Darbar Sahib and idols within?

भला इन मूर्खों से कोई पूछे कि ये तो किसी मुसलमान को मंदिर की सीढ़ियां न चढ़ने दें, इनका मंदिर अपवित्र हो जायेगा जबकि दरबार साहिब जी की तो नींव ही एक मुस्लिम साईं मियां मीर ने रखी थी, हमारा गुरु घर तो आज तक अपवित्र नहीं हुआ!  तो भाई पहले यह बताओ कि क्या तुम्हारे किसी मंदिर का नींव पत्थर कभी किसी मुस्लिम के कर कमलों द्वारा रखा गया है?

जाओ पहले कुछ रिसर्च कर लो! 

 

पिछले कुछ दिनों से फेसबुक और अन्य सोशल साइट्स पर कुछ फिरकु सोच वाले हिन्दू खास कर जिन्हे आरएसएस के कुत्ते कहना अधिक शोभनीय होगा, दरबार साहिब में मूर्तियां रखी होने या उनकी पूजा होने का रोना रोते नज़र आये! इनको दुःख यही कि  इस हरमंदर साहिब में पहले मूर्तियां थीं, अब क्यों नहीं और इस बात को लेकर वे शायद भ्रम में हैं कि यह कभी हिन्दू मंदिर था!


तो उनकी जानकारी के लिए यह बता दूँ कि इस हरमंदर के निर्माण के फौरन पश्चात् ही १६०४ में जैसे ही आदि गुरु ग्रन्थ साहिब जी का संकल संपन्न हुआ तो उन्हें गुरु जी आप ही स्वयं चवर करते हुए और गुरु घर के अनन्य सेवक भाई बुढ्ढा जी, श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी को अपने सिर पर सजा कर, उनकी सवारी बन हरमंदर साहिब में प्रकाश किया! गुरु ग्रन्थ साहिब जी के इस स्वरुप को आपके मंदिर की मूर्तियों की भांति प्राण प्रतिष्ठा नहीं की गयी थी अपितु जिस मर्यादा के साथ पहला वाक् या गुरु का हुकम लिया गया, गुरु घर की वही मर्यादा आज तक कायम है!
तो जो पहला हुकम आया, वह अविस्मरणीय है….
संतां के कारज आप खलोइआ हर कंम करावन आइआ राम !!
धरत सुहावी ताल सुहावा विच अमृत जल छाइआ राम!!

याद रखिये कि गुरु गोबिंद सिंह जी ने इन्हीं शूद्रों, पिछड़े, गरीब लोगों को वरदान दिया था जिन्हें हिन्दू धर्म दुत्कारता है! उपरोक्त तस्वीर इसकी गवाह है! ….

“इन गरीबन को देऊं पातशाही याद करें हमरी गुरिआई !!

यह ईश्वर का, अकाल पुरख का वह घर है जहां किसी से भेदभाव नहीं होता, उंच नीच नहीं होती! इसे समाज के चारों वर्णों के लिए खोला गया था, इसके चार दरवाजे चारों दिशाओं में रखे गए थे, चार ही मुख्य धर्म हिन्दू, मुस्लिम सिख व् ईसाई, इन सबको अनुमति है कि वे भीतर आकर गुरु चरणों में नत मस्तक हो सकें! ब्राह्मण, क्षत्री, वैश्य या शूद्र सभी गुरु घर में बराबर हैं! यह हिन्दू मंदिर नहीं जहां शूद्र वेद पाठ नहीं कर सकते, मंदिर के भीतर या लंगर हाल में प्रवेश नहीं कर सकते! वे यदि पाठ करना जानते हैं, गुरु घर की मर्यादा से वाकिफ हैं तो वे गुरु ग्रन्थ साहिब जी का पाठ स्वयं करने के अधिकारी है, उन्हें स्वतंत्रता है की वे गुरु से स्वयं जुड़ें और अन्य को भी जोड़ें!
स्त्रियों के लिए भी उनके मासिक धर्म में गुरूद्वारे में प्रवेश करने या गुरु ग्रन्थ साहिब की हज़ूरी (Presence ) में पाठ करने की पूरी स्वतंत्रता है, कोई पाबंदी या शर्म की बात नहीं! स्त्रियों को बराबर के अधिकार हैं!
इस हरमंदिर साहिब की एक विशेषता यह भी है, कि इसमें प्रवेश करने के लिए मुख्य द्वार से सीढ़ियों से नीचे उतरना पड़ता है न कि हिन्दू मंदिरों की तरह भगवान कहीं ऊपर आसीन होते हैं, यहां अपना अहंकार छोड़िये और विनम्रता ग्रहण कीजिये, ईश्वर को अहंकार पसंद नहीं! इसलिए ऊपर से नीचे उतरिये और गुरु के दर्शन कीजिये!


गुरु घर की एक और मर्यादा है कि ‘पहले पंगत पाछे संगत!’ अर्थात पहले आप लंगर ग्रहण कीजिये, भरपेट भोजन कीजिये और फिर गुरु के दर्शन के लिए जाइये जिससे गुरु के श्री चरणों में बैठ कर, प्रभु भक्ति में लीन होने पर आपको भूख न लगे और आप का ध्यान भंग न हो!
तो जो इस पवित्र स्थान के बारे में नहीं जानते कि यहां मूर्तियां कैसे विराजमान की गयीं, वे भी यह जान लें!
जब से (1699) खालसा सजाया गया तब से ही सिख और मुगलों में युद्ध होते आये हैं, १८वीं शताब्दी के मध्य और अंत में अब्दाली के हमलों के पश्चात् सिखों को जंगलों में शरण लेनी पड़ी क्योंकि उनके सिरों पर इनाम थे जैसे कि आज भी भारत सरकार ने भी कुछ चुनिंदा सिखों पर आज भी घोषित किये हैं, तब यह इनक प्रत्येक सिख के सिर पर था! इसलिए ऐसे कठिन समय में उदासी और निर्मल संप्रदा के साधु जनों पर यह जिंनदारी सौंपी गयी कि वे इन गुरु घरों की सेवा संभाल करें!

जनता कम थी, सिख जंगलों में थी, इन प्रबंधकों के पास आय के साधन कम थे अत: इन्होने अपनी आय बढ़ाने के लिए और हिन्दुओं को भी अधिक संख्या में इन गुरु घरों की ओर आकर्षित करने के लिए इन उदासी और निर्मल साधु प्रबंधकों (महंतों) ने दरबार साहिब की परिक्रमा में कुछ मूर्तियां रख दी थीं जिन पर श्रद्धालु माथा टेकते थे और चढ़ावा भी चढ़ाते थे!
यह ऐसा ही है जैसे किसी घर का मकान मालिक हाज़िर न हो और किरायेदार या रखवाले अपनी आय वृद्धि के लिए कोई गैर कानूनी कार्य उस घर में करना शुरू कर दें! अंत में जब ये लोग मूर्तियां हटाने के लिए नहीं माने तो कुछ सिख संस्थाओं ने गुरुद्वारा सुधार लहर प्रारंभ की और महंतों से इन सभी प्रमुख गुरुद्वारों से कब्ज़े वापिस लिए गए! इन मूर्तियों को दरबार साहिब से हटा कर, अमृतसर शहर में ही स्थित दुर्ग्याणा मंदिर जिसे हिन्दुओं ने दरबार साहिब की नक़ल करके ही बनाया था, वहां भिजवा दी गयीं!
आज भी कुछ सनातनी प्रभाव वाले लोग जिनमें कुछ मूर्ख सिख वेषधारी भी शामिल हैं तथा हिन्दू संगठन इस महत्वपूर्ण सिख गुरूद्वारे से वैर रखते है और येन केन प्रकारेण कुछ न कुछ वैमनस्य से भरपूर अनर्गल बातें बोलते ही रहते हैं!

 

सिख धर्म में मूर्ती पूजा निषेध है, उन्हें यह जान लेना चाहिए! न सिख लोग व्रत रखते हैं, न श्राद्ध करते हैं, न सूर्य को भगवान मान जल चढ़ाते हैं न ही हिंदुओं के कोई कर्मकांड करते हैं, न ही नक्षत्रों, गृह राशियों आदि में विश्वास करते हैं! इसके प्राचीन ऐतिहासिक प्रमाण भी हमारे पास मौजूद हैं, ऐसा कोई बदलाव आज ही नहीं आया है बल्कि गुरुओं के हुक्मनामे या आदेश तथा समयकालीन इतिहासकारों द्वारा सिख धर्म पर जो भी जानकारी दी गयी है, उसके साक्ष्य हमारे पास मौजूद हैं!

This early quote is from a Persian manuscript written during Guru Hargobind’s time. The author spent some time with Sikhs and knew the Guru. His writings imply a distinct difference to Hinduism. It also seems to answer the question about the position of Aarti and idol worship in original Sikh worship.

To be brief Nanak’s followers scorn images. Their belief is that all the Guru’s are Nanak as stated previously. They do not recite the mantras of the Hindus and do not pay respect to their idol temples. They do not count the avtaars for anything. They do not have attachment to Sanskrit, which the Hindus call the language of angels.

Dabistan i Mazahib by Mobad (1645-46) . Translated by Irfan Habib

Although from the lower castes of Hindus, countless people like ants and locusts gathered around him (Banda Singh Bahadhur) and lost no time in getting killed or coming into battle for his sake, yet they did not harm such Hindus of high status as Khatris, who were colluding in the designs and plans of that rebel or Jats famous for their bravery, who were supporting and joining the army of that doomed one. All remaining Hindus, along with the Muslims they regarded as deserving to be killed.

Muntakhabu ‘l Lubab by Khafi Khan (1716). Translated by Majida B

This observation is from an Afghan opponent of Sikhs who came to Punjab with Abdali Shah. This observation is explicit in its categorisation of Sikhs as distinct from Hindus;

Quote:

If you are not conversant with their religion I shall tell your honour that the Sikhs are disciples of a Guru, and that fortunate guide had lived at Chak [this is an old name for what we know call Harmandir Sahib]. The ways and practices of these people are derived from Nanak who showed to the Sikhs a separate path. His last successor was Gobind Singh, from whom they received the title Singh. They are not from amongst the Hindus. These miscreants have a distinct religion of their own

Jang nama by Noor Mohhamad (1764-1765). Translated by Iqtidar Alam Khan.
अत: बेहतर हो वे अपने धर्म में विश्वास रखें, हमें उन से कुछ नहीं लेना देना! हमारा अपना अलग, स्वतंत्र, सुस्थापित एवं पूर्ण धर्म है, हम जन्म से मृत्यु तथा इसके तत्पश्चात किये जाने वाले प्राणी की मुक्ति के लिए भी किसी दूसरे धर्म पर आश्रित नहीं है, हमारे गुरु ग्रन्थ साहिब हमें उचित दिशा निर्देश देते हैं और प्राणी की मुक्ति का सहज उपाय उपलब्ध करवाते हैं जिससे जीवन में कोई कमी नहीं आती अपितु सिख का जीवन सहज हो जाता है!


अजमेर सिंह रंधावा !!

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