all those homeless and destitute who have remained oppressed and exploited by Brahmanism for centuries. They are all our kith and kin. Our Master Rider of the blue horse (Guru Gobind Singh) recognized them much earlier. All those termed by the proud Brahmin the lowly, scavengers, shoemakers, mean-professioned, became the beloved sons of our Tenth Father. They rose to Generalships in the army of the Khalsa. Thrones and honors kissed them. Without fantasizing, we are declaring in the midst of history that our gurus loved the meta-poetry (bani) of those divine souls drenched with a passion for the Dalit brotherhood. The gurus bestowed the highest honors on them and included their (bani) along with their own in the Guru Granth Sahib. The spirit of the Dalits and their pain are aspects of our own anguish. We are touched by the warmth of their door. There is hardly any Agro Industry in the Punjab. Heavy industry is totally non-existent. We want to keep our capital safe for our development, but you are exploiting us as if we are your colony.

You have not spared an effort to hurt our culture. By damaging our heritage you want to keep us in a miserable psychological state so that we may feel embarrassed over our language, culture and proud history. Your strategy is to destroy us from “within” and reduce us to your slaves so that you may keep on sucking our blood without any protests.

You want us to adopt your rootless culture of razzle dazzle as our way of life. You want to uproot our culture and take away our source of life. You think our history is not worthy of any significance.

But now we keep track of your every step. Still a vital blood flows in our veins. We will structure our way of life according to our originality and history. Every one knows that without getting political power it is not possible for any nation to guard its culture. It is not possible for us to keep our cultural and national identity intact without establishing a Sovereign Khalistan. We are offering our heads for achieving our goal; Our True Guru has granted a sovereign State to us, we have won his blessing by offering our heads.

Now we beg to address our Khalsa Panth. The way of the Khalsa is very trying. It is sharper than the edge of a Dagger, the Khanda, and subtler than a strand of hair. The Khalsa panth at all cost has to preserve the original and pure form of its great struggle. The struggle is a diving journey inspired by a transcendental consciousness. During these moments of struggle, the Khalsa is to remain continuously absorbed into the Guru Granth Sahib, no matter how many cruelties are inflicted and provocation is given, the Khalsa has to keep its cool and discipline in the horrible and barbaric situations. The Khalsa has to preserve its traditions established by the valiant Sikhs through martyrdom.

In comparison with the violence of the enemy, the violence of the Khalsa abounds in divine qualities and spiritual blessings. The Khalsa has to give such a divine form and beauty to its struggle that it may even burden the conscience of the enemy with the realization of its own sin. Such a moral miracle will be possible only if the concentration on the guru of the Khalsa and rhythm of the Guru Granth Sahib remain fully connected and intact. The Guru Granth Sahib is the main source of our life-stream and spiritual power. It is also the chief spring of our inspiration to advance towards the destination of Khalistan.

If concentration on the guru and the internal rhythm of the Guru Granth Sahib are the main lifestream of the Khalsa, then it is also necessary to say a few words to the militants who are intensely in love with the stream. In this terrible crisis of history, the concentration on the guru and the rhythm of the Guru Granth Sahib are the only armed brigades. The are the army of the Timeless Man, and they are the guardians of the pure consciousness of the Khalsa. We too had the honor of having been the humble parts of these forces.

It is true that we are confronting a vast material State that has at its command all the worldly resources, horrifying scientific inventions, a capacity to attack and disable the intellect and praxis. The state can also weaken us through penetration and strategies of its intelligence. It can also develop shocking plans and more than everything else it can assemble huge armies. But so what? The Khalsa can send shivers into the spine of the enemy and shake its State with its spiritual might. It is not the bodies alone that fight. It was only a miracle of the Khalsa spiritual strength that even with its tiny number the Khalsa subdued the 10 lakh army of the Mughals at the Castle of Chamkaur.

During the last decade we have overwhelmed this State of Brahmanical prejudices with martyrdom. We have been hailed in all corners. Now the matter is not restricted to the possible creation of Khalistan alone. Several oppressed nations of India have come out in the open to fight for their freedom. The Dalit brothers, specially are liberating themselves from the destructive influence of Brahmanism. The so-called hue and cry made for “unity and integrity” does not touch them any more. They have well understood the cunning of Brahmanical rulers veiled behind this hue and cry. Although these are magnificent accomplishments of our movement still we are not free from big mistakes and inadequacies.

Sometimes, during our struggle we do commit something that is neither morally unique nor pious. Although we are marching towards our goal of achieving Khalistan with determination yet still we have not fully learnt how to go through this difficult terrain. The understanding and experience of our struggle are still diluted and surfacial. We have still to develop a large vision that crosses decades and centuries.

We still keep doing something that gives our enemy an opportunity to question our proud and glorious history. Several times our arms have wrecked the joys, blossom and aspirations of those who had never directly hurt our movement.

It appears sometimes as if we were trying to strike terror among the people although our commitment to the ninth Guru is nether to terrify nor to get terrified.

Oh valiant brethren! Why are not our actions and deeds firing many colors and proliferating unusual effects of life? Why to give the people an excuse that a wide gap has appeared between our mind, word and action. When we sin we become drunk with victory of fault and when we lose we do not investigate its reasons. As a result a chain of losses begins. In such a situation we do not urge to re-integrate ourselves with the transcendental consciousness of the Khalsa, nor do we seek the blessing of the guru’s abode.

We are becoming martyrs, going to jails, bearing every attack of the enemy, but still in our basic thought, the gratitude to the Lord, patience and commitment have not fully penetrated. Sometimes, the glory of the material status, its power and shine captivate us, as a result we fall prey to material values and miracles. During such moments we do not passionately pray before the Guru Granth Sahib to keep our unique character by heroism and spirituality higher and untouched by narrow ends.

Several times we suffer from indecision. To free ourselves from this state instead of getting close to the guru we rather choose distance. We are forgetting that during disagreement among us, the resolution of the entire Khalsa adopted at the Akal Takhat can cement and guide us. Oh Brave brethren drenched with the divine love of the sixth guru, Hargobind Sahib! Why don’t you flock towards the Akal Takhat for guidance? Our guru spreading his arms awaits us.

At times, our baseless suspicions divide us into groups. We then patronize our group, and to protect it we unnecessarily accuse the other groups of crossing all limits. Our sword proudly falls on their necks. The militants of the Khalsa Panth have to meet this serious challenge of the moment with determination and love, with a prayer for the enhancement of wisdom and humility of the mind. Will you follow this path our brethren after we are gone?

Oh militant comrades of the procession of those walking with their heads on the palms for sacrifice! You carry on your shoulders the historic responsibility of recognizing the mail lifestream and original form of the Khalsa and also the responsibility of identifying the deadly current of ignorance and temptation. This current, to obtain power, has fallen to act on Brahmanical practices. Please understand the narrow motives concealed behind this current that on surface appears to be proSikh. Wage a war against it. Its divisive tendencies are to be strongly resisted. The people associated with this current have lost their faith in the higher struggle. They have been tempted by the Brahmanical reflexes and its allied power hierarchies. They have begun to like evanescent colors. Their actions do not reflect the message of Guru Nanak’s transcendental journey: Nor do they flash any divine experience. Their state mirrors a schism between the mind and word. Declare that these people are false and they have disowned our panth. If they want to be owned by the Khalsa and they feel that there is still in them a secret of truth enunciated by Guru Nanak let them advance straight towards Khalistan otherwise they will be thrown into the dustpan of history.

Respected President Ji! After these few words with our nation we again address you. When we bid farewell to the world it will be a strange meeting of numerous contradictions. If we look at the world insightfully, the while world is in turmoil, a powerful turmoil. With an alien eye it may look to be a destructive development. It feels as if human peace and action were going through acute disturbance, but the people with intuition can see all this from a difference angle altogether.

The humankind’s aspiration for freedom cannot be controlled in any system. Any effort to destroy this aspiration gets selfdefeated in history. We are witnessing the same happening in our times also.

The same passion for freedom burning like a flame in the depths of humankind gave birth to the great French Revolution. And then in the beginning of this century, we are watching the tumbling of the Tsarist regime that had become a symbol of terror and tyranny.

But whatever systems have been built up on the ruins of Tsarism, have not succeeded in fully preserving and understanding the rush and aspiration of human freedom. All these massive artifices are showing cracks. What an irony of our times that the same people who had raised our ancestors’ flag of freedom became the murderers of freedom.

We are saying this with deep sorrow that the same lands where lakhs of people laid down their lives fighting the Nazis, toda are providing shelter to the murderers of the Sikhs. Wee mean the country of the great Tolstoy and Lenin, the Soviet Union and its East European allies, where the killers of hundreds of Sikh youth like Buta and Rebiero are taking shelter under the pretext of holding diplomatic responsibilities. But at the same time fresh winds of freedom blowing in these countries give us a hope that these countries will not remain safe shelters for these murderers of mankind. To us that time is not distant when the people of these countries will hand over these criminals to us so that the can be given their due in the court of the Khalsa.

The dark storm of oppression that is blowing over the Khalsa and the fire of tyranny that is burning it, must have touched at least a little, the soul of Lincoln, Emerson, Rouseau, Voltaire and Shakespeare because the people fighting for their freedom and sovereignty have the same blood flowing in their veins. But permit us to say that among the people of these great men’s lands the urge to push their tradition is dying. Their spiritual values are drying up, they are unable to see the new sun shining in the land of Khalistan whose rays will also radiate the universe. We are hoping that they will accept the reality of Khalistan. We appeal to the United Nations to recognize the face of Khalistan so that the Khalsa nation can make historic contribution to the international peace and security according to the UN Charter, and may also help in building up their relations of tolerance and goodwill among India and its neighbors.

Honorable President Ji! We are going to look into the eyes of death because we believe that the flag of life’s glory flies even in the face of death. Not only us, but our entire nation has taken birth from the art of keeping its head on its palm. The guns of evil will never frighten us.

In this era of betrayals we are going to meet our beloved in full faith and wholesomely. Our martyrdom will radiate only integration. We are feeling that martyrdom is a transcendence of all fears, greeds and obscene physical desires. The consciousness of the Khalsa is the most pure and luminous during the moments of martyrdom.

We have chosen the path of martyrdom so that the ever fresh face of the Khalsa and its unique glory can come into its own once again, and enlighten the whole world. In their eternal joy and grace the Gurus blessed us with a spark of their love. With that spark we are on full blossom. Our love for freedom has taken us to the state of cosmic equilibrium sahaja.

We have met our True Guru. The fairies of the eternal symphony have arrived to congratulate us with all their families at this momentous hour of meeting.

Martyrdom has a unique relish of its own. How wonderful is it beyond the material and ineffable emotions!

Please tell our nation not to be sorrowful. The sweet remembrance of, Guru Gobind Singh flows like a river in us. Please tell them that the stream of love of the Tenth Guru has already gushed forth in us. We are going towards the altar in higher peace and divine poise. We are riding a unique boat that the currents are unable to sink.

The maker has put together all the wood perfectly, O Nanak my Lord will not let even lakhs of sea currents sink the boat.

The Khalsa has upheld the belief that whenever death comes, accept it with joy. For this reason please tell all those warriors of the world bringing with the fire of freedom not to let go-mellow the challenge thrown by us. Let their bursting bullets become a lament on our death.

The rope of gallows is dear to us like the embrace our Lover but if we are condemned to be the prisoners of war, we will wish bullets to kiss the truth lurking in our breasts so that the sacred ground of Khalistan becomes more fertile with our warm blood. Long Live Khalistan!!!! We are restless to drink the pint of martyrdom of Khalistan. – Harjinder Singh- Sukhdev Singh Enclosure: Atrocities perpetrated on the Sikhs:

Dear Rastrapati ji,

We are giving below the methods of torture, humiliation and atrocities used by your state against the Sikhs. These have been mentioned by the humanitarian organizations and individuals who hold prestige in their respective fields. These organizations and individuals are not seen directly or emotionally connected with our movement. They have been forced to write about the extreme violations of human rights of our people. We wish you to know and witness the continuous repression and atrocities perpetrated against the Sikhs by your army, paramilitary forces and the police. We are not presenting all this to you to win your sympathy, nor do we wish you repent by taking pity on us. In fact by situating you in this picture we want to have the verdict of the people of the world over the extent you have violated the UNO’s Declaration on Human Rights, the Geneva Convention, and many other international treaties. We are mentioning below the violations and atrocities:

– To interrogate the Sikhs, a round log of wood is placed on their legs, and after putting heavy weight on the log it is rotated on the legs.

–Chillie powder is sprinkled in the eyes and sex organs of the Sikhs.

– Sikhs are hung upside down from the ceilings till they became unconscious.

– The body joints are battered.

– Electric shocks are administered to the genitals making most of the youth impotent

Sikh women, during interrogation, are hurt in their sex organs. Filthy abuse is showered on them.

– Violence is inflicted on the parents in presence of their sons and daughters and vice-versa.

– Brothers are forced to beat sisters and vice versa. violence is inflicted on adult girls after stripping them naked and their sex organs are damaged. They are sexually assaulted, pregnancies are terminated of the expectant females

– Crotchets are pulled apart

.
– The victims of inhuman violence are made to sit naked in winter, and under the sun in summer, kept sleepless for days in solitary cells.

– Sikhs are subjected to severe beatings and filthy abuse in the presence of their village folks.

– Dead bodies of Sikhs killed in fake encounters are not handed over to their parents to conceal marks of excessive violence.

– The state manipulates tailored post mortem reports from the doctors, and burns the dead bodies of the Sikhs after falsely declaring them unclaimed.

– All sorts of excesses are made on the parents of underground Sikh youths.

– Indiscriminant atrocities are committed on the parents of the underground youth of the area where some militant action takes place.

– Atrocities are committed without caring for one’s age, health life or death. If some one luckily survives such brutal excesses, it is well and good But if one dies while under “interrogation”, then such a dead body is taken out, pierced with some bullets, and a news item is sent that a dreaded terrorist has been shot dead in an encounter.

– Houses of underground Sikh youths are demolished, their belongings are looted, crops destroyed, their tube well motors are taken away, and they are prevented from sowing crops.

-Even animals of the families of underground Sikh youth are subjected to police anger. After summoning the families to the police station, villagers are told not to take care of the animals of the families of the underground youth. Generally the animals starve to death.

-False cases were registered against innocent Sikh youths, later they were let off by accepting bribes.

Reporters giving true reports are arrested, an undeclared censorship is imposed on them to stop them from exposing police atrocities.

– Peaceful protests by the Human rights organizations are prohibited.

– Press is used to launch vicious and false propaganda against the Sikhs.

– Hardened criminals are inducted into Sikh movement to help in arresting the Sikh revolutionaries and sabotage the movement. Such criminals are inducted to tarnish the fair name of the Sikh revolutionaries are now called the “Black Cats” in the Punjab. Under SSP Izhar Alam, such criminal gangs were named the “Alam Sena.” Besides, such police sponsored bands of criminals also operated under the name of Panthic Tiger Force and “Red Brigade.” The director general of the police himself admitted about the “Black Cats” bands. In his interview to the India Today on Sept. 15, 188, KPS Gill had announced without an iota of shame that the security forces in Punjab cannot do anything without the help of secret bands (Black Cats).

– Thousands of innocent pilgrims, children, females, aged people, who got encircled in the Golden Temple during Operation Bluestar were made to die through starvation and thirst. The whole of Punjab was converted into a vast jail by clamping curfew on the entire area. The army bulletin branded all Amritdhari Sikhs as terrorists.

– Indian army desecrated the Gurdwaras and committed such atrocities on the Sikhs that even the soul of Ahmed Shah Abdali might have felt ashamed of.

– The targets of army guns were none else but religious persons, devotees, pilgrims, ladies, old people, children or some militants whom the indian government deemed as terrorists.

-No neutral observer was allowed to take stock of the situation.

-The injured during the attack on the Golden Temple were subjected to extreme partiality. Whereas every assistance and facility was made available to the injured army personnel, there was no such provision for the wounded belonging to the other side.

-The number of prisoners taken was rather small. There is ample scope for doubt that the Indian army had thought it better to eliminate the thousands of peopleseized in the Golden Temple instead of taking them prisoners or having to provide them with medical assistance.

No need was felt to perform religious rites for the dead pilgrims and devotees.

– Before consigning the dead bodies to flames, no effort was made to identify them. No relatives were informed.

– No dead bodies were handed over to the next of kin. In such a situation only the dead or those wishing to be dead could be present at the last rites.

– All dead bodies were placed in heaps and then consigned to flames. IT was never insured that among the dead there could also be some Muslim devotees. To cremate is against the tenets of Islam.

– No need was felt to give a list of the dead to the Red Cross or any other International Agency.

Despite such atrocities, no commission was appointed to go into this dark episode. Even the Britishers, the foreign rulers, had cared to appoint the Hunter commission to inquire into the Jallianwalla Massacre which was of a much less magnitude on the other hand. The Indian government, on the other hand, took all steps to hide the excesses of the army.

The hearing began in the case of General Vaidiya’s murder. On Aug. 10th, 1985, Harjinder Singh “Jinda” and Sukhdev Singh “Sukha”, gunned down General Vadiaya after his retirement from the Indian army. General Vadiya was the Chief of the Indian Army who ordered the attack on the holiest of the holy shrines at Amritsar and elsewhere in Punjab during 1984 operations. On Oct. 9, 1992, Sukhdev Singh “Sukha” and Harjinder Singh “Jinda” were hanged until death in Puna Jail.

Presented by:- Ajmer Singh Randhawa.

ajmer-kesri

 

Some truth on Operation Blue star as only faslehood is propagated by Indian govt. and its army

Carvan published an interview of Col. Israr khan who lead the troops (10 Guard) in Darbar sahhib by Hartoshh Bal.

Here is the analysis of this interview, kinldy see how this Muslim officer tried to hide the facts and proagated only falsehood?

————————————————–

Akal Takhat stormed

On this night in 1984, the Golden Temple in Amritsar was stormed by Indian army troops. They had been summoned by Indira Gandhi to disarm and dislodge Jarnail Singh Bhindranwale—head of the Damdami Taksaal, a prominent insurgent voice in the orthodox Sikh community and a former ally of the Congress—who was operating from and residing in the Darbar Sahib Complex. While the intent of Operation Bluestar, as this was termed, was to clear Bhindranwale’s armed insurgents from the premises of the Golden Temple, the operation took a devastating turn. In this excerpt from ‘The Shattered Dome,’ from our May 2014 issue, Hartosh Singh Bal reports on the violent events that transpired that night.

According to the memoir of PC Alexander, principal secretary to the Prime Minister, Indira Gandhi made up her mind to summon the army on 25 May, relying on the reassurances of General AS Vaidya, chief of the army staff. Vaidya explained that he would move troops into different locations in Punjab simultaneously, surrounding gurdwaras occupied by extremists and cutting off their supplies and movement. A similar siege would be mounted around the Golden Temple, with a large number of troops. Alexander writes that Gandhi “repeatedly told the general that in any operation no damage should be done to the temple buildings and particularly to the Harmandir Sahib.” Vaidya assured her that there would be “a maximum show of force, but a minimum use of it.”

Vaidya met with Gandhi again on 29 May, and suggested some changes in the plan. They would ensure that the temple would not be damaged—but they would need to enter it. This proposal was the result of Vaidya’s meeting with Lieutenant General K Sundarji, who had direct command of operations. Alexander writes that Vaidya convinced Gandhi that he had weighed the pros and cons of the plan with his senior colleagues; they had all agreed that a siege would prolong the operation and destabilise the surrounding countryside.

“Vaidya spoke with such confidence and calmness that the new plan he was proposing appeared to be the only option open to the Army,” Alexander writes. “I can definitely state on the basis of the clear knowledge of Indira Gandhi’s thinking at that time that she agreed to the revision of the earlier plan at the eleventh hour strictly on the assurance given to her that the whole operation would be completed swiftly and without any damage to the buildings within the Golden temple complex.”

A week later, on the night of 5 June, Lieutenant Colonel Israr Rahim Khan commanded the first batch of troops that stormed the Darbar Sahib complex.

Khan reported directly to Major General Kuldip Singh “Bulbul” Brar, who was in overall command of the operation and in touch with Sundarji. (The major general, like Bhindranwale, was a Brar Jatt, and the two men came from villages close to each other’s, but there the similarities between them ended. Brar came from a distinguished military family, and the gulf of class and education between him and Bhindranwale was deep; he had little time for the sort of orthodoxy Bhindranwale espoused.)
(Here Khan calles this Sikh preacher Sant jarnail Singhh Bhindranwala who was master in religious studies if not inworldly education. Who so ever came to interview him or visited to know his views always got so impressed that he became his follower like Swami Subramaniyam Farooq Abdullah and so on).

When I met him in his home, Khan, who retired as a brigadier, at first said he had little to add to Brar’s account of the operation, published in his 1993 book Operation Bluestar—The True Story. I said I wanted to hear a view from the ground, from a soldier who was actually part of the operation.

In spite of his greying hair, it was easy to see in Khan the dashing soldier Brar had sent into the complex. Once he began to speak, it was evident he remembered the action as though it had taken place yesterday. “From our debussing area, near Jallianwalla Bagh”—the famous park is a short distance away from the Darbar Sahib—“we were to approach the Darshan Deori, the main entrance. We were in the open, and they”—Bhindranwale’s men—“were all secure, with their weapon emplacements in place. There was not an inch of ground in the gully outside the Darshan Deori that was not covered by the firing.”
(In fact Darshani Deori is known the gates from where devotees enter the main sanctum sanctorum Darbar sahib in middle of thhe sacred pond. this place whichh is referred by Col. israr Khan is known as Ghantaghar).

Shahbeg Singh’s plan of defence for the Darbar Sahib was so effective that, three decades later, Khan recalled it with something like admiration. The complex was guarded by an outer ring of emplacements positioned on the vantage points of its high buildings—the Hotel Temple View on one side, and the gumbads, or domes, on the other—and an inner ring on the parikrama, within the temple itself. At the Darshan Deori, Khan and his men descended the stairs into the complex unaware of loopholes in the walls that had been turned, he said, into “weapon pits.”

“My boys were climbing down the stairs in the darkness, because the electricity was cut. It was totally dark, and we were wondering where this fire was coming from. It takes a little time to think. It was coming from under the stairs.” The bullets hit Khan’s soldiers below the knee. “The boys,” he said, “fell tumbling down.”

The memory made Khan pause. “In which war have we suffered such heavy casualties?” he asked. “From my battalion, in the first hour—from 10.30 to 11.30 at night—we had already lost nineteen. In the ’71 war, in Shakargarh sector, I tell you, Hartosh, in the whole ten to fifteen days, my battalion, the 10 Guards, lost four men. What a gruesome battle it was in the Golden Temple.”

The army was hemmed in at close quarters, in a heavily built-up area—which meant, Khan said, that there was no way collateral damage could be avoided. “I read somewhere that Mrs Gandhi was told there would be no casualties. No person in the right frame of mind would give such an assurance to the PM.”

If there were any expectations that the security forces would meet no resistance, they were rendered utterly false. “They knew,” Khan said. “How can you build brick and mortar key emplacements overnight? It was beautifully planned. You could not close up anywhere near the temple without being hit by a bullet.”

 “The commandos were grouped with me. A company each of the SFF”—the R&AW unit, the Special Frontier Force —“and 1 Para Commando was grouped with 10 Guards. We were to give them safe passage through the parikrama, until the periphery of the Akal Takht, and they were meant to capture Bhindranwale from the Akal Takht. So I grouped them, with my leading company going ahead. We entered first and made place for them to enter. We gave them a safe corridor through the parikrama till the end. There were twelve rooms in a row; we kept clearing, room by room by room.” Every room was manned.

(As per the statements given by eye witnesses I find Israr Khan giving an account of operation on night of 5th June Before that army had taken over whole complex other then Akal Takhat.
Khan also admits that he cleared the room by room which were all manned It was only massacre of stranded pilgrims who had taken shelter in those rooms to save their lives It was duty of army to save their lives but killer Indian army was on mission to suppress Sikh nation so it brutally murdered all the unarmed but innocent pilgrims inside those rooms and in the complex).

By 1 am, Khan says, his company had captured the northern wing of the parikrama and opened it up to the special forces, but they were unable to make headway. “The moment they would close up near the Akal Takht they would come under heavy fire. They were very badly mauled. So they would fall back on the parikrama, and get in touch with Bulbul to tell him that they had lost so many men.”

“I won’t blame them professionally. Their men were dying, and all the fire was coming at them. But why some other methods were not adopted, or what they had rehearsed, is not known to me.”

At two o’clock in the morning, Brar called. “Bulbul told me on the set: ‘Israr, have a Carl Gustav’”—an anti-tank missile—“‘fired at the dome of the Akal Takht and see what effect it has.’ I set up the Carl Gustav myself; I couldn’t take anyone else’s report for granted. From the first floor, which we had captured, I fired a Carl Gustav and—Hartosh, can you believe it, what a beautiful building it was, that dome was so strong—it just ricocheted like a .303 bullet being fired into that wall. Even that leaves a one-inch dent; but nothing was visible on that dome.” Khan radioed back to tell Brar that the missile had had no effect.

“Then I don’t know what transpired between the special forces and Bulbul, that they found no other way. They were scared that after sunrise, all of Punjab would surround the Golden Temple. So whatever had to be achieved, had to be achieved before dawn. They decided on rolling down three tanks inside, and eventually used the main gun of the tank. It pierced through the dome, and there were gaping holes. That was a horrific sight. My own assessment now is that if the main gun of the tank had not been used, perhaps the Sikh psyche wouldn’t have been hurt so much.”

Almost every commitment that Vaidya made to the prime minister went unkept. The operation took at least a full night; it resulted in the decimation of the Akal Takht; and the casualties far outstripped any estimate Gandhi had been given. There are still no credible explanations for why no intelligence on the situation was available or forthcoming to the army. Neither are there answers for why the army did not ask for more time to plan, especially as an operation at the Darbar Sahib had been under consideration since February.
(Either Khan hiding the facts or tryig to give a cover by speaking false on preparation time army was given to attack. Genral SK Sinha disclosed in his book “Last resorts” that army was giving special training to its soldiers in Chakrata near Dehra Dun 18 months prior to the invasion on Darbar sahib than how much more time it wanted?

It’s the same army which was ordered to prepare and then air dropped in just six hours to Sri Lanka in 1985?)

In 1984, the day marking the martyrdom of Guru Arjan fell on 3 June, two days before Operation Bluestar began. The choice to begin hostilities on 5 June was highly problematic, because a curfew had been imposed around the complex days before the attack, effectively trapping a large number of pilgrims, who had nothing to do with the militants, inside the temple.
(Why the curfew was imposed and trapped pilgrims were not permitted to come out of Darbar Sahib, the intention of army is clearly mentioned here. It trapped them in large numbers so that in operation army may use them as a cover to move to capture Akal Takhat these trapped pilgrims were thus killed in cross firing in periphery other then killed by granade attack in rooms where they had taken the shelter).

(This strategy of army is well explained in the bottom at “Valor of Sikh youths and defeat of indian army” and cleared why the army chose auspicious day of martyrdom day of fifth guru Aran dev ‘s martyrdom day for attack).

Indira Gandhi had given such orders to General Vaidya, the Commanding officer in chief of Indian army as; 

“I don’t give a damn if the Golden Temple and whole of Amritsar are destroyed, I want Bhindranwale dead.” (Indira Gandhi, Indian Prime Minister, communicating with Gen. Vaidya during “Operation Blue Star”)

Over the years, evidence has emerged of crimes committed within the premises by security forces. Brigadier Onkar Goraya’s 2013 book, Operation Bluestar and After, An Eyewitness Account, provides, for the first time, some clarity on the number of pilgrims inside the complex during the operation. Goraya, the head of the Admin branch of the 15th Infantry division posted in Punjab, was tasked with “lifting civilian casualties, disposal of the dead and evacuation of the wounded to the hospitals, apprehending the militants, guarding them in make-shift jails in the Cantonment, and arranging for their logistics.” He placed the casualties, based on the number of bodies disposed, at seven hundred, and stated that another 2,200 persons were rounded up and interned.

(Here Goraya also lies, the exact number may not be possible to reveal but approximate and very near to actual is obtained. There were 10,000 innocent pilgrims killed inside the Darbar sahib periphery other than those killed in surrounding buildings as these figure was taken from shoe store (Joda Ghar) where every devotee deposit his/her shoes before entering the sacred sanctorum. There were 10.000 unclaimed shoes inside this joda ghar whose claimanants never returned to claim. Nearly 15,000 innocent pilgrims were killed in Darbar Sahib complex only).

Even by the most exaggerated count, Bhindranwale’s men numbered no more than 250. Were they all counted among the dead, with another hundred from other militant organisations included for good measure, it would mean that, even by the most conservative estimate, the operation resulted in the deaths of over 350 people who had nothing at all to do with Bhindranwale. Considering that many people slipped out of the complex through the numerous doors leading to alleyways surrounding it, it is safe to say the number of people inside was far higher than the three thousand or so accounted for by the numbers of those dead, injured or captured.

The army has consistently maintained that pilgrims inside the complex were given ample opportunity to leave. But Goraya makes it clear that most never heard the army’s requests to surrender and come out. A day before the operation began, he found a district administration van outside the complex broadcasting announcements in Punjabi: “All those who are stranded inside the Darbar Sahib complex are requested to come out with their hands raised above their head. They will not be fired at.” The van was parked eighty yards from the main entrance. “The devotees and pilgrims, for whose benefit the announcements were being made, were well beyond its reach,” Goraya writes.

              In his memoirs (Memoirs of Giani Zail Singh, Har Anand Publications, New Delhi, 1996) the President of India confirms that no warnings were given; “I pointed out to her [Mrs Indira Gandhi] that military action was taken on a day when the Temple complex was full of pilgrims men, women and children – assembled to observe the martyrdom of Guru Arjan Dev, most of whom perished in the cross firing… I told her that if notice had been given to these pilgrims over radio and television and loudspeakers, a majority of them would have come out… I had asked the government whether they had issued a warning on the loudspeakers to the people inside the complex to come out, to which they replied in the affirmative. Later, I came to know that no such warning had been issued and the operation had been suddenly launched.”

Who was lying, whether army or the President of India?

The scene within the complex after the operation was gruesome. Goraya writes of the stench of rotting bodies in the June heat: the task of disposing of them was so onerous that the municipal workers who eventually cleared them away did so only because they were permitted to strip the bodies of their belongings. The bodies of Bhindranwale and Shahbeg Singh were recovered from the basement of the Akal Takht on the morning of 7 June, almost two days after the operation began. Bhindranwale’s body was identified by his brother and quickly cremated in the presence of a few officers and jawans.

Goraya’s book confirms an allegation of long standing: that security forces shot at least a few men in cold blood. Evidence has already been published of at least one execution: a 2006 book by Harminder Kaur – Blue star over Amritsar – contains the post-mortem report of a young man shot through the chest with his hands tied behind his back. Goraya’s story strengthens the claim that there were multiple killings of this kind. “On 7th June, around mid-day, I saw about 90 detainees sitting on the hot marble floor of the Southern wing of Parikrama,” he writes. “They were naked except for the long underwear and their hands were tied behind their backs.
(We have eye witness accounts how army personals killed the amritdhari Sikhs wearing all five mandatory signs of Sikh faith in cold blood by tying their hands at their back and shot them in frustration as army suffered very heavy loss. The casualities it had in operation Blue star was much much higher than combined loss of lives it had in all three maor wars fought against China and Pakistan).

“Most of them appeared to be militants. Though subjugated they retained their defiant spirit. Instead of looking down, some of them dared to look into the eyes of their captors. A second Lieutenant of the unit who had fought these militants the previous night and lost a few comrades, could not stomach such defiance. When he asked them to look down one of them spat at him. The officer lost his cool and shot him in the forehead.”

(That shows the hate of Sikhs towards invading army which attacked their supreme shrine and killed the innocent, the Sikh youth was certainly fearless as he was sure that he will be killed so he spat in extreme hate and conveyed his message before he was shot.

Kudos to that fearless Sikh).

On 23 June, when Indira Gandhi visited the Darbar Sahib for the first time after the operation, Goraya was at the tail end of the group surrounding her as she walked around the parikrama. As she looked at the Akal Takht, Goraya claims, she said to General Sundarji beside her: “I didn’t ask you to do this.”

An edited excerpt from “The Shattered Dome,’ published in The Caravan’s May 2014 issue. Read the story in full here.

Hartosh Singh Bal is the political editor at The Caravan, and is the author of Waters Close Over Us: A Journey Along the Narmada. He was formerly the political editor at Open magazine.

http://www.caravanmagazine.in/vantage/men-involved-storming-golden-temple-1984

Valor of Sikh youths and the defeat of Indian army ;

            The infantry division of Indian army had surrendered before the valiant Sikh youths. The fierce fight which was fought continuously for nearly 72 hrs. had stopped the advance of a mighty and best army in world which had earlier defeated Pakistan and captured its 93000 soldiers, was not able to fight with these handful Sikh youths.

            The distance from Clock tower entrance to Sri Akal Takhat in complex of Darbar sahib is hardly 200 meters. The Army generals were sure to take over the Akal Takhat within half an hour but this largest army which had already covered up whole of Punjab, couldn’t cover this distance of merely 200 meters for 72 hrs, it marked a question on their valor. It had to face such a heavy resistance.

The Indian army could never think of such stiff resistance, it had not thought the handful Sikh youths who were not properly trained shall stop the mighty Indian army. The Generals of Indian army had forgot that the Sikhs have a charm to get martyrdom since their childhood and they feel proud to offer their heads to their Guru and getting martyred in battlefield.

The Sikh youths were fighting those who had invaded with a malicious thought to destroy their holiest shrine, to protect the house of lord and to make it’s sanctity, these Sikh youths had one motto only —- to sacrifice for a good cause, and to get martyred, they practically proved in the battlefield the prophetic prononuncement of Guru Gobind Singh ji that “ “Chirian to main baaz tudaun, Gidran to main sher banun, Sawa lakh seek laraun, Tbhai Gobind Singh naam kahaun”, means “ only if I can make sparrows fight against hawks, make lions out of jackals, and make one person fight against 1.25 lakh (one hundred twenty five thousand) enemies—only then I deserve to be called Gobind Singh”.

These Sikh youths sacrificed their lives to prove these words whereas the soldiers of Indian army were just obeying the orders of their queen Indira.

            The Generals of Indian army had deliberately selected the martyrdom day of fifth Guru of Sikh religion to attack Darbar sahib while making strategy because on such day the Sikhs arrives in large numbers to Gurudwara along with their families. The Indian army could use their large gathering of congregation to achieve their mission of capturing Akal Takhat. It could deliver two benefits:-

            First— by presence of large congregation the army could reach Akal Takhat  easily in cover of these innocent Sikhs, if the army opened fire, the chances were of killing of  innocent Sikhs from either side, the Sikhs may be from devotees or the followers of Sant Jarnail Singh ji. Indira Gandhi had also issued such orders that whether whole of Amritsar is destroyed but Bhindranwala must not be left alive. Thus, the Indian army had planned to proceed safely towards Sri Akal Tkhat in cover of innocent devotees and then to attack there like the soldiers proceed in battle fields in the cover of buffalows or other animals to save their lives.

            The Generals of Indian army too made the same strategy that their soldiers shall capture Sri Akal Takhat within half an hour by getting safe cover of congregation of devotees there because these generals were sure that the Sikh youths shall never fire on their brothers, sisters or the children in congregation but the brave warriors inside the shrine had got Gurilla training from retired Maj. General Shubeg Singh who was expert in such wars. These brave Sikhs finished the first attack in minutes. All those soldiers who were sent inside at periphery of Darbar sahib were killed by indiscriminate firing.

            The fierce fight to capture Akal Takhat was continued for nearly 72 hrs but when infantry division of Indian army failed to proceed a few meters, than Armored personal carrier vehicles was brought into service to ferry the soldiers safely to Akal Takhat but such an APC vehicle was blown off by a missile.

And after the Infantry surrendered, the heavy armor and Artillery was brought in, Tanks fired 80 shells on Akal Takhat whereas last reports revealed that only 14 Sikhs were left alive in Akal takhat but the army generals were sweating and had left their patience. they had assured indira to take control of Akal takhat within half an hour and every attempt was made to kill Sant ji as Indira had ordered them. She didn’t want to capture him alive.

Finally these brave last 14 Sikhs were killed and then only indian army could enetr the building and took over the control. none of these brave Sikh youths was caughht alive or surrendered but they sacrificed their lives to protect sanctum Sanctorum darbar Sahib from invasion and set the example of valor of Sikhs as per their tradition for centuries.

Hats off to all of them.

Ajmer Randhawa

Ajmer Singh Randhawa

Shiva in Sikh religion

ਸਿਵ ___

Shivs

ਕੀ ਇਹ ਗੱਲਾਂ ਕੋਈ ਬਾਮਣ ਜਾ ਸ਼ਿਵ ਜੀ ਦਾ ਪੁਜਾਰੀ ਲਿਖੇਗਾ ?

1- ਦੇਵੀ ਦੇਵਾ ਪੂਜੀਐ ਭਾਈ ਕਿਆ ਮਾਗਉ ਕਿਆ ਦੇਹਿ ॥’ (ਸੋਰਠਿ ਮ: ੧, ਗੁਰੂ ਗ੍ਰੰਥ ਸਾਹਿਬ – ਅੰਗ ੬੩੭)
ਦੇਵੀ ਦੇਵਤਿਆਂ ਬਾਰੇ ਗੁਰਬਾਣੀ ਵਿੱਚ ਲਿਖਿਆ ਹੈ ‘ਦੇਵੀਆਂ ਦੇ ਦੇਵਤਿਆਂ ਦੀ ਪੂਜਾ ਕਰ ਕੇ, ਬੰਦਾ ਇਨ੍ਹਾਂ ਪਾਸੋਂ ਕੀ ਮੰਗ ਸਕਦਾ ਹੈ ਅਤੇ ਉਹ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਕੀ ਦੇ ਸਕਦੇ ਹਨ?

ਭਾਈ ਗੁਰਦਾਸ ਜੀ  ਲਿਖਦੇ ਹਨ ;

2- ਸਿਵ ਰੂਪੀ ਕਰਤਾ ਪੁਰਖ ਚਲੇ ਨਾਹੀਂ ਧਰਤ ਚਲਾਈ ॥: Shiva roopee kuruthaa purukh chulae naahee dhhuruth chulaaee: Only the Shiva Roopa Kartaa Purakh is Permanent; the earth, the material world, is transitory (Bhai Gurdaas, Vaar: 1, Pauree: 42).

3- ਸ੍ਵੈਯਾ ॥
ਆਦਿ ਅਪਾਰ ਅਲੇਖ ਅਨੰਤ ਅਕਾਲ ਅਭੇਖ ਅਲਖ ਅਨਾਸਾ ॥
ਕੈ ਸਿਵ ਸਕਤ ਦਏ ਸ੍ਰੁਤਿ ਚਾਰ ਰਜੋ ਤਮ ਸਤ ਤਿਹੂੰ ਪੁਰ ਬਾਸਾ ॥
ਦਿਉਸ ਨਿਸਾ ਸਸਿ ਸੂਰ ਕੈ ਦੀਪਕ ਸ੍ਰਿਸਟਿ ਰਚੀ ਪੰਚ ਤਤ ਪ੍ਰਕਾਸਾ ॥
ਬੈਰ ਬਢਾਇ ਲਰਾਇ ਸੁਰਾਸੁਰ ਆਪਹਿ ਦੇਖਤ ਬੈਠ ਤਮਾਸਾ ॥੧॥

ਅਰਥ:-ਉਹ ਅਕਾਲ ਪੁਰਖ ਸਭ ਦਾ ਮੂਲ ਹੈ, ਉਸ ਦਾ ਪਾਰ ਨਹੀਂ ਪਾਇਆ ਜਾ ਸਕਦਾ। ਉਹ ਲੇਖੇ ਤੋਂ ਬਾਹਰ ਤੇ ਅੰਤ ਰਹਿਤ ਹੈ। ਉਸ ਨੂੰ ਕਾਲ ਨਹੀਂ ਵਿਆਪਦਾ, ਉਸ ਦਾ ਕੋਈ ਭੇਖ ਪਹਿਰਾਵਾ ਨਹੀਂ ਉਹ ਨਾ ਲਖੇ ਜਾਣ ਵਾਲਾ ਤੇ ਨਾਸ਼ ਰਹਿਤ ਹੈ। ਉਹ ਕਲਿਆਣਸਰੂਪ ਪ੍ਰਭੂ ਨੇ ਆਪਣੀ ਸ਼ਕਤੀ ਨਾਲ ਚਾਰ ਵੇਦ ਬਣਾਏ ਸਨ ਤੇ ਉਹ ਰਜੋ, ਤਮੋ ਤੇ ਸਤੋ ਤਿੰਨਾਂ ਗੁਣਾਂ ਤੇ ਤਿੰਨਾਂ ਲੋਕਾਂ ਅਕਾਸ਼, ਪਤਾਲ ਤੇ ਮਾਤ ਲੋਕ ਵਿਚ ਨਿਵਾਸ ਕਰਦਾ ਹੈ । ਉਸ ਨੇ ਦਿਨ ਤੇ ਰਾਤ ਨੂੰ ਚਾਨਣਾ ਕਰਨ ਲਈ ਚੰਦ੍ਰਮਾਂ ਤੇ ਸੂਰਜ ਦੋ ਦੀਵੇ ਬਣਾਏ ਹਨ ਤੇ ਪੰਜਾਂ ਤੱਤਾਂ ਦਾ ਪ੍ਰਕਾਸ਼ ਕਰਕੇ ਸ਼ਾਰੀ ਸਿ੍ਰਸ਼ਟੀ ਦੇ ਜੀਵਾਂ ਦੀ ਰਚਨਾਂ ਕੀਤੀ ਹੈ। ਉਹ ਪ੍ਰਭੂ ਦੇਵਤਿਆ ਤੇ ਦੈਂਤਾ ਦੇ ਮਨਾਂ ਵਿਚ ਵੈਰ ਭਾਵਨਾਂ ਪੈਂਦਾ ਕਰਕੇ ਉਹਨਾਂ ਨੂੰ ਲੜਾਉਂਦਾ ਹੈ ਤੇ ਆਪ ਆਪਣੇ ਆਸਨ ਤੇ ਬੈਠਕੇ ਇਹ ਜਗਤ ਤਮਾਸ਼ਾ ਵੇਖਦਾ ਹੈ ॥੧॥

ਸ੍ਰੀ ਦਸਮ ਗ੍ਰੰਥ ਸਾਹਿਬ ਜੀ

4- ਏਕ ਸਿਵ ਭਏ, ਏਕ ਗਏ, ਏਕ ਫੇਰ ਭਏ, ਰਾਮਚੰਦ੍ਰ ਕ੍ਰਿਸਨ ਕੇ ਅਵਤਾਰ ਭੀ ਅਨੇਕ ਹੈਂ ॥ 
ਬ੍ਰਹਮਾ ਅਰੁ ਬਿਸਨ ਕੇਤੇ, ਬੇਦ ਔ ਪੁਰਾਨ ਕੇਤੇ, ਸਿੰਮ੍ਰਿਤਿ ਸਮੂਹਨ ਕੈ ਹੁਇ ਹੁਇ ਬਿਤਏ ਹੈਂ ॥ 
ਮੋਨਦੀ ਮਦਾਰ ਕੇਤੇ, ਅਸੁਨੀ ਕੁਮਾਰ ਕੇਤੇ, ਅੰਸਾ ਅਵਤਾਰ ਕੇਤੇ ਕਾਲ ਬਸ ਭਏ ਹੈਂ ॥ 
ਪੀਰ ਔ ਪਿਕਾਂਬਰ ਕੇਤੇ, ਗਨੇ ਨ ਪਰਤ ਏਤੇ, ਭੂਮ ਹੀ ਤੇ ਹੁਇ ਕੈ ਫੇਰਿ ਭੂਮਿ ਹੀ ਮਿਲਏ ਹੈਂ ॥੭॥੭੭॥
ਸ੍ਰੀ ਦਸਮ ਗ੍ਰੰਥ
ਅਰਥ: ਇਕ ਸ਼ਿਵ ਪੈਦਾ ਹੋਏ, ਤੇ ਓਹ ਵੀ ਮੌਤ ਵੱਸ ਹੋ ਗਏ , ਇਕ ਫਿਰ ਹੋਏ (ਉਹ ਵੀ ਚਲੇ ਗਏ), ਰਾਮ ਚੰਦਰ, ਕ੍ਰਿਸ਼ਨ ਵਰਗੇ ਅਵਤਾਰ ਵੀ ਅਨੇਕਾ ਹੋਏ। ਕਿਤਨੇ ਹੀ ਬ੍ਰਹਮਾ ਅਤੇ ਵਿਸ਼ਨੂ (ਹੋਏ), ਕਿਤਨੇ ਹੀ ਵੇਦ ਅਤੇ ਪੁਰਾਨ (ਹੋਏ), ਅਤੇ ਸਿਮ੍ਰਿਤੀਆਂ ਦੇ ਸਮੂਹ ਹੋ ਹੋ ਕੇ ਬੀਤ ਗਏ ਹਨ। ਕਿਤਨੇ ਹੀ (ਧਰਮ ਹੀ ਰਖਿਆ ਕਰਨ ਵਾਲੇ) ਮੁਆਵਨੁਦੀਨ ਅਤੇ ਮਦਾਰ (ਸ਼ੇਖ ਬਦੀਹੁਦੀਨ ਕਨੋਜੀ ਵਰਗੇ ਵਰਗੇ ਦਰਵੇਸ਼), ਕਿਤਨੇ ਹੀ ਅਸ਼੍ਵਨੀ ਕਮਰ, ਕਿਤਨੇ ਹੀ ਅੰਸ਼-ਅਵਤਾਰ (ਇਸ ਸੰਸਾਰ ਵਿਚ ਆ ਕੇ) ਕਾਲ ਵਸ ਹੋ ਗਏ ਹਨ। ਕਿਤਨੇ ਹੀ ਪੀਰ ਅਤੇ ਪੈਗੰਬਰ (ਹੋਏ ਹਨ, ਜੋ) ਇਤਨੇ ਹਨ ਕਿ ਗਿਣੇ ਨਹੀ ਜਾ ਸਕਦੇ, ਉਹ (ਸਾਰੇ) ਮਿੱਟੀ ਉਤੇ ਪੈਦਾ ਹੋ ਕੇ ਫਿਰ ਮਿੱਟੀ ਵਿਚ ਹੀ ਸਮਾ ਗਏ ਹਨ॥੭੭॥

5-ਦਸ ਮਿਰਗੀ ਸਹਜੇ ਬੰਧਿ ਆਨੀ ॥
ਪਾਂਚ ਮਿਰਗ ਬੇਧੇ ਸਿਵ ਕੀ ਬਾਨੀ ॥੧॥
ਸੰਤਸੰਗਿ ਲੇ ਚੜਿਓ ਸਿਕਾਰ ॥
ਮ੍ਰਿਗ ਪਕਰੇ ਬਿਨੁ ਘੋਰ ਹਥੀਆਰ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਅੰਗ 1136

6-ਸੁਰਗ ਪਇਆਲ ਮਿਰਤ ਭੂਅ ਮੰਡਲ ਸਰਬ ਸਮਾਨੋ ਏਕੈ ਓਹੀ ॥
ਸਿਵ ਸਿਵ ਕਰਤ ਸਗਲ ਕਰ ਜੋਰਹਿ ਸਰਬ ਮਇਆ ਠਾਕੁਰ ਤੇਰੀ ਦੋਹੀ ॥੧॥ 
ਅੰਗ 207

7- ਆਪੇ ਸਿਵ ਸੰਕਰ ਮਹੇਸਾ ਆਪੇ ਗੁਰਮੁਖਿ ਅਕਥ ਕਹਾਣੀ ॥
ਆਪੇ ਜੋਗੀ ਆਪੇ ਭੋਗੀ ਆਪੇ ਸੰਨਿਆਸੀ ਫਿਰੈ ਬਿਬਾਣੀ ॥ 
ਅੰਗ 553

8- ਜੈ ਜੈ ਕਾਰੁ ਜਾਸੁ ਜਗ ਅੰਦਰਿ ਮੰਦਰਿ ਭਾਗੁ ਜੁਗਤਿ ਸਿਵ ਰਹਤਾ ॥ 
ਅੰਗ 1407

ਅਗਰ ਦਸਮੇਸ਼ ਜੀ ਸ਼ਿਵ ਜੀ ਦੇ ਪੁਜਾਰੀ ਹੁੰਦੇ ਤਾਂ:_

9- ਕਾਹੇ ਕੋ ਏਸ ਮਹੇਸਹਿ ਭਾਖਤ ਕਾਹਿ ਦਿਜੇਸ ਕੋ ਏਸ ਬਖਾਨਯੋ॥
(ਕਿਸ ਕਰਕੇ ਸ਼ਿਵ ਜੀ ਨੂੰ ਜਾਂ ਬ੍ਰਹਮਾਂ ਨੂੰ ਪ੍ਰਮਾਤਮਾਂ ਮੰਨਦੇ ਹੋ? )
ਖੋਜ ਰਹੇ ਸ਼ਿਵ ਸੇ ਜਿਹ ਅੰਤ ਅਨੰਤ ਕਹਿਓ ਥਕਿ ਅੰਤ ਨ ਪਾਯੋ॥
(ਸ਼ਿਵ ਜੀ ਵਰਗੇ ਅਨੇਕਾਂ ਉਸਦਾ ਅੰਤ ਨਹੀਂ ਪਾ ਸਕੇ।ਥੱਕ ਕੇ ਉਸਨੂੰ ਅਨੰਤ ਕਹਿੰਦੇ ਹਨ)

10- “ਅਉਰ ਕਹਾਂ ਭਯੋ ਜਉ ਜਗਦੀਸ਼ ਬਿਨਾਂ ਸੁ ਗਨੇਸ਼ ਮਹੇਸ਼ ਮਨਾਯੋ॥
(ਕਿਹੜੀ ਗੱਲੋਂ ਪ੍ਰਮਾਤਮਾਂ ਤੋਂ ਬਿਨਾਂ ਗਨੇਸ਼ ਤੇ ਮਹੇਸ਼ ਨੂੰ ਧਿਆਉਂਦੇ ਹੋ? )

ਜਾਹਿ ਸਿਵਾਦਿਕ ਬ੍ਰਹਮ ਨਿਮਿਯੋ ਸੁ ਸਦਾ ਅਪੁਨੇ ਚਿਤ ਬੀਚ ਬਿਚਾਰਯੋ॥
(ਜਿਸਨੇ ਸਿਵ ਜੀ ਤੇ ਬ੍ਰਹਮਾ ਨੂੰ ਪੈਦਾ ਕੀਤਾ ਹੈ ਉਸਦਾ ਧਿਆਨ ਮਨ ਵਿਚ ਰੱਖੋ)

11- “ਕ੍ਰੋਧੀ ਹ੍ਵੈ ਰੁਦ੍ਰ ਗਰੇ ਰੁੰਡ ਮਾਲ ਕਉ ਡਾਰਿ ਕੈ ਬੈਠੇ ਹੈ ਡਿੰਭ ਜਨਾਈ
(ਸ਼ਿਵ ਜੀ ਕ੍ਰੋਧੀ ਹੋਕੇ ਸਿਰਾਂ ਦੀ ਮਾਲਾ ਗਲ ਵਿਚ ਪਾਕੇ ਪਾਖੰਡ ਕਰਨ ਲਈ ਬੈਠਾ ਹੈ)

” ਜਾਂ ਇਹ ਭੀ ਕਿਸੇ ਸ਼ਿਵ ਜੀ ਦੇ ਪੁਜਾਰੀ ਦੀ ਲਿਖਤ ਹੈ? ਇਸਤੋਂ ਸਪਸ਼ਟ ਦਿਖਾਈ ਦਿੰਦਾ ਹੈ, ਕਿ ਇੰਨ੍ਹਾਂ ਗੁਰਮਤਿ ਤੋਂ ਸੱਖਣੀਆਂ ਰੂਹਾਂ ਨੇ ਭੁੱਲ ਕੇ ਭੀ ਕਦੇ ਗੁਰੂ ਗ੍ਰੰਥ ਸਾਹਿਬ ਜੀ, ਦਸਮ ਗ੍ਰੰਥ ਸਾਹਿਬ ਜਾਂ ਵਾਰਾਂ ਭਾਈ ਗੁਰਦਾਸ ਜੀ ਦੇ ਦਰਸ਼ਨ ਨਹੀਂ ਕੀਤੇ; ਅਗਰ ਕੀਤੇ ਹੁੰਦੇ ਤਾਂ ਅੱਜ ਇੰਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਆਪਣਾ ਸਮਾਂ ਤੇ ਸਰਮਾਇਆ ਬਚਾ ਕੇ ਇਸ ਤਰ੍ਹਾਂ ਦੀ ਨਿਮੋਸ਼ੀ ਦਾ ਸਾਹਮਣਾ ਨਾ ਕਰਨਾ ਪੈਂਦਾ।

12- “ਖ਼ਸਮ ਦੁਸ਼ਮਨੀ ਗਰ ਹਜ਼ਾਰ ਆਵੁਰਦ।
ਨ ਯਕ ਮੂਇ-ਊ ਰਾ ਆਜ਼ਾਰ ਆਵੁਰਦ।
ਖ਼ਸਮ ਰਾ ਚੁ ਕੋਰ ਊ ਕੁਨਦ ਵਕਤਿ ਕਾਰ।
ਚਸ਼ਮ ਰਾ ਬਕੋਰ ਊ ਕੁਨਦ ਵਕਤ-ਏ-ਕਾਰ।
ਯਤੀਮਾਂ ਬਿਰੂੰ ਬੁਰਦ ਬੇ-ਜ਼ਖ਼ਮਿ ਖ਼ਾਰ।
ਜ਼ਿ ਪੈਮਾਂਨ ਬੈਰੂ ਬੁਰਦ ਬੇ ਅਜ਼ਾਰ।
 “Zafarnamah, Dasam Granth Sahib”

ਹੁਣ ਵੇਖੋ, ਇਹਨਾ ਦਸਮ ਪਿਤਾ ਜੀ ਦੀ ਬਾਣੀ ਦੇ ਵਿਰੋਧੀਆਂ ਨੇ ਇਸ ਸਬਦ ਤੇ ਵੀ ਕਿੰਤੂ ਕੀਤਾ ਹੈ : 

ਇਸ ਸਬਦ ਵਿਚ ਲਿਖੇ ਸ਼ਿਵਾ ਤੋਂ ਵੀ ਭਰਮ ਖਾਂਦੇ ਨੇ ਕਿ ਗੁਰੂ ਜੀ ਸ਼ਿਵ ਜੀ ਤੋ ਬਰ ਮੰਗਦੇ ਨੇ ਜਦਕਿ ਇਹਨਾ ਮੂਰਖਾਂ ਨੂ ਇਹ ਨਹੀਂ ਪਤਾ ਕਿ ਚੌਪਈ ਸਾਹਿਬ ਵਿਚ ਗੁਰੂ ਜੀ ਨੇ ਇਹ ਸਾਫ਼ ਕਾਰ ਦਿੱਤਾ ਕਿ ਸ਼ਿਵਾ – ਅਕਾਲ ਪੁਰਖ ਹੈ ਨਾ ਕਿ ਸ਼ਿਵ ਜੀ ਮਹਾਰਾਜ !ਓਹਨਾ ਲਿਖਿਆ ਹੈ—

13-ਮਹਾਦੇਵ ਕੋ ਕਹਿਤ ਸਦਾ ਸ਼ਿਵ !!

ਨਿਰੰਕਾਰ ਕਾ ਚੀਨਤ ਨਹੀ ਭਿਵ !! 

ਮਤਲਬ ਕਿ ਲੋਕੀ ਸ਼ਿਵ ਜੀ ਨੂ ਰੱਬ (ਅਕਾਲ ਪੁਰਖ) ਮੰਨੀ ਜਾ ਰਹੇ ਨੇ, ਕੀ ਇਹਨਾ ਨੂ ਅਕਾਲ ਪੁਰਖ ਦਾ ਰੰਚ ਮਾਤਰ ਭੀ ਡਰ ਨਹੀ ਹੈ?

14- ਧਯਾਨ ਲਗਾਇ ਠਗਿਓ ਸਭ ਲੋਗਨ ਸੀਸ ਜਟਾ ਨਖ ਹਾਥ ਬਢਾਏ ॥ ਲਾਇ ਬਿਭੂਤ ਫਿਰਯੋ ਮੁਖ ਊਪਰਿ ਦੇਵ ਅਦੇਵ ਸਭੈ ਡਹਕਾਏ ॥

You are deceiving people by wearing matted locks on the head extending the nails in the hands in the hands and practicing false trance; smearing the ashes on your face, you are wandering, while deceiving all the gods and goddesses;

ਦੇਖੋ ਗੁਰੂ ਸਾਹਿਬ ਕੀ ਕਹ ਰਹੇ ਨੇ ਕੇ ਸ਼ਿਵਜੀ ਵੀ ਪਖੰਡ ਕਰ ਰਿਹਾ ਹੈ , ਆਪਣੀਆਂ ਜਤਾਵਾ ਬਣਾ ਲਾਈਆਂ , ਸਵਾਹ ਮਲ ਲਈ ਸਰੀਰ ਤੇ, ਤੇ ਝੂਠਾ ਧਿਆਨ ਲਗਾ ਕੇ ਦੇਵੀ ਦੇਵਤਿਆਂ ਸਮੇਤ ਆਮ ਲੋਕਾਂ ਨਾਲ ਠਗੀ ਮਾਰ ਰਿਹਾ ਹੈ। 

15- ਖਿਆਲ ਪਾਤਿਸ਼ਾਹੀ ੧੦॥
ਮਿਤ੍ਰ ਪਿਆਰੇ ਨੂੰ ਹਾਲ ਮੁਰੀਦਾਂ ਦਾ ਕਹਿਣਾ ॥ ਤੁਧੁ ਬਿਨੁ ਰੋਗੁ ਰਜਾਈਆਂ ਦਾ ਓਢਣ ਨਾਗ ਨਿਵਾਸਾਂ ਦੇ ਰਹਿਣਾ ॥ਸੂਲ ਸੁਰਾਹੀ ਖੰਜਰੁ ਪਿਆਲਾ ਬਿੰਗ ਕਸਾਈਆਂ ਦਾ ਸਹਿਣਾ ॥ ਯਾਰੜੇ ਦਾ ਸਾਨੂੰ ਸੱਥਰੁ ਚੰਗਾ ਭੱਠ ਖੇੜਿਆਂ ਦਾ ਰਹਿਣਾ ॥ ੧॥ ੧॥ ੬॥

ਦਸਮ ਗ੍ਰੰਥ ਬਾਣੀ ਬਿਉਰਾ ਦੇ ਲੇਖਕ ਭਾ. ਭਗਵੰਤ ਸਿੰਘ (ਹਰੀ ਜੀ) ਸੰਪਾਦਕ ਡਾ. ਰਤਨ ਸਿੰਘ ਜੱਗੀ, ਪ੍ਰਕਾਸ਼ਕ ਪੰਜਾਬੀ ਯੂਨੀਵਰਸਿਟੀ ਪਟਿਆਲਾ ਦੇ ਪੰਨਾ ੬ ਤੇ ਇਸ ਨੂੰ ਖਿਆਲ ਪਾਤਸ਼ਾਹ ੧੦ ਲਿਖਿਆ ਹੈ। “ਖਿਆਲ” ਗਾਇਕੀ ਦੀ ਸ਼ੈਲੀ ਹੈ ਜੋ ਕਿ ਮੁਗਲ ਕਾਲ ਵੇਲੇ ਇਸ ਦੇਸ਼ ਵਿਚ ਆਈ ਹੈ ਅਤੇ ਇਸ ਵਿਚ ਵਰਤੇ ਗਏ ਅਲੰਕਾਰਾਂ ਨੂੰ “ਉਦਾਤ ਅਲੰਕਾਰ” ਦਾ ਨਾਉਂ ਦਿੱਤਾ ਹੈ ਅਤੇ ਇਹੀ ਸਿਰਲੇਖ ਇਸ ਦਾ ਸ਼੍ਰੀ ਦਸਮ ਗ੍ਰੰਥ ਸਾਹਿਬ ਵਿਚ ਹੈ। ਅਜਿਹੇ ਕਾਵਿਕ ਅਲੰਕਾਰ ਗੁਰਬਾਣੀ ਵਿਚ ਅਨੇਕ ਥਾਈਂ ਦਰਜ ਹਨ: –

*ਏਕ ਬੂੰਦ ਭਰ ਤਨੁ ਮਨੁ ਦੇਵਉ ਜੋ ਮਦ ਦੇਇ ਕਲਾਲੀ ਰੇਅੰਗ ੯੬੬
ਅਰਥ: ਜਿਹੜਾ ਕੋਈ ਐਸੇ ਮੱਟੀ ਦੀ ਇਕ ਬੂੰਦ ਭਰ ਸ਼ਰਾਬ ਮੈਨੂੰ ਦੇ ਦੇਵੇ ਮੈਂ ਉਸ ਨੂੰ ਆਪਣਾ ਤਨ ਅਤੇ ਮਨ ਅਰਪ ਦੇਵਾਂ।

ਭਾਈ ਗੁਰਦਾਸ ਜੀ ਦੀਆਂ ਵਾਰਾਂ ਵਿਚ ਸਾਕੀ ਅਤੇ ਪਿਆਲੇ ਦੀ ਵਰਤੋਂ ਅਨੇਕ ਥਾਂਈਂ ਕੀਤੀ ਮਿਲਦੀ ਹੈ:

*ਪਿਰਮ ਪਿਆਲਾ ਮਜਲਸੀ ਜੋਗ ਭੋਗ ਸੰਜੋਗ ਬਣਾਵੈ
ਅਮਲੀ ਹੋਇ ਸੁ ਮਜਲਸ ਪਾਵੈਵਾਰ ੪ ਪਉੜੀ ੧੩

ਭਾਈ ਨੰਦ ਲਾਲ ਜੀ ਦੀਆਂ ਗਜ਼ਲਾਂ ਦਾ ਉਦਾਹਰਣ ਲਵੋ:
*ਬਿਦੇਹ ਸਾਕੀ ਮਰਾ ਯਕ ਜਾਮ ਜਾਂ ਰੰਗੀਨੀਏ ਦਿਲਹਾ
ਬ-ਚਸ਼ਮੇ ਬੀਂ ਆਸਾਂ ਕੁਨਮ ਈਂ ਜੁਮਲਹ ਮੁਸ਼ਕਿਲਾਹਗਜ਼ਲ ਨੰ. ੩

ਅਰਥ: ਐ ਸਾਕੀ ਮੈਨੂੰ ਦਿਲਾਂ ਦੀ ਰੰਗਤ ਦਾ ਇਕ ਜਾਮ ਦੇਹ, ਜੋ ਪਵਿੱਤ੍ਰ ਅੱਖ ਦੇ ਦੇਖਣ ਨਾਲ ਸਾਡੀਆਂ ਮੁਸ਼ਕਿਲਾਂ ਆਸਾਨ ਹੋ ਜਾਣ।

*ਬਾਯਾ ਐ ਸਾਕੀਏ ਰੰਗੀ ਜ਼ਿ ਮੈ ਪੁਰ ਕੁਨ ਅਯਾਜ਼ ਈਂ ਜਾਂ
ਨਸ਼ਾਇ ਲਾਲ ਮੈ ਜੂਨਤ ਜ਼ਿ ਹਕ ਬਫਦ ਸੁਰਜ਼ ਈ ਜਾਂ

ਅਰਥ: ਹੇ ਰੰਗੀਲੇ ਸਾਕੀ ਆ ਸ਼ਰਾਬ ਦਾ ਪਿਆਲਾ ਇਥੇ ਭਰ ਦੇ, ਤੇਰੇ ਲਾਲ ਰੰਗ ਦੀ ਸ਼ਰਾਬ ਦਾ ਪਿਆਲਾ ਸੱਚ (ਵਾਹਿਗੁਰੂ) ਦੇ ਭੇਦਾਂ ਦਾ ਪਤਾ ਦੱਸਦੀ ਹੈ।
ਹੁਣ ਦਸਮ ਗ੍ਰੰਥ ਵਿਰੋਧੀਆਂ ਲਈ ਭਾਈ ਨੰਦ ਲਾਲ ਭੀ ਸ਼ਰਾਬੀ ਐਲਾਨ ਦਿੱਤੇ ਜਾਣੇ ਚਾਹੀਦੇ ਹਨ।

ਗੁਰੂ ਗੋਬਿੰਦ ਸਿੰਘ ਸਾਹਿਬ ਨੇ ਸਿੱਖਾਂ ਨੂੰ ਹੁਕਮ ਦਿਤਾ ਹੈ:

16- ਬਿਨ ਕਰਤਾਰ ਨ ਕਿਰਤਮ ਮਾਨੋ॥ (ਸ਼ਬਸ ਹਜ਼ਾਰੇ ਪਾ.10)

ਅਰਥਾਤ ਕਰੀ ਹੋਈ ਵਸਤੂ ਨੂੰ ਨਾ ਪੂਜੋ, ਕਰਤਾਰ (ਕਰਨ ਵਾਲੇ) ਦੀ ਉਪਾਸਨਾ ਕਰੋ।

ਮੈਂ ਦਿਖਾਵੇ ਵਜੋਂ ਕੁਝ ਨਹੀਂ ਕਰਦਾ

17- ਨ ਜਟਾ, ਮੁੰਡ ਧਰੌ,
ਨ ਮੁੰਦ੍ਰਕਾ ਸਵਾਰੌ |
ਜਪੋ ਤਾਸ ਨਾਮੰ,
ਸਰੈ ਸਰਬ ਕਾਮੰ |

ਨ ਨੈਨੰ ਮਿਚਾਊਂ,
ਨ ਡਿੰਭ ਦਿਖਾਂਊਂ |
ਨ ਕੁਕਰਮੰ ਕਮਾਊਂ,
ਨ ਭੇਖੀ ਕਹਾਊਂ |

{ਦਸਮ ਗ੍ਰੰਥ ਸਾਹਿਬ, ਬਚਿੱਤ੍ਰ ਨਾਟਕ, ਰਸਾਵਲ ਛੰਦ, ਪਦ ੫੧ -੫੨ }

N jata, mund dharou,
N mundrka sawarou |
Japo taas naman,
sarae sarab kaman |

N nainan michaun,
N dhimbh dikhaoun |
N kukarman kamaun,
N pekhi kahaoun |

I neither wear long matted hair,nor indulge in complete shaving of my head.
I do not adorn my ears with the earrings of mendicants.
I mediate only on God’s Name and all my affairs are accomplished thereby.
I do not close my eyes or make anything else for show.
I neither commit any misdeeds nor engage myself in any such activity
because of which I may be called a disguiser.

{Dasam Granth Sahib, Bachittar Natak, Rasaval Chand, Pad 51-52}

18- “ਦੇਹ ਸਿਵਾ ਬਰੁ ਮੋਹਿ ਇਹੈ ਸੁਭ ਕਰਮਨ ਤੇ ਕਬਹੂੰ ਨ ਟਰੋਂ ਨ ਡਰੋਂ ਅਰਿ ਸੋ ਜਬ ਜਾਇ ਲਰੋਂ ਨਿਸਚੈ ਕਰਿ ਅਪੁਨੀ ਜੀਤ ਕਰੋਂ ਅਰੁ ਸਿਖ ਹੋਂ ਆਪਨੇ ਹੀ ਮਨ ਕੌ ਇਹ ਲਾਲਚ ਹਉ ਗੁਨ ਤਉ ਉਚਰੋਂ ਜਬ ਆਵ ਕੀ ਅਉਧ ਨਿਦਾਨ ਬਨੈ ਅਤਿ ਹੀ ਰਨ ਮੈ ਤਬ ਜੂਝ ਮਰੋਂ”   

“Deh Shiva bar mohe ihe shubh karman te kabhun na taron!! Na taron ari son jab jaae laron nischai kar apni jeet karon!! Aru Sikh haun apne hi man ko ih laalch hau gun tao uchron!! Jab aav ki audh nidhan bane ati hi ran men tab joojh maron!!

O Lord grant me the boon, that I may never deviate from doing a good deed.

That I shall not fear when I go into combat. And with determination I will be victorious.

That I may teach myself this greed alone, to learn only Thy praises.

And when the last days of my life come, I may die in the might of the battlefield.

The hymn is a part of Chandi Charitar Ukti Bilas, a section of the Dasam Granth. Throughout Sikh scriptures, the Sikh Gurus use both Hindu and Muslim names for god to refer to Waheguru. The word “Siva” primarily means Waheguru and represents God as monotheistic, undescribed, unseen and immortal.”

19- ‘ਦੇਵੀ ਦੇਵਾ ਪੂਜੀਐ ਭਾਈ ਕਿਆ ਮਾਗਉ ਕਿਆ ਦੇਹਿ ॥
ਪਾਹਣੁ ਨੀਰਿ ਪਖਾਲੀਐ ਭਾਈ ਜਲਮਹਿ ਬੂਡਹਿ ਤੇਹਿ ॥ ੬ ॥ ‘ ( ਸੋਰਠਿ ਮ: ੧ , ਗੁਰੂ ਗ੍ਰੰਥ ਸਾਹਿਬ – ਅੰਗ ੬੩੭)

20- ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਪ੍ਰਭ ਭਏ ਦਇਆਲਾ ਸਿਵ ਕੈ ਬਾਣਿ ਸਿਰੁ ਕਾਟਿਓ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥ (ਰਾਗ ਟੋਡੀ ਮ:੫ – ਅੰਗ ੭੧੪)
Will you now claim the word Shiv (ਸਿਵ) Sri Guru Granth Sahib Ji’s Banee also pertains to Mahadev or Akal Purakh Sahib?

21- ਮੈਲੇ ਸਿਵ ਸੰਕਰਾ ਮਹੇਸ ॥ ਮੈਲੇ ਸਿਧ ਸਾਧਿਕ ਅਰੁ ਭੇਖ ॥ ang 1158 !!

Mailay Siv Sankraa Mahays, Mailay SiDh SaaDhik Ar Bhaykh. Shiva, Shankara and Mahaysh are polluted. The Siddhas, seekers and strivers, and those who wear religious robes, are polluted. —–Kabir, Raag Bhairo, AGGS, Page, 1158-6 .

22- ਗੁਰਮੁਖਿ ਜੀਅ ਪ੍ਰਾਨ ਉਪਜਹਿ ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਿਵ ਘਰਿ ਜਾਈਐ ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਾਨਕ ਸਚਿ ਸਮਾਈਐ ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਿਜ ਪਦੁ ਪਾਈਐ ਪ੍ਰਭਾਤੀ (ਮਃ ੧) ਗੁਰੂ ਗ੍ਰੰਥ ਸਾਹਿਬ – ਅੰਗ ੧੩੨੯ !!

23- ਪਾਹਨ ਕੌ ਸਿਵ ਤੂ ਜੋ ਕਹੈ ਪਸੁ,ਯਾ ਤੇ ਕਛੁ ਤੁਹਿ ਹਾਥ ਨ ਐ ਹੈ !!
ਗੁਰੂ ਗੋਬਿੰਦ ਸਿੰਘ ਜੀ, ਚਰੀਤਰ ੨੬੬, ਸ੍ਰੀ ਦਸਮ ਗ੍ਰੰਥ ਸਾਹਿਬ ਜੀ

—- ਜੇ ਤੁ ਪਥਰ ਨੁ ਸਿਵ ਕਹੇਗਾ, ਉਹਦੀ ਪਥਰ ਦੀ ਪੂਜਾ ਕਰੇਗਾ ,ਤੇਰੇ ਹਥ ਕੁਝ ਨੀ ਲਗਨਾ ਕੋਈ ਪਰਾਪਤੀ ਨੀ ਹੋਣੀ ਨਾ ਹੀ ਕੋਈ ਹੋਈ ਆ ਨਾ ਹੀ ਕੋਈ ਹੋਣੀ ਆ !

24- ਤ੍ਰੈਯਕ ਜੋਨਿ ਜੁ ਆਪੁ ਪਰਾ ਹਸਿ ਕੈ ਤੁਹਿ ਕੋ ਕਹੁ ਕਾ ਬਰੁ ਦੈ ਹੈ

ਉਸ ਦੀ ਪੂਜਾ ਕਰ ਰਿਹਾ ਜੋ ਖੁਦ ਤਿਨਾ ਲੋਕਾ ਚ ਭਟਕਦਾ ,ਜੋ ਖੁਦ ਮਾਇਆ ਵੀਚ ਗਲਤਾਨ ਹੈ ਜੋ ਖੁਦ ਤਿਨ ਗੁਣ ਰਜੋ ਤਮੋ ਸਤੋ ਚ ਫਸਿਆ ਹੋਏਆ, ੳੇੁਸ ਤੋ ਕਿਸ ਵਰ ਦੀ ਉਮੀਦ ਕਰ ਰਿਹਾ.

25- ਆਪਨ ਸੋ ਕਰਿ ਹੈ ਕਬਹੂੰ ਤੁਹਿ ਪਾਹਨ ਕੀ ਪਦਵੀ ਤਬ ਪੈ ਹੈ
—ਹੁਣ ੲਿਥੇ ਜੈਸਾ ਸੇਵੇ ਤੈਸਾ ਹੋਇ ਦੇ ਅਨੁਸਾਰ ਵਧ ਤੋ ਵਧ ਉਹ ਤੈਨੁ ਅਪਨੇ ਵਰਗਾ ਬਨਾ ਸਕਦਾ ਨਹੀ ਤੇ ਤੁ ਆਪ ਹੀ ਬਨ ਜਾਨਾ ਉਸ ਵਰਗਾ ਕਿਉਕੀ ਜੈਸਾ ਸੇਵੇ ਤੈਸਾ ਹੋਇ ਜਿਸ ਦੀ ਇਨਸਾਨ ਪੂਜਾ ਕਰਦਾ ੳੁਸੇ ਵਰਗਾ ਇਨਸਾਨ ਬਨ ਜਾਂਦਾ

26- ਜਾਨੁ ਰੇ ਜਾਨੁ ਅਜਾਨ ਮਹਾ ਫਿਰਿ ਜਾਨ ਗਈ ਕਛੁ ਜਾਨਿ ਨ ਜੈ ਹੈ
—-ਕਿਨਾ ਸੋਹਣਾ ਉਪਦੇਸੁ ਗੁਰੂ ਸਾਹਿਬ ਜੀ ਨੇ ਦੱਸਿਆ ਕਿ
ਮਨੁਖ ਕਿਧਰ ਭਟਕਿਆ ਫਿਰਿ ਰਿਹਾ, ਜਾਨ ਲੈ ਮਹਾ ਅਜਾਨ ਮਨੁਖ ਕਿ, ਜਿ ਤੇਰੀ ਜਾਨ ਸਵਾਸਾ ਦੀ ਪੁੰਜੀ ਖਤਮ ਹੋਗੀ ਫੇਰ ਕੁਝ ਹਥ ਨੀ ਆਉਨਾ ,ਫੇਰ ਕੁਝ ਜਾਨ ਨਹੀ ਪਾਵੇਗਾ !!

27- ਕੋਟਿ ਸੂਰ ਜਾ ਕੈ ਪਰਗਾਸ Kot sūrjā kai pargās. Millions of suns shine for Him,

ਕੋਟਿ ਮਹਾਦੇਵ ਅਰੁ ਕਬਿਲਾਸ  Kot mahāḏev ar kabilās. millions of Shivas and Kailash mountains.

ਦੁਰਗਾ ਕੋਟਿ ਜਾ ਕੈ ਮਰਦਨੁ ਕਰੈ Ḏurgā kot jā kai marḏan karai. Millions of Durga goddesses massage His Feet.

ਬ੍ਰਹਮਾ ਕੋਟਿ ਬੇਦ ਉਚਰੈ Barahmā kot beḏ ucẖrai. ||1|| Millions of Brahmas chant the Vedas for Him. ||1||

ਜਉ ਜਾਚਉ ਤਉ ਕੇਵਲ ਰਾਮ Ja▫o jācẖa▫o ṯa▫o keval rām. When I beg, I beg only from the Lord.

ਆਨ ਦੇਵ ਸਿਉ ਨਾਹੀ ਕਾਮ ਰਹਾਉ Ān ḏev si▫o nāhī kām. ||1|| rahā▫o. I have nothing to do with any other deities. ||1||Pause||

 

ਧੋਲਾ ਬਲਦ- ਭਗਤ ਨਾਮਦੇਵ ਜੀ ਦਾ ਸ਼ਿਵ ਨੂ ਧੋਲੇ ਬਲਦ ‘ਤੇ ਚੜਿਆ ਲਿਖਣ ਵਿਚ ਕੀ ਭੇਤ ਹੈ ?

ਕਈ ਦੇਵਤਿਆਂ ਨੂੰ ਕੁੱਤੇ, ਗਧੇ, ਸੂਰ ਆਦਿ ਦੀ ਸਵਾਰੀ ਮਿਲੀ ਹੋਈ ਹੈ | ਫਿਰ ਮਹਾਂਦੇਉ ਦੇ ਹੀ ਪੁੱਤਰ ਸ੍ਰੀ ਗਣੇਸ਼ ਜੀ ਨੂੰ ਸਿਰ ਤਾ ਹਾਥੀ ਦਾ ਲਾਇਆ ਸੀ ਪਰ ਉਸ ਗ਼ਰੀਬ ਨੂੰ ਸਵਾਰੀ ਚੂਹੇ ਦੀ ਦਿੱਤੀ ਹੈ | ਏਧਰ ਸ਼ਿਵਜੀ ਨੂੰ ਸਗੋਂ ਗਊ ਮਾਤਾ ਦਾ ਜਾਇਆ ਸੁੰਦਰ ਬਲਦ ਸਵਾਰੀ ਲਈ ਦਿੱਤਾ ਹੋਇਆ ਹੈ | ਕੀ ਭਗਤ ਨਾਮਦੇਵ ਜੀ ਨੂੰ ਗਊ ਦੇ ਜਾਏ ‘ਤੇ ਚੜਾ ਦੇਣ ਵਿਚ ਬ੍ਰਾਹਮਣ ਦੀ ਅਸ਼ਰਧਾ ਨਜ਼ਰ ਆਈ ਹੈ ਕਿ ਜਾਂ ਕੋਈ ਹੋਰ ਗੁੱਝਾ ਭੇਤ ਹੈ ? ਨਾਮਦੇਵ ਜੀ ਨੇ ਖ਼ਾਸ ਤੋਰ ‘ਤੇ ਸ਼ਿਵਜੀ ਨੂੰ ਬਲਦ ਉਤੇ ਚੜਿਆ ਦੇਖਣ ਦਾ ਜ਼ਿਕਰ ਕਿਸ ਕਾਰਨ ਕੀਤਾ ? ਗਾਇਤ੍ਰੀ ਵਾਂਗ ਹੀ ਜ਼ਰੂਰ ਕੋਈ ਬੜੀ ਸਪੱਸ਼ਟ ਬੇਅਦਬੀ ਵਾਲੀ ਗਾਥਾ ਹੋਣੀ ਹੈ ? ਇਸ ਉਤਸੁਕਤਾ ਨੂੰ ਦੂਰ ਕਰਨ ਲਈ ਪੁਰਾਣਾਂ ਦੀ ਘੋਖ ਕੀਤੀ | ਪੁਰਾਣਿਕ ਗਾਥਾ ਵਿਚ ਬ੍ਰਾਹਮਣ ਨੇ ਇਸ ਬਲਦ ਦੇ ਜਨਮ ਨਾਲ ਵਾਕਿਆ ਹੀ ਬੜੀ ਅਜੀਬ ਕਹਾਣੀ ਜੋੜ ਕੇ ਇਸ ਦਾ ਵੀ ਖ਼ੂਬ ਮੋਜੂ ਉਡਾਇਆ ਹੋਇਆ ਹੈ |

ਮਹਾਨ ਕੋਸ਼ ਦੇ ੩੨੦ ਸਫੇ ‘ਤੇ ਲਿਖਿਆ ਹੈ :

ਕਾਲਕਾ ਪੁਰਾਣ ਵਿਚ ਕਥਾ ਹੈ ਕਿ ਦਕਸ਼ ਦੀ ਕੰਨਿਆ ਸਰਭਿ ਦੇ ਉਦਰ ਤੋਂ ਕਸ਼ਯਪ ਦੀ ਬੇਟੀ ਰੋਹਣੀ ਜੰਮੀ | ਰੋਹਣੀ ਦੇ ਗਰਭ ਤੋਂ ਸੂਰਸੈਣ ਵਸੁ ਦੇ ਵੀਰਯ ਕਰਕੇ ਕਾਮਧੇਨ (ਇਸਤ੍ਰੀ ਦੇ ਗਰਭ ਵਿਚੋਂ ਗਊ) ਦਾ ਜਨਮ ਹੋਇਆ | ਇਕ ਵਿਸ਼ੱਈ ਬੇਤਾਲ (ਭੂਤ) ਕਾਮਧੇਨ ਦੀ ਸੁੰਦਰਤਾ ਦੇਖ ਕੇ ਮੋਹਿਤ ਹੋ ਗਿਆ ਅਤੇ ਬੈਲ ਦਾ ਰੂਪ ਧਾਰ ਕੇ ਉਸ ਨੇ ਕਾਮਧੇਨ ਨਾਲ ਭੋਗ ਕੀਤਾ, ਜਿਸ ਤੋਂ ਵੱਡੇ ਕੱਦ ਦਾ ਬੈਲ ਜਨਮਿਆ, ਜੋ ਸ਼ਿਵ ਦਾ ਵਾਹਨ ਹੋਇਆ | (ਭਾਵ, ਸ਼ਿਵ ਦੀ ਸਵਾਰੀ ਬਣਿਆ) |

(ਜਿਸ ਬਲਦ ਦਾ ਪਿਤਾ ਭੂਤ, ਮਾਤਾ ਗਊ ਅਤੇ ਨਾਨੀ ਇਸਤ੍ਰੀ ਹੋਵੇ, ਅਜਿਹੀ ਹਰਾਮੀ ਔਲਾਦ, ਸ਼ਿਵ ਜਾਂ ਇਸ ਤੋਂ ਵੀ ਵੱਡੇ ਦੇਵਤੇ ਦੀ ਸਵਾਰੀ ਹੋਵੇ, ਉਸ ਪ੍ਰਤੀ ਸ਼ਰਧਾ ਭਾਵਨਾ ਬਣਨੀ ਮੁਸ਼ਕਿਲ ਹੁੰਦੀ ਹੈ |)

ਸਾਰੇ ਸੰਸਾਰ ਦੇ ਲੋਕਾਂ ਨੇ ਰਾਮਾਇਣ ਅਤੇ ਮਹਾਂਭਾਰਤ ਮੂਵੀਆਂ ਟੀ.ਵੀ. ‘ਤੇ ਵੇਖੀਆਂ ਹਨ | ਉਨ੍ਨਾਂ ਵਿਚ ਕਥਿਤ ਭਗਵਾਨ ਬ੍ਰਹਮਾ ਸਮੇਤ ਸਾਰੇ ਦੇਵਤੇ ਕਹਾਣੀ ਦੇ ਹਰ ਮੋੜ ‘ਤੇ ਪ੍ਰਗਟ ਹੋਏ ਕਈ ਤਰ੍ਰਾਂ ਦੇ ਵਰ-ਸਰਾਪ ਦਿੰਦੇ ਵੇਖਣ ਵਿਚ ਆਉਂਦੇ ਹਨ | ਜਿਸ ਢੰਗ ਨਾਲ ਇਹ ਸਭ ਕੁਝ ਵਾਪਰਦਾ ਦਰਸਾਇਆ ਹੈ, ਉਸ ਤੋਂ ਲੋਕੜਾ ਵਿਸ਼ਵਾਸ ਬਣ ਜਾਂਦਾ ਹੈ ਕਿ ਸਤਿਜੁਗ ਤੋਂ ਲੈ ਕੇ ਹਰ ਜੁਗ ਵਿਚ, ਜਦੋਂ ਵੀ ਅਤੇ ਜਿਥੇ ਵੀ (ਬ੍ਰਹਮਾ, ਵਿਸ਼ਨੂੰ, ਮਹੇਸ਼) ਜਿਸ ਦੇਵਤੇ ਨੂੰ ਵੀ ਯਾਦ ਕੀਤਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ, ਉਹ ਪ੍ਰਗਟ ਹੋ ਕੇ ਆਪਣੇ ਭਗਤ ਦੀ ਬੇਨਤੀ ਸੁਣਦਾ ਹੈ ਅਤੇ ਯੋਗ ਸਹਾਇਤਾ ਜ਼ਰੂਰ ਕਰਦਾ ਹੈ |

ਪਰ ਹਿੰਦੂ ਧਰਮ ‘ਤੇ ਬੇਅੰਤ ਤਰ੍ਰਾਂ ਨਾਲ ਜ਼ੁਲਮੀ ਕਹਿਰ ਵਰਤਿਆ ਪਰ ਕਦੇ ਕਿਸੇ ਵੀ ਦੇਵਤੇ ਨੇ ਦੇਸ਼ਵਾਸੀਆਂ ਦੀ ਕੋਈ ਪੁਕਾਰ ਨਹੀਂ ਸੁਣੀ | ਕਦੇ ਕੋਈ ਦੇਵਤਾ ਕਿਸੇ ਦੁਖਿਆਰੇ ਦੀ ਸਹਾਇਤਾ ਲਈ ਨਹੀਂ ਆਇਆ | ਹਿੰਦੂ ਧਰਮ ਦੇ ਗ੍ਰੰਥਾਂ ਵਿਚ ਬ੍ਰਹਮਾ ਦੀ ਉਮਰ ਕਈ ਕ੍ਰੋੜ ਵਰ੍ਰੇ ਲਿਖੀ ਹੈ | ਭਾਗਵਤ ਪੁਰਾਣ ਦੇ ਲਿਖਾਰੀ ਨੇ ਭਗਵਾਨ ਵਿਸ਼ਨੂੰ ਨੂੰ ਅਤੇ ਸ਼ਿਵ ਪੁਰਾਣ ਲਿਖਣ ਵਾਲੇ ਨੇ ਭਗਵਾਨ ‘ਮਹਾਸ਼ਿਵ’ ਨੂੰ ਅਮਰ ਲਿਖਿਆ ਹੈ | ਏਡੀ ਲੰਮੀ ਉਮਰ ਵਾਲਾ ਬ੍ਰਹਮਾ ਅਥਵਾ ਅਮਰਾ ਪਦ ਵਾਲਾ ਵਿਸ਼ਨੂੰ, ਸ਼ਿਵ, ਦੁਰਗਾ ਆਦਿ ਦੇਵੀ-ਦੇਵਤੇ, ਜਿਹੜੇ ਰਾਮਾਇਣ ਅਤੇ ਮਹਾਂਭਾਰਤ ਦੇ ਸਮਿਆਂ ਵਿਚ ਝੱਟ ਪ੍ਰਗਟ ਹੁੰਦੇ ਦਰਸਾਏ ਹੋਏ ਹਨ, ਭਾਰਤ ‘ਤੇ ਕੀਤੇ ਜ਼ੁਲਮ ਅਥਵਾ ਲਗਾਤਾਰ ਪੈ ਰਹੀਆਂ ਮੁਸੀਬਤਾਂ ਸਮੇਂ ਉਹ ਕਥਿਤ ਮਹਾਨ ਦੇਵਤੇ ਕਿੱਧਰ ਚਲੇ ਗਏ ਸਨ ? ਸ੍ਰਿਸ਼ਟੀ ਦਾ ਕਰਤਾ, ਬ੍ਰਾਹਮਣ ਨੂੰ ਆਪਣੇ ਮੂੰਹ ਵਿਚੋਂ ਪੈਦਾ ਕਰਨ ਵਾਲਾ, ਸਾਰੇ ਜੀਵਾਂ ਦਾ ਪਿਤਾ, ਭਗਵਾਨ ਬ੍ਰਹਮਾ ਵੀ ਭਾਰਤ ਵਾਸੀ ਆਪਣੇ ਸਕੇ ਪੁੱਤਰਾਂ ਦੀ ਸਹਾਇਤਾ ਲਈ ਕਿਸ ਕਾਰਨ ਕਦੇ ਨਹੀਂ ਬਹੁੜਿਆ ? ਉਸ ਦੀ ਕ੍ਰੋੜਾਂ ਸਾਲ ਵਾਲੀ ਉਮਰ ਦੀ ਗੱਲ ਦਾ ਕੀ ਬਣਿਆ ? ਕੀ ਵਾਕਿਆ ਹੀ ਦੇਵਤੇ ਅਮਰ ਹਨ ? ਕੀ ਇਹ ਸਾਰਾ ਪ੍ਰੋਹਿਤਵਾਦੀ ਮਾਇਆ-ਜਾਲ ਹੀ ਤਾਂ ਨਹੀਂ ਹੈ ?

ਆਉ ਜੁਗੋ-ਜੁਗ ਅਟੱਲ, ਹਾਜਰਾ-ਹਜ਼ੂਰ ਸਤਿਗੁਰੂ ਗ੍ਰੰਥ ਸਾਹਿਬ ਦੇ ਬਚਨ ਧਿਆਨ ਨਾਲ ਸੁਣ ਕੇ ਵਿਚਾਰੀਏ :

28- ਪ੍ਰਥਮੇ ਬ੍ਰਹਮਾ ਕਾਲੈ ਘਰਿ ਆਇਆ ||ਬ੍ਰਹਮ ਕਮਲੁ ਪਇਆਲਿ ਨ ਪਾਇਆ ||ਆਗਿਆ ਨਹੀ ਲੀਨੀ ਭਰਮਿ ਭੁਲਾਇਆ ||੧||ਜੋ ਉਪਜੈ ਸੋ ਕਾਲਿ ਸੰਘਾਰਿਆ ||ਹਮ ਹਰਿ ਰਾਖੇ ਗੁਰ ਸ਼ਬਦ ਬੀਚਾਰਿਆ ||੧||ਰਹਾਉ||ਮਾਇਆ ਮੋਹੇ ਦੇਵੀ ਸਭ ਦੇਵਾ ||ਕਾਲੁ ਨ ਛੋਡੈ ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਕੀ ਸੇਵਾ ||ਓਹੁ ਅਬਿਨਾਸੀ ਅਲਖ ਅਭੇਵਾ ||੨||ਸੁਲਤਾਨ ਖਾਨ ਬਾਦਿਸਾਹ ਨਹੀ ਰਹਨਾ ||ਨਾਮਹੁ ਭੂਲੈ ਜਮ ਕਾ ਦੁਖੁ ਸਹਨਾ ||ਮੈ ਧਰ ਨਾਮੁ ਜਿਉ ਰਾਖਹੁ ਰਹਨਾ ||੩||ਚੋਉਧਰੀ ਰਾਜੇ ਨਹੀ ਕਿਸੈ ਮੁਕਾਮੁ ||ਸਾਹ ਮਰਹਿ ਸੰਚਹਿ ਮਾਇਆ ਦਾਮ ||ਮੈ ਧਨੁ ਦੀਜੈ ਹਰਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਨਾਮੁ ||੪||ਰਯਤਿ ਮਹਰ ਮੁਕਦਮ ਸਿਕਦਾਰੈ ||ਨਿਹਚਲੁ ਕੋਇ ਨ ਦਿਸੈ ਸੰਸਾਰੈ ||ਅਫਰਿਉ ਕਾਲੁ ਕੂੜੁ ਸਿਰਿ ਮਾਰੈ ||੫||ਨਿਹਚਲੁ ਏਕੁ ਸਚਾ ਸਚੁ ਸੋਈ ||ਜਿਨਿ ਕਰਿ ਸਾਜੀ ਤਿਨਹਿ ਸਭ ਗੋਈ ||ਓਹੁ ਗੁਰਮੁਖਿ ਜਾਪੈ ਤਾਂ ਪਤਿ ਹੋਈ ||੬||ਕਾਜੀ ਸੇਖ ਭੇਖ ਫਕੀਰਾ ||ਵਡੇ ਕਹਾਵਹਿ ਹਉਮੈ ਤਨਿ ਪੀਰਾ ||ਕਾਲੁ ਣ ਛੋਡੈ ਬਿਨੁ ਸਤਿਗੁਰ ਕੀ ਧੀਰਾ ||੭||ਕਾਲੁ ਜਾਲੁ ਜਿਹਵਾ ਅਰੁ ਨੈਣੀ ||ਕਾਨੀ ਕਾਲੁ ਸੁਣੈ ਭਿਖੁ ਬੈਣੀ ||ਬਿਨੁ ਸਬਦੈ ਮੂਠੇ ਦਿਨੁ ਰੈਣੀ ||੮||ਹਿਰਦੈ ਸਾਚੁ ਵਸੈ ਹਰਿ ਨਾਇ ||ਕਾਲੁ ਨ ਜੋਹਿ ਸਕੈ ਗੁਣ ਗਾਇ ||ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਬਦਿ ਸਮਾਇ ||੯||੧੪|| (ਅੰਗ ੨੨੭)

ਇਸ ਪਾਵਨ ਸ਼ਬਦ ਵਿਚ ਸਭ ਤੋ ਪਹਿਲਾਂ ਬ੍ਰਹਮਾ ਨੂੰ ਹੀ ਕਾਲ ਚੱਕਰ ਵਿਚ ਫਸਿਆ ਖੱਜਲ-ਖੁਆਰ ਹੁੰਦਾ ਦਰਸਾ ਕੇ ਉਸ ਪ੍ਰਤੀ ਬਣਿਆ ਸਿਰਜਨ-ਹਾਰ ਵਾਲਾ ਭੁਲੇਖਾ ਖ਼ਤਮ ਕੀਤਾ ਹੈ | ਫਿਰ ਹੋਰ ਸਾਰੇ ਦੇਵੀ-ਦੇਵਤੇ ਮਨੁੱਖ ਵਾਂਗ ਆਤਮਿਕ ਮੋਤੇ ਮਰਦੇ ਹੋਣ ਦੇ ਕਾਰਨ, ਸੰਸਾਰ ਵਿਚ ਜੰਮਦੇ ਮਰਦੇ ਦਰਸਾ ਕੇ ਉਨ੍ਨਾਂ ਦੀ ਕਥਿਦੈਵੀ ਸ਼ਕਤੀ ਬਾਰੇ ਬਣੇ ਭਰਮ ਦੀ ਖੰਡਨਾ ਕੀਤੀ ਹੈ |

ਸਤਿਗੁਰਾਂ ਦਾ ਸ਼ਬਦ-ਗਿਆਨ ਹੀ ਮਨੁੱਖ ਲਈ ਕਲਿਆਣਕਾਰੀ ਹੈ | ਸਦਾ ਗੁਰੂ ਦੀ ਸਿਖਿਆ ਅਨੁਸਾਰ ਚੱਲ ਕੇ ਆਪਣੀ ਜੀਵਨ-ਜੁਗਤ ਸੁਆਰਨ ਦੇ ਆਹਾਰ ਵਿਚ ਸੁਚੇਤ ਰਹਿਣਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ |

ਅਗਲੇ ਸ਼ਬਦ ਵਿਚ ਵੀ ਸਤਿਗੁਰਾਂ ਨੇ ਸਾਰੇ ਸੰਸਾਰ ਨੂੰ ਰੋਗੀ ਫੁਰਮਨ ਕਰਦਿਆ ਬ੍ਰਹਮਾ, ਸ਼ਿਵ ਆਦਿ ਕਥਿਤ ਵੱਡੇ-ਵੱਡੇ ਦੇਵਤਿਆਂ ਨੂੰ ਵੀ (ਸਾਰੇ ਵਿਕਾਰਾਂ ਦਾ ਮੂਲ) ਹਉਮੈ-ਰੋਗ ਕਹਿ ਕੇ, ਇਨ੍ਨਾਂ ਦੀ ਅੱਡਰੀ ਦੈਵੀ ਹਸਤੀ ਦੀ ਹੋਂਦ ਬਾਰੇ ਬਣੇ ਭਰਮ ਦਾ ਭੋਗ ਪਾਇਆ ਹੈ | ਗੁਰੂ ਗ੍ਰੰਥ ਸਾਹਿਬ ਜੀ ਨੂੰ ਆਪਣਾ ਸਤਿਗੁਰੂ ਮੰਨਣ ਵਾਲੇ ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਿਖ ਨੂੰ ਦੇਵੀ-ਦੇਵਤਿਆਂ ਦੀ ਕਿਸੇ ਕਰਾਮਾਤੀ ਹੋਂਦ ਦੇ ਭਰਮ ਵਿਚ ਨਹੀਂ ਪੈਣਾ ਚਾਹੀਦਾ :

29- ਪਉਣੁ ਪਾਣੀ ਬੈਸੰਤਰੁ ਰੋਗੀ ਰੋਗੀ ਧਰਤਿ ਸਭੋਗੀ ||
ਮਾਤ ਪਿਤਾ ਮਾਇਆ ਦੇਹ ਸਿ ਰੋਗੀ ਰੋਗੀ ਕੁਟੰਬ ਸੰਜੋਗੀ ||੩||
ਰੋਗੀ ਬ੍ਰਹਮਾ ਬਿਸਨੁ ਸਰੁਦ੍ਰਾ ਰੋਗੀ ਸਗਲ ਸੰਸਾਰਾ ||
ਹਰਿ ਪਦੁ ਚੀਨਿ ਭਏ ਸੇ ਮੁਕਤੇ ਗੁਰ ਕਾ ਸ਼ਬਦੁ ਵੀਚਾਰਾ ||੪||           (ਅੰਗ ੧੧੫੩)

ਇਕ ਕਥਾ ਵਾਚਕ ਦੇ ਭਗਤ ਤਿਰਲੋਚਨ ਜੀ ਦੇ ਸ਼ਬਦ ਦੀ ਕਥਾ ਕਰਨ ਕਰਕੇ ਹਿੰਦੂ ਸੰਗਠਨ ਭੜਕ ਗਏ ਕੇ ਅਖੇ ਜੀ ਸਾਡੇ ਦੇਵਤਿਆਂ ਦਾ ਅਪਮਾਨ ਕੀਤਾ ਹੈ, ਜੇ ਇਹਨਾ ਨੇ ਦਸਮ ਗ੍ਰੰਥ ਪੜ ਲਿਆ ਤਾ ਇਹਨਾ ਦਾ ਕੀ ਹਾਲ ਹੋਣਾ ਹੈ ਕਿਓਂ ਕੇ ਗੁਰੂ ਸਾਹਿਬ ਨੇ ਇਹਨਾ ਦੇਵਤਿਆਂ ਦੀ ਕੀਮਤ ਕੋਡੀ ਦੀ ਵੀ ਨਹੀਂ ਪਾਈ :

  • ਕ੍ਰਿਸਨ ਔ ਬਿਸਨ ਜਪੇ ਤੁਹਿ ਕੋਟਿਕ ਰਾਮ ਰਹੀਮ ਭਲੀ ਬਿਧਿ ਧਿਆਯੋ ॥
    – ਭਾਵ ਤੂੰ ਕ੍ਰਿਸ਼ਨ , ਵਿਸ਼ਨੂ, ਰਾਮ, ਰਹੀਮ ਵਰਗੇ ਕਰੋੜਾਂ ਬੜੀਆਂ ਜੁਗਤਾਂ ਲਾ ਲਾ ਧਿਆ ਕੇ ਦੇਖ ਲਏ

ਬ੍ਰਹਮ ਜਪਿਓ ਅਰੁ ਸੰਭੁ ਥਪਿਓ ਤਹਿ ਤੇ ਤੁਹਿ ਕੋ ਕਿਨਹੂੰ ਨ ਬਚਾਯੋ ॥
– ਬ੍ਰਹਮਾ ਵੀ ਜਪ ਲਿਆ, ਸ਼ਿਵ ਜੀ ਵੀ ਤੂੰ ਥਾਪ ਕੇ ਦੇਖ ਲਿਆ, ਪਰ ਤੈਨੂ ਕਿਸੇ ਨੇ ਨਹੀਂ ਬਚਾਇਆ

ਕੋਟ ਕਰੀ ਤਪਸਾ ਦਿਨ ਕੋਟਿਕ ਕਾਹੂੰ ਨ ਕੌਡੀ ਕੋ ਕਾਮ ਕਢਾਯੋ ॥
– ਕਰੋੜਾਂ ਵਾਰ ਤੂੰ ਇਹਨਾ ਦੀ ਤਪਸਿਆ ਕਰ ਕੇ ਦੇਖ ਲਈ, ਪਰ ਇਹਨਾ ਵਿਚੋਂ ਕੋਈ ਕੋਡੀ ਦਾ ਕੰਮ ਨਹੀ ਸਵਾਰ ਸਕਿਆ

ਕਾਮਕੁ ਮੰਤ੍ਰ ਕਸੀਰੇ ਕੇ ਕਾਮ ਨ ਕਾਲ ਕੋ ਘਾਉ ਕਿਨਹੂੰ ਨ ਬਚਾਯੋ ॥੯੭॥
– ਅਨੇਕਾਂ ਮੰਤਰ ਪੜ ਕੇ ਦੇਖ ਲਏ ਤੂੰ ਪਰ ਕਾਲ ਦੇ ਪ੍ਰਭਾਵ ਤੋਂ ਤੈਨੂ ਕੋਈ ਨਹੀਂ ਬਚਾ ਸਕਿਆ

ਕਾਹੇ ਕੋ ਕੂਰ ਕਰੈ ਤਪਸਾ ਇਨ ਕੀ ਕੋਊ ਕੌਡੀ ਕੇ ਕਾਮ ਨ ਐਹੈ ॥
– ਓਏ ਮੂਰਖਾ ਕਿਓਂ ਇਹਨਾ ਸਾਰਿਆਂ ਨੂੰ ਪੁਜਦਾ ਫਿਰਦਾ ਜੋ ਕਿਸੇ ਕੋਡੀ ਦੇ ਕੰਮ ਦੇ ਨਹੀਂ

ਤੋਹਿ ਬਚਾਇ ਸਕੈ ਕਹੁ ਕੈਸੇ ਕੈ ਆਪਨ ਘਾਵ ਬਚਾਇ ਨ ਐਹੈ ॥
– ਤੈਨੂ ਇਹ ਕੀ ਬਚਾਣ ਗੇ??? ਇਹ ਤਾਂ ਆਪਣੇ ਆਪ ਨੂੰ ਨਹੀਂ ਬਚਾ ਸਕੇ!!!

ਕੋਪ ਕਰਾਲ ਕੀ ਪਾਵਕ ਕੁੰਡ ਮੈ ਆਪ ਟੰਗਿਓ ਤਿਮ ਤੋਹਿ ਟੰਗੈ ਹੈ ॥
– ਇਹ ਤਾਂ ਆਪ ਕਾਲ ਦੀ ਕੁੰਡ ਵਿਚ ਜਿਵੇ ਟੰਗੇ ਹੋਏ ਨੇ , ਓਸੇ ਤਰਹ ਤੈਨੂ ਵੀ ਟੰਗਵਾ ਦੇਣਗੇ !

ਚੇਤ ਰੇ ਚੇਤ ਅਜੋ ਜੀਅ ਮੈਂ ਜੜ ਕਾਲ ਕ੍ਰਿਪਾ ਬਿਨੁ ਕਾਮ ਨਐ ਹੈ ॥੯੮॥
– ਓਏ ਮੂਰਖ ਓਸ ਪਰਮੇਸ੍ਵਰ ਨੂੰ ਚੇਤ , ਓਸ ਤੋਂ ਬਿਨਾ ਕਿਸੇ ਦੇਵਤੇ ਨੇ ਕੰਮ ਨਹੀਂ ਆਉਣਾ !                                                                                                                                                                                           ਬਾਕੀ ਹੋਰ ਵੀ ਰਿਸਰਚ ਕਰਕੇ ਲਿਖਿਆ ਜਾਵੇਗਾ ਤਦ ਤਕ ਹਥ ਜੋੜ ਕੇ ਬਿਨਤੀ ਹੈ ਕਿ ਗੁਰਬਾਣੀ ਨਾਲ ਜੁੜੋ !

ਸ਼ਿਵ ਸਾਡਾ ਰੱਬ ਨਹੀਂ, ਜੋ ਮੰਨਦੇ, ਓਹਨਾ ਨੂ ਮੁਬਾਰਕ !! Ajmer Randhawa

Ajmer Singh Randhawa.