Baba Banda Singh Bahadur, who embraced Sikh religion and was given a new name GURBAKSH SINGH

बाबा बन्दा सिंह बहादुर उर्फ़ गुरबक्श सिंह;

Banda Singh Bahadur
मैं माधो दास बैरागी का जीवन वृत्तांत तो नहीं लिख रहा हूँ लेकिन कुछ बहुमूल्य जानकारी अवश्य देना चाहूंगा क्योंकि कटटर हिन्दू संगठन उनके बारे में भ्रामक जानकारी देते हैं!
तो सबसे पहले यह जान लीजिये कि………..
१)- सिख धर्म में प्रवेश करने के लिए अमृत ग्रहण करना अति आवश्यक होता है, परन्तु जो लोग किसी सिख घर में पैदा होते हैं, वे अपने जीवन में कभी भी, कहीं भी अमृत ग्रहण करके गुरु गोबिंद सिंह जी के बेटे होने का गौरव हासिल करते हैं!
२)- सिख धर्म में वैराग या सन्यास को कोई महत्व नहीं दिया गया है, हर व्यक्ति को गृहस्थ जीवन में रहते हुए ही ईश्वर प्राप्ति के लिए एक अकाल पुरख वाहेगुरु के नाम जपने का निर्देश दिया गया है!

तो बन्दा सिंह बहादुर उर्फ़ माधो दास कटरा, जम्मू के नज़दीक रियासी नामक स्थान का रहने वाला राजपूत था! एक बार शिकार करते हुए इसने एक हिरणी पर वाण चलाया, हिरणी घायल हुई गिर पड़ी और उसके पेट से दो नवजात शिशु भी बाहर गिर पड़े और सभी काल कवलित हुए!
यह ह्रदय विदारक दृश्य देखकर इस राजपूत ने धनुष वहीँ रख दिया और सन्यास ग्रहण किया! अनेकों स्थानों का भ्रमण करते हुए और तांत्रिक शिक्षाओं को भी ग्रहण कर यह नांदेड नामक स्थान पर जा पहुंचा और यहाँ इसने अपना एक आश्रम स्थापित किया!
कहा जाता है कि यह हवा में उड़ता था और इसके पास एक भारी पलंग था! यदि कोई सन्यासी या गुरु इसके आश्रम में आ जाता था तो यह उसको उस पलंग पर विश्राम करने को कह स्वयं आश्रम से बाहर चला जाता था !
इस पलंग के चारों पायों पर जिन्न-भूतों के चारों सम्राट जो इसके कैदी थे, उनको यह कार्य सौंपा गया था कि जब इस पलंग पर विश्राम करने वाला व्यक्ति सो जाये तो ये चारों उस पलंग को उल्टा कर देते था!
इस तरह यह उन सन्यासियों पर व्यंग कर उनका उपहास उडाता था!
जब सिख धर्म के दसवें गुरु-गुरु गोबिंद सिंह जी अपनी दक्षिण की यात्रा पर थे तो वे भी इसके आश्रम में जा पहुंचे! यह उस समय अपने आश्रम में नहीं था! इसके शिष्यों ने भी अपने गुरु के बताये नियमों के अनुसार गुरु जी को भी पलंग पर विश्राम करने को कहा!
इन चारों भूतों के सम्राटों ने भी गुरु के पलंग को उलटाने की चेष्टा की, लेकिन गुरु जी तो स्वयं ईश्वर के अवतार थे, वे कहां गुरु जी को गिरा सकते थे? वे अपने प्रयत्नों में सफल नहीं हुए!
उधर गुरु जी के शिष्यों ने देखा कि आश्रम में भोजन पकाया जा रहा है तो वे भोजन की प्रतीक्षा करने लगे लेकिन बहुत अधिक देर तक भी जब भोजन नहीं मिला तो उन्होंने पूछताछ शुरू की तो आश्रम में उपस्थित चेलों ने कहा कि जब तक उनका गुरु भोजन ग्रहण नहीं करता, बाकि का भोजन नहीं परोसा जा सकता!
इस पर गुरु जी के सिख सैनिकों को रोष उतपन्न हुआ और उन्होंने ने देखा कि आश्रम में बहुत से बकरे घूम रहे थे जिन्हें बलि हेतु लाया गया था, यह देखकर उन्होंने कुछ बकरे पकडे और उनका काम तमाम कर दिया, उन्हें पकाया और खाया!
यह देखकर आश्रम के शिष्यों ने जंगल का रुख किया, अपने गुरु माधो दास की तलाश की और सब वृत्तांत उन्हें कह सुनाया कि किस तरह एक शस्त्रधारी फ़ौज़ ने आश्रम में उत्पात मचाया है और आश्रम के बकरे खा कर उनकी हड्डियां और खाल वहीँ फ़ेंक दी है!
यह सुनकर माधोदास का खून गर्म हो गया और वह तत्काल ही वायु मार्ग से आश्रम जा पहुंचा तो जो कुछ उसके शिष्यों ने बताया था, देखकर वह भौंचक्का रह गया!
उसने पूछा कि इनका सरदार कौन है, तो वहां उपस्थित अन्य चेलों ने कहा कि वे भीतर पलंग पर विश्राम कर रहे हैं!

माधो दास सीधे उस कमरे में गया तो देखा कि एक अति सुंदर, तेजस्वी, शस्त्रधारी उस पलंग पर सो रहा था! वहअपने कैदी भूतों के सम्राटों पर गुस्सा होने लगा कि उन्होंने इसको पलंग पर क्यों सोने दिया और कि उन्होंने पलंग को उलटाया क्यों नहीं?

तब उन्होंने जवाब दिया कि उन सबने अपने प्रयत्न किये लेकिन इस शख्स के आगे उनकी सब शक्तियां असमर्थ हो गईं! अत: यदि उसके पास कोई और सामर्थ्य है तो वह स्वयं प्रयत्न कर ले, उनके अपने बस में इस शख्स को नुकसान पहुँचाने की ताक़त नहीं है!

यह सुनकर माधोदास आश्चर्यचकित भी हुआ और जान गया कि पलंग पर सोने वाला महापुरुष कोई साधारण व्यक्ति नहीं, इसके शस्त्र और सैनिकों की वेशभूषा बताती हैं कि यह अवशय सिखों के गुरु गोबिंद सिंह जी होंगे!

अभी वह विचार मग्न खड़ा था कि गुरु जी की आँख खुल गई, इस खड़े देखकर उन्होंने पूछा कि ‘कौन हो तुम’?

प्रत्युत्तर में माधोदास ने जवाब दिया’ जी आप का बन्दा अर्थ गुलाम’!

यह सुनकर गुरु जी कहा कि’ यदि बन्दा (इंसान) है तो इंसानों वाले भले काम कर! इन बेचारों को क्यों बंदी बना रखा है’?

यह सुनकर माधोदास ने तुरंत ही जिन्न-भूतों के चारों सम्राटों (बीर नर सिंह, बीर नाहर सिंह, बीर क्षेत्रपाल और पीर सुलेमान) को तुरंत रिहा कर दिया!

तब गुरु जी ने उसको बताया कि इस समय देश को मुगल आतताइयों से हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए शस्त्रधारियों की आवश्यकता है न कि सन्यासियों की, तुम एक क्षत्रिय हो और क्षत्रिय का पहला धर्म ही देश, धर्म, स्त्रियों और अबलाओं को बचाने का होता है और तुम अपने क्षत्रिय कर्म से भागकर सन्यासियों का वेश धारण किये बैठे हो? मुझे देखो, मैंने धर्म की खातिर अपने पिता, माता, चारों पुत्रों का बलिदान दे कर भी शस्त्र हाथ में पकड़ धर्म की रक्षा हेतु खड़ा हूँ और तुम हो कि शस्त्र त्याग दिए हैं?

यह वीरता पूर्ण वचन सुन कर माधोदास तुरंत गुरु के चरणों में गिर पड़ा और गुरु का शिष्य बनने की इच्छा जाहिर की ! गुरु जी ने उसकी इच्छा को देखते हुए उसे अमृत दान दिया, शस्त्र दिए और उसे सिख धर्म में शामिल कर परंपरा अनुसार एक नया नाम गुरबक्श सिंह से सुसज्जित किया!
लेकिन इतिहास में वह बंदा सिंह बहादुर के नाम से ही जाना गया!

अक्टूबर १७०८ में ही बन्दा बहदुर को गुरु जी ने अपने कुछ विश्वस्त सिख सैनिकों के साथ पंजाब रवाना किया, उसको निम्न वस्तुएं दी गईं जिससे सिख क़ौम उसपर विश्वास करके सहयोग करे;

१)- गुरु जी द्वारा सिख संगतों के नाम पैगाम (हुकमनामा),
२)- गुरु जी के अपने पांच विशिष्ट तीर,
३)- दो धारी तलवार जिसे खंडा भी कहा जाता है,
४)- और एक बड़ा नगाड़ा !
नोट: इन तीरों की विशिष्टता थी और निर्देश था कि इन्हें अति विपत्ति में ही प्रयोग किया जाये, इनके प्रयोग करने पर शहीद सिख सैनिकों की मदद आँधी, तूफ़ान, घनघोर वृषा आदि के रूप में होती जिससे दुश्मन को कुछ दिखाई नहीं देता और यह तबाही मचाते हुए सुरक्षित निकल सकता था!

इनके अतिरिक्त गुरु जी ने इस के साथ अपने पांच परम प्रिय सिख, इसके सलाहकार के रूप में इसके साथ भेजे, जिनके नाम हैं;
१)- भाई दया सिंह जी,
२)- भाई बिनोद सिंह जी,
३)- भाई काहन सिंह जी,
४)- भाई बिजय सिंह जी एवं,
५)- भाई रण सिंह जी!

गुरु जी का सिखों के नाम हुक्मनामे के बिना बंदा सिंह को पंजाब में सिखों का सहयोग नहीं मिलता, और गुरु जी के परम सहयोगियों के साथ न होने की दशा में पंजाब में सिख इस पर विश्वास कदापि नहीं करते अत: अकेला बन्दा कुछ नहीं कर सकता था!

बंदा की सफलता उसकी अपनी नहीं अपितु सिख क़ौम की सफलता थी, उसके सहयोग में चारों तरफ से सिख आ पहुंचे थे क्योंकि उसकी मदद करने के लिए सिखों को उनके गुरु के द्वारा पैगाम या हुक्मनामा जो भेजा गया था!

अत; बन्दा सिंह बहादुर गुरु का लाडला सिख कहलाया न कि कोई वैरागी जैसे इसे आजकल  मिथ्या  रूप से प्रचारित किया जा रहा है! यह वैरागी अवश्य था लेकिन गुरु गोबिंद सिंह जी के संपर्क में आने से पहले ! बाद में गुरु जी का शिष्य बन जाने और अमृत ग्रहण कर लेने पर यह वैरागी नहीं अपितु सिख सैनिक बन गया था!

AS Randhawa-1

अजमेर सिंह रंधावा

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