The General who proved himself smarter and wiser then whole Indian army

General Subeg Singh
जनरल सुबेग सिंह— भारतीय सेना का एक रिटायर्ड जनरल जिसने अकेले ने दरबार साहिब परिक्षेत्र में ऐसी व्यूह रचना की कि आपरेशन ब्लू स्टार के दौरान भारतीय जनरलों के पसीने छुड़वा दिए थे!
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शहीद जनरल सुबेग सिंह जी का मृत्युपरांत तस्वीर! 

जिस काम को अंजाम देने के लिए भारतीय फौज ने (HQ) में बैठ कर व्यूह रचना की थी और इंदिरा को आशवस्त किया था कि वे अकाल तखत को आधे घंटे में फ़तेह कर लेंगे और भिंडरांवाले को गिरफ्तार कर लेंगे! अकाली नेताओं ने भी यही सोचा था कि फौज देख कर ये नौसीखिए युवा सिख लड़ाके भाग जायेंगे या फौज इन्हें ख़त्म कर देगी!

वे भी भौंचक्के रह गए थे!

जनरल सुबेग सिंह ने बांगला देश की मुक्ति वाहिनी को भी प्रशिक्षित किया था ! वे गुरिल्ला युद्ध के माहिर थे! उन्हें जान बूझ कर रिटायर होने से एक दिन पूर्व बेइजत करके फौज से निष्काषित कर दिया गया था, जिससे वे भारतीय फौज के इन अफसरों को सबक भी सिखाना चाहते थे! उन्हें स्वर्णिम अवसर प्राप्त हुआ जब उनकी मुलाकात संत जरनैल सिंह जी से हुई! उन्हें यह मालूम था कि इंदिरा गन्दी दरबार साहिब पर फौजी आक्रमण की योजना बना रही है अत: उन्होंने संत जी से मिलकर ऐसी रणनीति तैयार की जिसके आगे विशाल भारतीय फौज बेबस साबित हुई!

एक अकेले सिख रिटायर्ड जनरल ने २००-२५० सिखों को (हर उम्र के) ऐसा प्रशिक्षण दिया कि उन्होंने न सिर्फ भारतीय फौज को ७२ घंटों तक एक इंच भी आगे नहीं बढ़ने दिया अपितु फौज का इतना भारी नुक्सान किया जितना उसे पाकिस्तान और चीन के साथ हुए युद्धों में कुल मिला कर भी नहीं हुआ था! इतना ही नहीं, इन गैर पेशेवर फौजी प्रशिक्षण प्राप्त सिख युवकों ने भारतीय पैदल सेना (Infantry division) को सरेंडर होने को भी मजबूर कर दिया!

1984 statistics of Operation Bluestar
मेजर जनरल कुलदीप बरार ने भी अपनी पुस्तक “साका नीला तारा” में स्वीकार किया है कि भारतीय फौज के १५३०७ जवान शहीद हुए और १७८९७ जवान जख्मी, ४३ अफसर भी शहीद.
इतना भारी नुकसान तो भारत को इसके समस्त युध्दों के सम्मिलित परिणाम से भी ज्यादा था! लेफ्टिनेंट जनरल सूंदर जी ने भी चंडीगढ़ में ६ जून १९८४ को ही एक प्रेस सम्मेलन में स्वीकारा था कि उसकी २०% फौज मारी गयी थी! अमृतसर में भारतीय जनरलों ने एक लाख फौज को लगाया था!

यह दोनों ही स्वीकारोक्तियां एक दूसरे की पूरक हैं और सच्चाई बयान करती हैं
जब भारतीय फौज के जनरलों ने देखा कि इन्फैंट्री बेबस हो गयी है और २०० मीटर का फासला तो दूर,, अपनी जगह से एक इंच भी आगे नहीं जा सकी है तो उन्होंने अपनी इज़्ज़त बचाने की खातिर, (नहीं तो वे यह जंग हार चुके थे), भारी हथियारों, तोपों और टैंकों को लाने का हुक्म दिया!क्या आप कल्पना भी कर सकते हैं कि मुट्ठी भर सिखों को पराजित करने के लिए इन विनाशक हथियारों को, जिनका प्रयोग सिर्फ दुश्मन देश से युद्ध में ही होता है, को अकाल तख्त में आखिरी बचे १४ सिखों को मारने के लिए किया गया और फिर पवित्र अकाल तख़्त को ही निशाना बना दिया गया!कारगिल युद्ध में पाकिस्तान ने ऊंची चोटियों पर कब्ज़ा कर लिया था, उनको खदेड़ने के लिए युद्ध हुआ लेकिन भारतीय वायु सेना की सेवाएं नहीं ली गईं! क्योंकि भारत पडोसी देश से युद्ध नहीं करना चाहता था लेकिन अपने ही देशवासियों को मारने के लिए टैंकों का प्रयोग भारत द्वारा शायद सिर्फ अमृतसर में ही किया गया था!

 

भारतीय सेना के जनरलों ने इंदिरा गाँधी को आशवस्त किया था कि वे आधे घंटे में ही दरबार साहिब क्षेत्र पर कब्जा कर लेंगे और अकाल तख्त से संत जरनैल सिंह को जिन्दा या मुर्दा गिरफ्तार कर लेंगे ! इंदिरा गाँधी ने भारतीय सेना के प्रमुख जनरल ए के वैद्य को यह आदेश दिया था…..

“I don’t give a damn if the Golden Temple and whole of Amritsar are destroyed, I want Bhindranwale dead.” (Indira Gandhi, Indian Prime Minister, communicating with Gen. Vaidya during “Operation Blue Star”)

मुझे कोई परवाह नहीं कि यदि स्वर्ण मन्दिर और संपूर्ण अमृतसर भी तबाह हो जाये, मुझे भिंडरांवाला मुर्दा चाहिए ‘(भारतीय प्रधान मंत्री इंदिरा गाँधी ने जनरल वैद्य के साथ अपनी बातचीत में आपरेशन ब्लू स्टार के दौरान यह शब्द कहे थे)!’

अब यदि अमृतसर तबाह होता तो क्या वे हिन्दू परिवार, जिन्होंने दरबार साहिब पर आक्रमण करने जाती हुई फौज का स्वागत किया था, अकाल तख़्त को तोड़े जाने और संत भिंडरांवाले, जनरल सुबेग सिंह के मारे जाने पर लड्डू बांटे थे, खुशियां मनाईं थीं. क्या वे बच जाते ?

मूर्ख हिन्दू, पड़ोस में युद्ध हो रहा था और वे खुशियां मना रहे थे!

सिख युवकों का अनुपम शौर्य और परास्त भारतीय सेना

सिख युवकों के शौर्य के आगे भारतीय सेना की इन्फैंट्री डिविजन (पैदल सेना) ने हथियार डाल दिए थे! ७२ घंटे तक चली इस कार्रवाई में संसार की श्रेष्ठतम सेनाओं में से एक जिसने पाकिस्तान को इस से पहले तीन बार धूल चटाई थी — आज मुट्ठी भर सिख युवकों के शौर्य के आगे विवश थी!

 

दरबार साहिब स्थित घंटा घर से श्री अकाल तखत तक का फासला लगभग २०० मीटर है! भारतीय जनरलों को विश्वास था कि वे आधे घंटे में इस कार्रवाई को अंजाम दे देंगे परन्तु ७२ घंटे तक भी यह विशाल सेना २०० मीटर का फासला तय नही कर पाई थी! ऐसे प्रतिरोध का सामना करना पड़ा  था भारतीय सेना को! सपने में भी उसे यह उम्मीद न थी कि मुट्ठी भर सिख युवक, भारतीय सेना की बढत रोक देंगे परन्तु सिखों में शहीदी का चाव जन्म से ही होता है—-वे अपने गुरु के वचन का पालन करते हुए मैदाने जंग में शहीद होना और गुरु को अपना सिर भेंट करने में गौरव महसूस करते हैं! सिख लड़ रहे थे तो आततायियों की सेना से जिसने उनके पवित्रतम धार्मिक स्थान को नेस्तनाबूद करने की ठानी थी !अत: आतताइयों की इस फौज से लड़ कर शहीद होना, अपने धार्मिक स्थान की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति देना, अपने गुरु गोबिंद सिंह जी के प्रति अपनी वचन-बद्धता निभानी और अपने गुरु के महावाक्य — ‘सवा लाख से एक लड़ाऊँ !! तभै गोबिंद सिंह नाम कहाऊँ !!’ को चरितार्थ करते हुए शहीदी का जाम पीना गौरव समझते थे जबकि भारतीय सेना तो अपनी आका इंदिरा माता को खुश करने के लिए लड़ रहे थे !

 

दोनों की लड़ाई का उद्देश्य भी अलग था !  

 

भारतीय सेना के जनरलों द्वारा आपरेशन ब्लू स्टार की रण – नीति  बनाते हुए सिखों के पांचवें गुरु अर्जुन देव जी के शहीदी पर्व को जान-बूझ कर चुना गया था क्योंकि उस दिन श्रद्धालु बहुत अधिक संख्या में गुरूद्वारे में एकत्रित होते हैंऔर इस दिन भारतीय सेना द्वारा गुरूद्वारे पर आक्रमण करने के उनको दो फायदे होने थे;

 

पहला –  अधिक श्रद्धालु एकत्रित होने से फौज को उनकी आड़ में दरबार साहिब की परिक्रमा से होते हुए श्री अकाल तखत साहिब जी तक पहुंचना आसान हो जाता, फौज गोली चलाती तो मरना तो सिखों ने ही था, चाहे वे संत जरनैल सिंह जी के साथी  धार्मिक प्रवर्ति वाले सिख हों या श्रद्धालु सिख ! इंदिरा का भी तो यही आदेश था कि सिखों को चाहे जितनी संख्या में मारना पड़े परन्तु वे अकाल तखत पर आक्रमण कर के संत जरनैल सिंह जी को मारना चाहती थी ! तो इस  तरह फौज इन श्रद्धालु सिखों की आड़ में अपने को बचाती हुई श्री अकाल तखत साहिब जी पर आक्रमण करना चाहती थी! फौज जंग के मैदान में भी भेड़-बकरी या अन्य पशुओं की आड़ में धावा बोलती है, जिससे इन्हें जानी नुकसान होने का अंदेशा कम होता है !

 

यहाँ भी भारतीय फौज के जनरलों ने यही सोचा था कि वे भी अपने सैनिकों को सिख संगतों (श्रद्धालुओं) की आड़ में से होते हुए आधे घंटे में ही श्री अकाल तखत साहिब जी को घेर लेंगे और सफलता हासिल कर लेंगे क्योंकि सिख योद्धे अपने ही भाइयों, बहनों या बच्चों की हत्याएं नहीं करेंगे! परन्तु भीतर भी सिख योद्धे गुरिल्ला लड़ाई में निपुण तथा हर कौशल में कुशल थे, उन्होंने भारतीय फौज के धावे को एक दम खत्म कर दिया, करीबन सारे ही फौजी जो भीतर घुसे थे, पार बुला दिए गये थे!

 

अकाल तखत साहिब जी पर कब्ज़ा करने की लड़ाई ७२ घंटे चली परन्तु भारतीय सेना की पैदल सेना जब फेल हो गई और एक कदम भी आगे नहीं बढ पाई तो उन्हें ले जाने के लिए APC व्हीकल (बख्तरबंद गाड़ी) मंगाई गई परन्तु सिख लड़ाकू योद्धाओं  ने इस बख्तर बंद गाड़ी को भी उड़ा दिया !

 

अब भारतीय फौज के जनरलों के पसीने छूट गये! जिस लड़ाई को अपने अहं में उन्होंने मात्र आधे घंटे की सोची थी, उस लड़ाई में उन्हें जो जानी नुकसान उठाना पड़ा और फजीहत अलग से, इंदिरा को विश्वास अलग से दिलाया था कि आधे घंटे में फौजी कार्रवाई पूरी हो जाएगी, उसका तो कहीं अंत ही नजर नहीं आ रहा था! अब पैदल सेना के बस की बात नहीं रह गई थी, अत: अब जनरलों ने इंदिरा से टैंक इस्तेमाल करने की इजाजत मांगी जबकि मार्क तुली (बी बी सी संवाददाता) के अनुसार श्री अकाल तखत में केवल आखिरी १४ सिख ही शेष बचे थे परन्तु भारतीय पैदल सेना (इन्फंट्री) इतनी हतोत्साहित थी कि उसमें अब इतना दम नहीं था कि इन सिख योद्धाओं से मुकाबला कर पाती अत: भारी तोपखाने के इस्तेमाल से श्री अकाल तख्ता साहिब की पवित्र और एतिहासिक इमारत को ही टैंकों के गोलों का निशाना बना दिया गया, इस इमारत को नेस्तनाबूद कर दिया गया!

सारा संसार स्तब्ध था परन्तु सिख जगत मजबूर था! उनकी ऑंखें तो रोती थीं परन्तु आंसू सूख गये थे! उन्हें काटो तो खून नहीं था! उनका बस चलता तो अलग सिख देश उसी दिन बन जता! नफरत की आंधी भी चली थी! आक्रोश था सिख जगत में इंदिरा और भारतीय सेना के खिलाफ, अत; सिख जगत ने कटु फैसला लिया!

इन मुट्ठी भर सिख युवकों का अंत तो निश्चित ही था क्योंकि सेना की तरह इनके पास भारी हथियार न थे, कुमुक नहीं थी, रसद नहीं थी, पानी नहीं था, बिजली नहीं थी, खाने को कुछ भी न था, जून महीने की भयंकर गर्मी में भी वे विचलित नहीं हुए, यदि सेना की तरह सहूलियत होती तो निश्चित ही वे भारतीय सेना को मार मार कर यमुना पार करवा देते! बहादुरी में में वे भारतीय सेना से सवाये ही साबित हुए हैं, भले ही उनमें से कोई जीवित नहीं बचा लेकिन किसी ने अपनी जान बचाने के लिए आत्म समर्पण भी नहीं किया क्योंकि युद्ध में वीरगति प्राप्त करना सिखों के लिए गौरव की बात है!

मैं इन सभी सिख युवकों को, संत भिंडरांवाले और उनके सहयोगियों तथा जनरल सुबेग सिंह जी और प्रत्येक शहीद को जो भारतीय फौज की नृशंसता का शिकार हुआ, उन सभी को जिन्होंने अपने धर्म की रक्षा हेतु अपने प्राण न्योछावर किये, के श्री चरणों में सादर प्रेम सहित श्रद्धा सुमन अर्पित करता हूँ!

दो सिख योद्धाओं (भाई हरजिंदर सिंह जिन्दा और भाई सुखदेव सिंह सुक्खा ने) ने भारतीय फौज के प्रधान सेनापति और इंदिरा के चाटुकार जनरल अरुण कुमार वैद्य को पूना में गोलियों से उड़ा दिया!

अब बारी थी इंदिरा की जिसका अंत भी सिख योद्धाओं के हाथों निश्चित था!

Ajmer kesri
अजमेर सिंह रंधावा!

8 thoughts on “The General who proved himself smarter and wiser then whole Indian army”

    1. Gurjeet singh ji, jad ih hai hi jhootha tan is di kahi kise vi gall da ki itbar?
      Je ih kitab isne nahi likhi, tan is ne is kitab de publisher te koi kanooni karwai kion nahi kiti?
      is to saaf pta chalda ki kitab is di apni likhi hoi hai par hun kise dabao hethan munkar hai.
      Is da kadi itbar na karna.

  1. यह सर्वत्र विदित है की इंदिरा सिखों से नफरत करती थी और इसीलिए उसने अमृतसर स्थित सिखों के प्रमुख धार्मिक आस्था के केंद्र स्वर्ण मन्दिर या जिसे दरबार साहिब भी कहा जाता है, इसे अंग्रेजी में गोल्डेन टेम्पल कहते हैं — पर सिखों के पांचवें गुरु अर्जन देव जी के शहीदी पर्व पर फौजी आक्रमण करवा कर प्रमाणित भी कर दिया था! फौज की इस कार्रवाई में दोनों तरफ का बहुत ही भारी नुकसान हुआ था! इसे आपरेशन ब्लू-स्टार का नाम दिया गया था! इसके एक प्रमुख जनरल (जो स्वयं सिख परिवार से थे परन्तु पतित थे और सिख धर्म के अनुगामी न थे) कुलदीप सिंह बरार ने अपनी पुस्तक ‘नीला तारा’ में भारतीय सेना के शहीद सैनिकों की संख्या १५307, अफसर 43 और ज़ख्मियों की संख्या १7,897 लिखी है जबकि दूसरी और संत जरनैलसिंह भिंडरांवाला  के नेतृत्व और भारतीय सेना के एक रिटायर्ड जनरल शुबेग सिंह की  कमान के तहत लगभग २००-२५० सिख युवक ही थे! भारतीय फौज के कुल शहीद हुए सैनिकों की गिनती तो भारत की चीन और पाकिस्तान से हुए समस्त युद्धों में शहीद हुए सैनिकों की कुल गिनती से भी बहुत ज्यादा थी ! 

    जनरल शुबेग सिंह बंगला देश के वार हीरो रहे हैं, उन्होंने मुक्तिवाहिनी और भारतीय सेना को गुरिल्ला लड़ाई की ट्रेनिंग दी थी! परन्तु उनके रिटायर होने से एक दिन पूर्व ही उन पर कुछ आरोप लगा कर उन्हें सेना से बर्खास्त कर दिया गया था, इस अपमान के कारण ही उन्होंने भारत सरकार से बदला लेने की सोच ली थी! इन्हीं सिख जनरल ने सिख युवकों को गुरिल्ला ट्रेनिंग दी जिस से २००-२५० सिख युवकों ने भारतीय सेना का विध्वंस कर डाला!

     इस से बौखला कर भारतीय सेना पागल हो उठी और उसने पंजाब में अमृतधारी सिखों की बेपनाह नृशंस हत्याएं शुरू कर दीं (खिसियानी बिल्ली खम्भा नोचे), जेनेवा संधि के तहत दुश्मन के गिरफ्तार सैनिकों के साथ भी मानवीय सलूक किया जाता है परन्तु भारतीय सेना ने अपने ही देशवासियों पर जो जुल्म किये, उसे सुन कर और पढ़ कर अपने आप पर घृणा उत्पन्न होती है कि क्या हम ऐसे देश के वासी हैं? विश्वास नहीं होगा कि क्या भारतीय सेना ने वास्तव में ऐसे जुल्म भारत के ही नागरिकों पर किये थे ?आँखों देखी घटना की एक रिपोर्ट प्रसिद्ध पत्रकार हरबीर सिंह भंवर ने अपनी पुस्तक ‘डायरी के पन्ने जो इतिहास बन गये’ के पृष्ठ 69…पर लिखते हैं कि श्री अकाल तख्त साहिब जी के पीछे की ओर सैंकड़ो साल पुराना एक डेरा है (आटा मंडी स्थित बाबा शाम सिंह जी का डेरा) जहाँ से रोजाना सवेरे-सवेरे दरबार साहिब जी में अरदास करने से पहले ही कढाह प्रसाद पहुंचाया जाता है और फिर दिन में लंगर तैयार किया जाता था ! उस समय भी स्वयंसेवक लंगर तैयार कर रहे थे, पहले तो बी एस ऍफ़ के जवानों ने डेरे को लूटा, एक सिख भाई दौलत सिंह ने अपनी ज़मीन चंडीगढ़ के नजदीक बेचीं थी और जिसके ६०,००० रुपये डेरे की एक अलमारी में रखे थे, उन्हें लूट लिया और फिर राइफलों के बट से डेरे के सिखों को मारते रहे! इसके बाद इन सभी सिखों को जिनकी कुल संख्या १९ थी, इन्हें भारतीय सैनिकों ने पकड़ा, उनकी पगड़ियाँ खोल कर उनके हाथ पीठ के पीछे करके बाँध दिए और गली में ले आये, गोली मारने ही लगे थे कि एक बुजुर्ग सिख जथेदार किरपाल सिंह जी ने कहा कि, “आप हमें गोली तो मार ही दोगे परन्तु इस से पहले हमें हमारी आखिरी अरदास (प्रार्थना) कर लेने दीजिये,  “सेना के अफसरों ने इसकी इजाजत दे दी और जैसे ही इन सिखों ने अपनी अरदास पूरी की और जैकारा लगाया— ”नानक नाम चढ़दी कला — तेरे भाणे सरबत का भला “— इस के उपरांत तुरंत ही गोलियों की बौछार ने उनका अंत कर दिया !

    तीन दिनों के बाद डी एस पी सिटी सरदार अपार सिंह बाजवा ने इन लाशों को उठवा कर इनका अंतिम संस्कार करवाया था!

  2. By the end of May 1984, the situation in Punjab was becoming extremely tense. In May 1984, Indira Gandhi called for a conference at her residence. It was attended by the chief of Army Staff (COAS), General Arun Sridhar Vaidya, the DGMO, General CM Somanna, and the Western Army Commander who had come down from Chandi Mandir, Lieutinent General Krishnaswamy Sunderji.

    Indira Gandhi had discussed the situation within the Golden Temple, and asked the Western Army commander if the entire group of militants could be flushed out, General Sunderji had responded positively, reportedly saying that if there was a requirement to clear the golden Temple, he would have it cleared in no time.

    Sunderji belligerent stance put the COAS in an awkward situation. As the chief, with General Somanna by his side, began to explain the reasoning behind this advice, Indira Gandhi impatiently cut him short and asked him why he was anticipating problems when the army commander on the ground was confident of resolving the issue.

    General Sunderji always looked to be a man in a tremendous hurry and it was felt that he was too willing to do things without getting into the details of the matter.

    This set the ball rolling for what was to be one of India’s darkest chapters – Operation Blue star. Indira Gandhi also unwittingly created a situation where army HQ now had to play a secondary role to Western Command in planning the operation.

    The moment General Sunderji pulled the carpet from under the COAS’s feet, military logic had been compromised and each subsequent decision was guided by political rather than operational logic.

    But if General VK Singh is believed on planning of attack in end of May 1984, then why Genral SK Sinha revealed in his book ‘Last resort’ as the army was giving training to it’s soldiers in Chakrata (doon valley) 18 months before the attack? But we believe the version of attack being political and the specific day of operation on martyrdom day of fifth guru of Sikh religion to give a cover to army personals in complex to reach safely and take possession of Sri Akal Takhat which failed. General Sunderji had assured that the army will take over the control within no time but it was stopped for 72 hrs to cover a distance of only 200 meters. The army was compelled to use heavy Arty and Armor to demolish the historical building of supreme and temporal seat of Sikh religion and to kill the last 14 Sikh militants.
    There is no doubt that Indian army suffered a heavy loss due to indira Gandhi’s decision to attack on Golden temple. I remember the Military hospital all over northern India were full with wounded soldiers. General K Sunder ji also confirmed the number of high casuality. In a press conference soon after the Operation blue Star on June 6 at Chandigarh, he admitted in a very sad tone that his 20% army is killed in this operation. And that the army had not got such loss in all its previous battles fought with Pakistan. He also paid his homage by his words of appraisal in honor to these Sikh warriors as… “If any army has such brave warriors, it won’t lose any battle.”

    Col. Israr Khan of Indian army also praised these Sikh militants in his words he paid homage by saying that if he had three brigades of army consisting these militants he could take-over Pakistan easily.
    He meant to say that the 20% army personals deployed out of total one hundred thousands was killed. It approves the disclosure made by general KS Brar who gave a full account of dead and wounded. It’s very close to that account.

  3. One very important thing about Maj. Gen. KS Brar—he is biggest LIAR.
    Lieutinent General Kuldip Singh Brar (Major General then) who himself was born in a Sikh family but had discarded his parents religion commanded it. He disclosed the number of wounded and died in his book, “ Saaka Neela Taara” in Punjabi language.
    Now it has been learnt that he (Brar) refuses if he had written this book.
    I better ak him if he had not written and got it published the said book NEELA TAARA, why did he not take any legal action against the publisher? Why he never dared too? Whether he is not able to cover the Court expenses?
    No, he is lying.
    His email and address of publisher is also given in this book. He is untrustworthy. He was born in Sikh family but he discarded his religion and betrayed with 10th master. Is he could betray the Guru Gobind Sinfgh, he can cross all limits of betrayals with his parents religion.
    But most probably he is not aware of confession of Lt. Gen. Sunderji who accepted major loss (20% casuality) to indian army in a press conference in Chandigarh on 6th Jan. 1984

  4. Ajmer Singh thank you for your hard work and for continuing to expose the evil Indian government. Shaheed General Shabeg Singh was very smart and brave, he died with dignity unlike the evil indira Gandhi and general Vaidya who were both very besharam people.

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